पमिन्नानंदन पंत ग्रंथावली खण्ड : सात

शंखध्वनि शशि की तरी समाधिता आस्था सत्यकाम गोत-अगीत संकान्ति

रसाजक्मल प्रक्रारन

नयी दिल्‍लो. पढ़ना

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सूल्य; रु० ५०.००, (9) शान्ति जोशी अयम संस्करण : १६७६

अ्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड छ, नेताजी सुभाष मार्ग, नयी दिल्‍्ली-११०००२

मुद्रक ; झजय अ्रिन्टर्स, आहदरा, दिलली-११००३२

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एजाल्लक्व धरा उप वएलाफब्वअववैडत ऐक्सर एल०० ९5 59.00

शंलध्वनि भूमिका १६७१ देवोत्यान संत्रान्ति चाँद अति यान्त्रिकता सृष्टि तत्व स्थित प्रज्ञ हजुमत्‌ पवित्रता कला की सार्थकता दीप्त भावना शिशु और जगत्‌ ऊह्ापोह भूख चुभ क्षण शंखनाद धूप का टुकड़ा , भारत भू पूर्ण क्षण कविधर्म

अनुक्रम

श्नपड हा

१० १० ११ श्र श्र १३ श्ड

रहे

मन का साथी युग गाया जीवन मुक्त मध्य स्थिति फूल फल अन्तर्जंग

मृत्यु

यस्त्र नगर चिडियों की सभा भाव सिद्धि पत्थर में फूल समाधान पंब्ड़ियाँ

एक सत्‌ आत्म-धुरी अन्तर्यात्रा आत्म परिचय आत्म दर्प विद्युत्‌ युग स्त्री

अपित जीवन जीवन उल्लास

संक्रीश/८४४९९ काध [06 १६४ ईंड7९क्षुणमी दायित्व युगप्निघ्तणफि 5९(. 009 एण्देऋ& #ख्रविष्य वाणी वस्हुलीघ।३ ०( [767"65) 4४.४४४४सनश्नु पंखड़ियाँ विवृत्तस्‌: कम ४४५ [3९०६ धडरिक 2. बोध

लाए, क्ता,झोडए 3. ४५५० ॥96 रैककिप्यसिव्वोप

अधीमा॥० ३७७८० 983 २७ अनुपमा श्ष

स्तुति के प्रति पावन अवोधता यथा और आदर्श मेरा जग

मुखर

संकेत

प्रेम

कद

जपनाद नम्र आकांक्षा प्रतीक कश्मीर सौन्दर्य स्पर्श संयुक्त

आत्म मोह मेरी वीणा

सुपर्ण ६५ मैं ही नहीं > &६&

नव चेतन ६५ तारों का पहने किरीद १०० ६: ग्रात्मकथा * ६६ खरूप-रंग गनन्‍्धों की ऋतु १०१ 5 जीवन बोध ६७. कितनी कोमल स्मृति १०२ *. शंखध्वनि ६ए. सजल वाप्प बदलीसी | * रै०३* ऋन्ति युग ६६ जो कुछ भी अब तक श्रमुत था १०४ भारत भू ७०. सिमट गया सारा जग तुममें... ६०४ राज ७१ गंगा की लहरें १०५ संकट ७३. लोग व्यर्थ कहते १०६ मनोभाव ७३ जी करता, वितरित हो जाऊँ १०६ प्यार छड बिछ-बिछ जाती मूक भावना १०७ सन्‍्तुलन , ७४ म्रेषों की छाया-सी चलतीं श्न्द व्यक्ति चेतना ७५ छोटी-छोटी वस्तु श्०्८ सार्थकता ७५ कहाँ गयी वह कूक-कूक १०६ निर्धाप ७६ रूपों में करते प्रयोग प्रभु १०९६ पुरस्कार हु ७७ तुम्हीं मधुर थीं ११० मायाजाल ७प तुम वसन्‍्त झाने से पहिले १११ पूर्ण बोध ७छपय. ईइबर 4 शिशु के मुख में १११ अतृष्ति ७६ दो भागों में सा बट जाता ११३ पूर्ण समपंण ७६ फूलों को छूता जब ११३ अविच्छिन्त ८४० ओसों का वन देख श्श्ष कतेव्य ८०. नवल कॉंपलों में ११५ मनोव्यथा ८घ० छाया वीथी में सा ११७ अतिक्रिया ८१ मेथों के पंखों पर तिरती श्श्द वियतनाम ८ईे तन्‍्वी लतिकां के ११६ लेनिन के प्रति ८३. पतभर के पीले पत्तों से १२० क्षण भर की थी अतिथि १२१ शक्षि की तरी घ४-१३३ बन फूलों की गन्धों से श्र परिचय य& . फाल्गुन की हल्की-सी बदली , , ११३ अकलुप झोभा का मुख ६२ भ्रकृति रही सहचरी श्श्४ कौन सूक्ष्म स्वणिक सुगन्धन्सी.. ६३ वज्त हृदय होंगे वे १२५ तुम्हें देखकर घन्द्रकला की ४३ तुम्हें देखकर प्रथम बार १२७ कही दूर से आती ६४ तुम्हीं नहीं जब रही चाँद श्र एक मूक अवसाद शिश्ु-विस्मय-से अपल़क श्र रंग-बि रंगी कलियाँ ६५ नहीं जानता सुते ) १३० निर्मल जल गिरि स्रोत... ६५ गंगा तट पर जाने को १३१ यु कल मे ६६ वैज्ञानिक युग में रहस्य हों. १३३२ तुम मेरी सौन्दर्य बोध की ६६ अश्वुहार पहना १३३ अनू, चेतना में सुगनन्‍्ध-सी ६७ व्याप्त हो गयी वत्से ६७. नमाधिता - १३५-२१२ आँसू का सणि-मुकुट पहन. €८ तुमने केवल शब्द दिये १३६

चुनते वसन्त के फूल वसन ६८ व्यथ्थ ज्ञान की खोज श्क्ष

सोक-प्राण

निर्जन में प्रार्थना

इन्द्रिय द्वारों ही से

पत्ते कर

नव खिलती कलियों से

मैं ईश्वर को

परदा-सा उठ जाता

ईश्वरत्व का गौरव

फूट रही तन्‍्मय

सूक्ष्म स्वर्ग की गरघ

देव जन्म लेता

धम्प तुम्हें आनन्द

आत्म नग्न अब जीवन तुम्हें सौंपता हुँ देवत्व जिस पावक से सृजन जीवन पावक

डरो तुम

काल मुझको मात्र घड़ी पल भूठे नवी असम्भव के प्रति सहज सत्य सुन्दर

मेरे सम्मुख आता हँसता 'तुम्हें सौंपकर मुझको झोस बंद, तुम

सूक्ष्म लेखनी की असि से युद्ध करो, हाँ युद्ध * ऊध्वेमुल्ली मनु ही

*फूट पड़ा जो पावनता का ज्यों-ज्यों ग्राता पास गायक बनने को बन्धु जब मैं धरती पर अन्धकार से मत जूको खोल दिये मैंने क्रिलमिल मैं नव किरणें' मु्भे चाहिए फूल परी-सी, पंच तत्व में जल समीर गंगा की-सी धारा बहती पाम तुम्हारे होता हैं जब श्री सुधमा के सन्देश मूक राग हेंप से दग्ध बिछ जाता मन चोष-मान मैं हो हूँ युग का मैंन रहूँ बन में

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श्डढड श्डश्‌ १33 १४६ १४६ १४ १४७ शव श्ष्द श्ड६ श्ड६ १५०

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१६१ श्द्र श्र श्ध्ड

स्त्री श्री-सुन्दरता की प्रतीक प्रिय सुरा पात्र-सा

दयावश छूती तुम भू-पंक मैं मानव चंतन्य

असत्‌ रोको

कौन आा रही सावित्री-सी काम भले हो सृजन शक्ति ज्ञान ज्योति करती नीराजन जाने बहती कैसी वायु खादी के सूतों-सी

सीमा ही सीम।विहीन की लगता, ज्यों पहिली वार कँसे सृष्टि का लूटूँ रस जी तुम्हें समझना

तुम रति सुख को

बहु नाम सुने

भू रज पर मन लोठा करता कल बतलाऊँगा

आस्था जो हो

बह एक मुक्ति

अनुभव से ही बात

आज सबेरे

जीवन प्रेमी हों जन

आज बड़ी कुण्ठा

स्नेह तुम्हारा सदा

जाड़े की प्रिय धूप

पशु स्तर पर

जाने क्‍यों आनन्‍्दवाद के नवल युवतियों

आज सवेरे

तुम रूप सरोवर हो

फूलों की सेज नहीं जीवन अन्तर-नभ से मैं

छनकर गवाक्ष से

आ्राओो, देखें शिक्षुओं का मुस श्रम स्वेद मनुज काया के गुण जिनको प्यारा भू-जोवन नाम धाम का भले हो सौ-सौ आँखों से देख रहा जो देश गरलवत्‌

गूँथ चुका प्रिय वेणी ,

देख रहा हूँ एक यृहत्‌-धव

रद्द १६५ १६५ १६६ १६७ रद्द १६८ १६६ श्६्६ १७० १७१ १७२ १७२ १७३ १७३ श्छ्डं १७५ १७५ १७६ १७६ १७७ १७८ श्द्० श्प० श्८१ श्ष्र श्फ्रे श्प १5५ श्प६ श्ष्छ श्८छ श्ष्८ श्घए श्प्६ श्घ६ १६० श६१ श्ध्र श्६२ श्ध्र श्ष्३े

आत्मबीध कर प्राप्त श्ह्ड बोल रही पहिली कोयल श्हशू कितने कोमल हो लुध १६६ पग-पण पर आनन्द श्६७ पापी नहीं श्ध्द बहत दुःख मेला श्ह्द दर्शन ने युग युग से श्ह्६ स्वप्नों की शय्या पर २०० मेरे मत सर्जना करो २०१ भीतर का सन ही २०२ जीवन के गुण गायें २०३ गंगा यमुनी युग भ्रव र्ण्ड आज प्राविधिक कौशल के र्ण्द जय वाह ला २०७ झास्या २१३-३०२ भगवद्‌ द्रप्टा होते कवि २१७ देश काल कारण छू पाते २१७ - कभी नहीं करते र्श८ बट पादप भू संस्कृति र्श्८ क्या कहता इतिहास २१६ विश्व चेतना में मिल रर२० यन्त्र सम्पता भ्राज श्र कौम बनाता है समाज रर२ महाभाव में मग्त हो सके श्ररे बदल डालता क्यों मनुज॒ २२३ कौन कमी है २२३१ कया उपयोग भला र्र४ सभ्य जगतु यह रद भूत भविष्यत्‌ का समरस्थल २२५ भन्तरिक्ष में आज २२६ वच्च मन्यु अब टूट रहा २२६ देख रहा मैं २२७ अहसास करता अम्बर , २२७ विधक गया वह बल श्र८ अन्तर्मुख उन्‍नत भयत्न २२६ गुग-्युग के कर्देस में २३० साँस-साँस प्रार्थना कर रहा र३० सत्य असत्य गये र्३१ जाने क्या सम्बन्ध र्३्१ कौसे छोड़ तुम्हें सकता २३१ यह महान्‌ दुर्भाग्य रहा रबर

प्रेम महत्‌ है कहीं

अतिक्रम कर श्री-सीता सूंघो धरती का मुख

मन का युग अब बीत रहा पृथक नहीं अब मुझसे कविता शंखताद कर सके

कह देखते वर्ग युद्ध

कौन थो गया काँटे

कवि उर का आक्रोश

अगर मृत्यु से ऊपर उछ्ता कौन नये वे मूल्य

अन्तद्‌ ष्टि मिली जो

आज साँप फुफकार

क्या है अन्त: सुख

शिश्ुत्रों के हित धर एक विश्व है

कितनी घरती हैँ

भाव साधना

बह अपना को

जीवन में घटते

बीते जीवन की स्मृतियाँ हाथ, जन्म दे सकी नहीं निशचय ही बहुमुखी सत्य कहाँ जा रही हैं सरिताएँ भारत का नेतृत्व

पतभर के वन में # जा काँटों का मग

इसमें कुछ सन्देह नहीं

नीचे से निर्माण हमें

अपने भीतर डे सूर्य सूप की त्तरह

तुमको पाकर मैं प्रिय सुमिते अवचेतन की अन्ध शक्तियाँ

२३२ २३३ र्3४ र३४ र३्5 २३६ २३६ र३७ र३७ शेरेप २३५ र३६ २४० र४१ र४२ र४रे रथ २४५ ४९ ४७ २४७ रभरे २५४५३ र५्३े रशंड २५५ २५५' २५६ २५७ रश्5 २५६ बद० २६१

कविते, तेरे सुक्त कल्पना पंखों में २६१

यह कुण्ठित आन्नोश अनजाने ही जाने कैसा स्वप्तों का-सा पट

इसी जगत्‌ में

रजत शिखर मूल स्रोत पकड़ों हब अपने को पुजवाना भी

शेप नहीं अब

श्द्र २६३ रच २६१५. २६५ २६६

* २६७

देदुव

रिक्त पलायन मात्र रही प्रेम और सौन्दर्य कर्म खोज मन अर्थ खोजते हो कविता का घन्य उन्हें, प्रेरणा-खोत जो देख बुद्ध प्रतिमा के बोल रही मुण्मूति महानगर तुम फेनिल हो तुम सिन्धु हिमगिरि, तुमको संदसत्‌ से नित परे ओो सौन्दर्य, जाने बाह्य विश्व से बड़ा विश्व कितना सुन्दर, मिर्छल होता कृतज्ञता दुर्लभ है जग में नारी को होना ही है कुछ भी नहीं नवीन जगत्‌ में शिक्षित भारत भें ग्राज कवि सोचता कलाकार भी आज सांस्कृतिक ऐक्य चाहिए ऐसा दो व्यक्तित्व अगवनु, तुम्हें स्मरण करता हूँ लो, भविष्य भाौकता विगत के समारम्भ भर प्रभी सरलीकरण अधिक शिशु का पालन झभी महत्‌ प्रयोग जगत्‌ में ज्योक्त्ना लिखने के विश्व सत्य सापेक्ष असंशय चैसे से यदि स्नेह प्रिय दनाना किसे नहीं अगवन्‌, जब मैं विवश मुश्ठे करती कविता जब अपनी झात्मकथा प्रिय अप्रिय का मोह हमें अपने-अपने स्वार्थों से प्रेरित स्मेह वाँधता ऐक्य-सूत्र में सूढ़ रूढ़ जग जीवन से हाय, व्यक्ति, क्या तुम

२६६ रछ० २७० र७१ रछर रछर रछ७५ र्५ २७६ र्छछ रछप८ र७८ रुृघ० रश्घर श्प१ २८२ रेषरे रपट र्प५ २८५ २८३ २८७

रद्द

र८घ६ रप६ बद्रंक २€१ हा र६३ रह २६५ २६५ २६६ २६६ र्६छ र६६ श्ध्द च्े०० ३०१ ०१

सत्यकाम ३०३-४३१ जिज्ञासा र्ण्७ जवाला ३१६ दीक्षा श्श्र मन का निर्जन ३२६ ब्राण ब्रह्म ३४१ साक्षार्कार श्श्श क्ह्माग्नि इ७२ आत्म ब्रह्म श्दर जीव ब्रह्म ३६५ गुरुकुल ४०६ मातृ शक्ति ४१६ गत भ्रगीत ड३३०५१८ गीच

आ्ो, गाए ४४० यह मन का परभर है ४४० लोट रहा भू चरणों पर डर पर्वत पर कद निर्ममता के ४४९ सत्य नहीं मानव का ड४र अग्नि लपदों की घ्वजा लेकर ४४३ यही धर्मपथ निश्चित ४४३ साथेक हो भू-जीवन डडड डूबन्डूब जाता फिर-फिर मन ४४५ ऊँचा उठ मन गरुड़ ४४५ रेती में भटका मृग घायल. ४४६ बच्चों को मत जन्म दान दो. ४४६

कीडों-से रेंगते धरा जन ४४७

कहाँ भाव-सौन्दर्य आज ४४८

आज छ्षुद्र देह की इकाई डड8

कौन भावना आज डीडछ

शोभा लहरीन्सी जो स्त्री ४५०

अन्चर्राप्ट्रीय महिला दशक डप्रर्‌

आओ, गढ़ें नया मानवमन डभ्र

क्यों विषण्ण निष्क्िय हो जीवन ४५३

सरल प्रवुद्ध बने जन भू पर. ४५४

आशो, आम्रो ड्भ्र्दू

गाओ, है स्वरशित्पी, गये. ४५६

यागल, हाँ ड्भ्छ

मेरा सन घन इयामल तख्वर ४४८

कभी मुझे लगता डेप

स्वप्नों के रथ पर आ्राम्नो भागो, हम सूरण की फिरणें जी करता बुछ नूतन गाऊंँ भोले शिशुओं में होता भ्रीह्मप्रिय होता नव द्ौंगव मेरी प्यारी वेटी सुमिता पीपल तरु को फहते चलदल देश-काल भय वहाँ रह गया झो सम्पद-लालसा-बृद्ध हाय, दशा दयमीय लाँघ आज मैं प्रपसे मन को क्या मानव का मुख पराधीन यह देश रहा अ्रन्तर्जीवन का सरोज-मुखख खींच-सींच लेता फिर-फिर भन संकट मत लाझ्रो जन-भू पर कैसे करूँ भजन या पूजन फोई नही तुम्हारा यदि भावसमाधि कभी लग जाती मुझे ज्ञात मुर्क गत रत दो कभी रलानि से भर जाता मन नित्य रात को सोते हैं हम सूरज के उदयन प्रकाश से जब तु के. जी. में वृद्ध देह के साथ सम्भव, श्रब थोड़े ही दिन स्वप्नावस्था थी या जाप्रत्‌ कवि का रे कतंव्य न्याय सत्य कैसे हो सकता अनजाने ही एक सहज जब विकास-क्रम को सदा खोजते रहे प्राण

अगीत

छन्द क्या छूट गया तरुण झाग से खेलो ऊरध्वेमुखी लपटों की संघपंण शान्ति है

प्राणों के आग की घ्वजा पाप-पुण्य अस्त

कर्म ही ज्ञान

डॉ ४६० ४६१ ४६२ ४६२ ४६३ ४६५ ४६५ ४६६ ४६७ ४६६ ४3० ४७१ डर डरे ४५ डै७५ ४७६ ४३७ जप ४७६ डे डंपर ४८२ है. 2.8 प्‌ है. £-2 ४८७ ड्दद ४8० ४६१ ४६२ ४६३

ड६७ ६७ अडह्द श्र ड६& ६६ भ्रूण

मन में मेंबर पट गया ५०१ जब धर भावेद है ४०१ तोपें गरजतीं ५०२ सीटी राहुता ५०३ दूषित यायु, दूषित जल ४०३ प्रग्नि-्यर्व मनायें श्ण्ड किमके लिए युद्ध करें भ्र०५ झण बम दहाड़ता हो ५०५ काला बाज़ार, काला वाज्ार ५०६ भणु-दंत्य के मुंह से ५०७ भूठा प्राकर्षण ५०७, अणु-दानव गर्जन शण्द हाम धिरोधार्य है ५०६ विनाश का चाव ५०६ दमकल लाप्री ४१० संसार प्रसार नहीं ४११ झो विरक्त मन ५११ गरीबी हटाझो भ्श्र दहेज प्रथा ५१३ लूट लिया, लूट लिया ५१३ डाकू भी खूब हैं वेचारे भर सुनतां, आराम हराम ४१५ ने झाया भायी हरणाई भ१६ गति, भ्विराम गति ५१७ संफ्रान्ति ५१६-५५५ शान्ति ! शान्ति ! भर२३ दया करो भ्ररे भारत आत्मा को भेजो भर शुष्वा सभ्यता की रेती में भ्र्र्ड भारत का मुख देखो ५२५ नया मूल्य दो हे ४२५ तृप्ति नहीं देता मन को ५२६ महिमामयी जगत्‌ जननी भ्र२६ कर्म-जगत्‌ जीवन निर्माता ४२७ भारत मा को पहचानो हे ५२७ भारत के झन्तस को भर८ अपने ही में पूर्ण स्वयं श२८ जनता के मन के शासक, जय ५२६ हमें सिखाझो ग्राम निवासी भर६ घरती का आँगन इठलाता ५३० श्रद्धांजलि दें हम भू जन को. ५३१

आझो, अपने मन को टोवें -

भ्र्१

कैसा करुणा श्यामल बादल मुझे गये, मैं भारत का जन कौन तुम्हारे गुण गा सकता चेतन हों भारत जन

चन्य तुम्हें हैं भारत जननी आग्रो, हम नव युग विर्मायें नव स्वप्नों से उन्मेषित मन यह जीवल का नव युग दर्शन यह महान द्वेश रे

कहाँ छिपा था प्रवुद्ध

आस्था प्राण घरा जन भारत महाप्राण यह देश

अम्धकार का सागर जीवन आप्रो, नव युग को उल्तति ये भारत जन

सीमा ही में अ्रव असीम यह अनादि से हे मानव आरत के जन ग्रार्म निबासी रूफो, रुको, जनता आती है जिन्दाबाद ! जिन्दाबाद ] मंगलप्रद हो जन-मन निर्णय ओर भारत जन

जन धरणी पर

आश्रो, मिल गार्ये जनमंगल

भ्रेर भरे श्रेरे भ्रेड भरे श्रेर शरद भरे७ फ््र७ भ्र्रे८ रेप ५३६ ५३६ पू्० भ्४ड१ भर श्र श्र भरे भ्रूडड ५४५ ५४६ ४५ प्र्ड

जग के प्रति दायित्व बोध से नयी दिशा यह

यह भारत भू की सम्मोहन हाय, दासता का भारत मन किससे किसका क्या नाता है भू का नव निर्माण करो छपथ ग्रहण की

भारत जन

संगच्छध्व॑ महामन्त्र रे

कब भर सकते

वर अकूल चिन्मय सागर

प्रड८ प्र्द्द भड६ ५५० भर १४९ भ्भर भर भ५र भ्रश् 4.९4

श्री आनन्द कुमार स्वामी के प्रति ५४४

नये संकट ५६-५५ रे एक और भी जगत है भर इमशान नें ५५६ एक नयी ज्योति उतरी हैं भ५७ आज उपहास, विरक्ति भ्रफ यथार्थ ५५६ कहाँ से उतरी नयी ज्योति ५४६ हाम, कविता प्यास बुझा सकती ४६०९ कृष्ठाएँ, कुण्ठाएँ ५६१ कैसा जीवन जिया भर बुहंश ५६३

शंखध्वनि

[यम प्रकाशन-वर्ष : १९७१]

मित्रवर ई० चेलिशेव को सस्नेह

भूमिका

“शंखध्वनि' के भ्रन्तगंत मेरी इधर को नवीन रचनाएँ संगृहीत हैं इन " रचनाओं में मुख्यतः नये जागरण के स्वरों को तथा विश्व जीवन के "भीतर उदय हो रहे नये मनुष्यत्व को रूपरेखाओं को श्रभिव्यक्ति मित्री है कुछ रचनाओं में वर्तमान युग जीवन की विस्तंगतियों के प्रति मेरे मन की प्रतिक्रियाएँ तथा कुछ में मेरे व्यक्तिगत सुख-दुःख की अनुगूंजों को भो वाणी मिली है। यह संग्रह मैंने मित्रवर ई० चेलिशेव को समर्पित किया है। श्रपनी "पुस्तक 'सुमिव्रानंदन यंत तथा आधुनिक हिन्दी कविता में परम्परा और नवीनता/ में उन्होंने मेरे काव्य का जिस आन्तरिक सहानुभूति के साथ गम्भीर आलोचनात्मक अध्ययन करने का प्रयत्त किया है, उसके “लिए मैं उनके प्रति कृतश्ञ हूँ हिन्दी के प्रगतिशील झालोचकों की तुलना में उनकी दृष्टि अधिक व्यापक, गम्भीर तथा सारग्राही पायी जाती है उन्होंने भारतीय जीवन संघ के सन्दर्भ में प्रगतिशीलता को जिस रूप में परिभाषित किया हैं और विदेशी होने पर भी भारतीय जागरण के आह्वान को जिस प्रकार समभने की चेष्दा की है वह उनकी अ्रन्तदेष्टि तथा प्रतिभा का परिचायक है। यदि वे मेरी नवीन चेतनामुलक सांस्कृतिक “रचनाओं का--जिन्हें श्राध्यात्मिक रचनाएँ भी कहा जाता है--पथोचित मूल्यांकन नहीं कर सके तो मैं इसे उनकी सीमा कहकर माक्सवाद ही की सीमा कहूँगा, जिससे उनका मूल्यांकन एवं विचारात्मक दृष्टिकोण अनुप्राणित रहा है, एवं जिस वातावरण में उनके जीवन तथा मन का निर्माण हुआ है। साक्सवाद में चेतना तथा पदार्थ अथवा आन्तर तथा वस्तुगत इप्टि-

पकोणों के सम्बन्ध में वहीं से एक प्रकार का उलझाव पैदा हो जाता है जहाँ से माक्स हीगल के सिर के वल खड़े दर्शन को पैरों के वल खड़ा करना चाहते हैं॥ इससे तब का पश्चिमी आदर्शवाद--जो हीगल में “शिखर पर पहुँचा मिलता है--भले ही पैरों के बल खड़ा हो सका हो पर भारतीय चँतन्यमूलक दृष्टिविन्दु में---जो 'पदम्यां पृथ्वी के प्रनुरूप सदेव ही पैरों के बल खड़ा रहा है---कोई संद्धान्तिक या व्यावहारिक भ्रन्तर उपस्थित नहीं होता भारत में जीवन बोध तथा नैतिक-सांस्कृतिक स्मान्यताएँ परिस्थितियों के अधीन रहकर सदेव ही उनसे ऊपर,

इंसप्वनि /

आत्मबोघ की व्यापक दृष्टि से अनुप्राणित रही हैं। भारतीय संस्कृति में" जीवन मूल्य, चाहे वे व्यक्तिगत हों या सामाजिक, मानवीय मूल्यों के आश्रित रहे हैं भर वे मानवीय मूल्य निरन्तर श्राध्यात्मिक आन्तर मूल्यों पर आधारित रहे हैं। मूल्य सम्बन्धी इन जटिल एवं गूढ़ समस्याओं को तर्कों के आधार पर सुलभाने की चेष्टा करना व्यर्थ है। झ्रागामी कुछ दशकों के भीतर' बिद्व जीवन जो दिशा ग्रहण करेगा उसकी वैचारिक अनुभूति ही मूल्य सम्बन्धी इस आान्ति का निराकरण कर सकेगी इस युग का मूल्यांकन- संघर्ष इतिहास के लिए भी अनेक दृष्टियों से निर्णायक होगा। तभी मेरी रचनाओं में इस चेतनात्मक संधर्प के पद-चिह्नों का मूल्यांकन भी सम्भव हो सकेगा यह सब मुझे इसलिए लिखना पड़ रहा है कि माक्सवादी दृष्टिकोण पर आधारित आलोचना का मेरी पिछले तीन-चार दशकों कीः रचनाश्रों से विशेष सम्बन्ध रहा है। इस सम्बन्ध में 'उत्तरा/ की भूमिका में भी मैं विस्तार से श्रपने विचार प्रस्तुत कर चुका हूँ। मा्क्सवाद केवल मनुष्य के ऐतिहासिक विकास को ही उसका सम्पूर्ण: विकास मानता है और उसमें भी उसके ऐतिहासिक भौतिक विकास को, जिस पर उसके अनुसार मानवीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों की श्रेणी तिर्मर रहती है। मेरी दृष्टि में ऐतिहासिक विकास, श्रत्यन्त' महत्त्वपूर्ण एवं इस युग का प्रमुख संचरण होने पर भी, मनुष्य के समदिक्‌ तथा राशिवाचक विकास ही का द्योतक है सर्वागीण मानवीय मूल्यों के विकास के लिए भ्रन्य प्रकार के उतने ही महत्त्वपूर्ण ऊरध्वे-दृष्टि उच्च संचरण भी आवश्यक हैं जिस प्रकार मध्ययुगीन भारतीय अध्यात्म, जीवन के अन्य स्तरों की उपेक्षा कर, आध्यात्मिक विकास को ही मानव विकास का सर्वोपरि लक्ष्य भानता रहा उसी प्रकार ऐतिहासिक भौतिकवाद सामूहिक भौतिक उन्नयन को ही मानव विकास का चरम लक्ष्य मानता है। भले ही भौतिक समृद्धि की आवश्यकता इस वैज्ञानिक युग में, विकासोन्मुख देशों के लिए, गौण नहीं समझी जा सकती हो, पर है यह एकांगी दृष्टि ही मध्ययरुगों के चिन्तकों ने, ऐतिहासिक संचरण एवं ऐतिहासिक कम की उपेक्षा कर, विचारों-भावों को इन्द्रियों से, आत्मा को देह से तथा श्राध्यात्मिकता को भौतिकता से विय्ुक्त कर दिया था; वर्तमान युग भी भौतिकता को अध्यात्म से, इन्द्रिय-जीवन को झआान्तर मूल्यों से तथा देह को भ्रात्मा या पदार्थ को चेतना से विच्छिन्न करने का प्रयत्न करता है। मूल्यगत दाशनिक दृष्टियों को इस एकांमिता का समाधान केवल तकदुद्धि के बल पर नहीं" किया जा सकता, वे काल की कसौटी में कसी जाने पर ही समग्र रूप से: परखी जा सकती हैं यह निविवाद है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों के इस युग में जन समूह के ऐतिहासिक विकास तथा ऐतिहासिक कर्म का सिद्धान्त प्रत्यधिक महत्त्व रखता है। क्योंकि इतिहास ही मनुष्य का निर्माता नहीं (हीगल), जीवित

| पंत ग्रंथावली

शिक्षित जन-समाज भी इतिहास का निर्माता है (माकर्स)। शिक्षक को शिक्षित तथा शिक्षित को शिक्षक बनना होता है। इस दृष्टि से क्रान्ति का भी इस युग में अपना महत्त्व है। किन्तु विश्व सभ्यता तथा चिहव जीवन भ्रव जिस मोड़ पर पहुँच रहे हैं उसमें मानवीय विकास के लिए दोनों गुणात्मक तथा राशिवाचक, वैयक्तिक तथा सामूहिक दृष्टियों की भिड़न्त झनिवायं प्रतीत होती है, जो दृष्टियाँ भ्रभी अर्ध सत्य ही का बाना पहने हुई हैं भारतीय प्रन्तदृंष्टि अथवा झौपनिषदिक दृष्टि हीगल के आदक्ष- बाद--जो पाइचात्य दाश्शनिक चिन्तन का शिखर है, और जो इतिहास की भी एक प्रकार से उपेक्षा नहीं करता,--तथा मावर्स के भौतिकवाद एवं इतिहास सम्बन्धी दृष्ठिकोशण--दोनों को ही अतिक्रम कर, मनुष्यत्त की पूर्णता एवं मनुष्य समाज के सर्वांगीण विकास के लिए सम्बोधि के उच्चतर अन्तरिक्षों के सुक््मतम ऐड्वर्यों की श्र भी घ्यान भ्राकपित करती है, जहाँ किसी प्रकार की एकांगिता के लिए स्थान नहीं रहता और जो सम्पूर्ण मानव-जीवन के विकास का लक्ष्य है। आज को शब्दावली में, भनुष्य झ्न्तत: पूँजीवादी व्यक्ति की इकाई है, ऐतिहासिक भौतिक- वादी समूह की इकाई वह उस पूर्ण चैतन्य की इकाई है, व्यक्ति और समाज तथा उन दोनों का विकास जिसके अविच्छिन्न श्रंग हैं। मनुष्य- जीवन सम्बन्धी ऐसे सर्वांगीण तात्तिक सत्यों को बूर्वा विचारों के साथ प्रतिक्रियावादी कूड़े की टोकरी में डालने का प्रयत्न कर हम उनके प्रति कैवल अपने ग्रज्ञान ही-का प्रदर्शन करते हैं। मुझे पश्चिम के उन आधुनिकतम दाइनिकों का विन्तम-दर्शन भी श्रधूरा प्रतीत होता है जिन्होंने ऐतिहासिक कर्म की महत्ता को भुला दिया है और जिनमें पाजीटिविस्ट्स, स्ट्कच्युरलिस्ट्स, रिवीजनिस्ट्स, इकजिस्टनक्षियलिस्ट्स आदि, रूडाल्फ स्टेमलर से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित, सभी प्रकार के भध्यवर्गीय विचारक तथा बौद्धिक सम्मिलित हैं ऐतिहासिक विकास कम ग्त्यन्त श्रावश्यक है, पर ऐतिहासिक संचरण ही को मानव विकास के समग्र सत्य का दर्पण नहीं मानता जा सकता, वह केवल मानव विंकास के लिए सामूहिक पीठिका भर प्रस्तुत करता है भारतीय चैतन्य सम्बन्धी दृष्टिकोण अभी अछूता ही है, वह श्रभी पद्िचमी सम्यता तथा वैज्ञानिक थुग की कसौटी में नहीं कसा जा सका है। भ्रभी तो हीगल के आदर्शवाद तथा मास -एंगिल्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का ही युग के जीवन तथा विचार जगत्‌ में संघर्प चल रहा है| श्रव संसार के देश जब परस्पर निकट धाने एवं एक पूर्ण संयोजित विश्व जीवन तथा मानव संस्कृति का निर्माण करने का प्रयत्न कर रहे हैं प्लौर भौतिकवाद अपनी अ्रति स्पर्धा के कारण ध्वेसात्मक तथा अतियान्त्रिकता के कारण सहज मानवीय विकास का दाघक बनता जा रह है, भारतीय चैतन्य सम्बन्धी मांगलिक दृष्टि निकट भविष्य में, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, विश्व जीवन में अवतरित होकर उसका अनिवार्य

इंसध्वनि /

एवं'ग्रभिन्न अंग वन सकेगी। श्राज के भयंकर विइव विनाशक ध्वंसास्त्र (इसी सम्भावना की झोर इंगित करते हैं। सत्य-अ्रहिसा के प्रतीक-मूल्यों

का उदय भी जो भविष्य में विदद जीवन के स्तर पर सार्थकता प्राप्त कर सकेगा--इसी की सम्पुष्टि करता है।

मिन्रवर चेलिशेव को मेरी रचनाओं में प्रभिव्यक्त भादर्श भौर ययार्थ का समन्वय असम्भव प्रतीत होता है पर मैं देखता हूँ कि भ्राज के महान्‌ संक्रान्ति के युग में विश्व जीवन धीरे-धीरे इसी मह॒त्‌ संयोजन की भोर अग्रसर हो रहा है, भ्रागामी दशकों में यह प्रवृत्ति भौर भी स्पष्ट हो जायेगी वैसे भारतीय दृष्टि से यह समन्वय कोई नयी वस्तु नहीं है सभी महान्‌ विचारक और कवि विभिन्‍न युगों में इस प्रकार के सांस्कृतिक समन्वय की ओऔरोर प्रेरित हुए हैं। तुलसी झौर कबीर के युग भी इसी के उदाहरण हैं। भ्रादर्श और यथार्थ एक ही सत्य के दो पक्ष, एक ही मुद्रा के दो मुख हैं जिस प्रकार कली स्वभावत: फूल में विकसित होती है उसी प्रकार यथार्थ को झादर्श में परिणत होना होता है। जो सम्बन्ध एक प्रबुद्ध सस्तुलित समाज में वर्तेमान का भविष्य से होता है, वही यथार्थ का श्रादर्श से भी है। ऐतिहासिक यथार्थ का संचरण भी, जो जीवित दीक्षित व्यक्तियों द्वारा संचालित होता है, लक्ष्पोन्मुख श्रथवा आदर्शोन्मुख ही होता है

फिर भी डा० चेलिशेव की पुस्तक से, सब मिलाकर, मेरी रचनाप्रों को समभने में पाठकों को अधिक सहायता मिलेगी हमारे प्रगतिशील आलोचकों को मेरी रचनाओं का समस्त भावद्रशन जो केवल प्रति- क्रियात्मक ही दिखायी देता है उसका बहुत बड़ा भाग मि० चेलिशेव को भारतीय जीवन संघर्ष के सन्दर्म में प्रगतिशील प्रतीत होता है।॥ मेरा भाव-दर्शन माक्सवाद का खण्डन कर उसकी पूर्ति करता है भर मेरे काव्य में उस पूर्ति का रूप मेरी चेतनात्मक रचनाप्रों में मिलता है। इन रचनाप्रों के सम्बन्ध में [चेलिशेव के इष्टिकोण की दुहाई देकर हिन्दी के कुछ प्रगतिशील तोता-पण्डितों ने उनके प्रतिक्रियात्मक होने की दुन्दुभी नये सिरे से पीटनी शुरू कर दी है। त्रमासिक “आलोचना” के १३वें श्रंक में 'लेनिन जन्म शती का एक भ्रालोचनात्मक उपहार' ज्षीपंक लेख इसका एक उदाहरण है हि

यद्यपि प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं का चेलिशेव की पुस्तक से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है फिर भी उनके दृष्टिकोण के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट कर उनकी व्यापक संवेदनापूर्ण इष्ठि के लिए उन्हें धन्यवाद देता मैं भ्रपना कर्तव्य समभता हूँ।

१८/बी-७, के० जी मार्ग, इलाहाबाद | सुमित्रानंदन पंत २५-१२:७०

* | पंत प्रंयावलो

चह॑ अनगढ़ मैंने

सण्ड था... भीतर तपकर, कर सेंडकर, कहीं सिमट कर,

* शक्ियुस उतारा, शरि

है सेंवारा ! लोग रे वतलाते, देख देख कर नहीं ला वह तो प्रेम, पुम्हाया »| व्यय अर को हा हु

१६७१

सूर्य मुकुट बीसवीं शतती के बन दिगू भास्वर आझ्ो है नव वर्ष, अवतरण करो घरा पर! खोलो विकप्तित राष्ट्रों के जड़ता के वन्धन, मनुष्यत्व में जो जन-भू पर सब से निधन! दानवीय घ्यंसास्त्रों का कर जो नित संचय, वैज्ञानिक कौशल का करते घोर पअ्पव्यय ! तोड़ो कदु श्ंखला देन्य जजंर भूजन की, सुलभ जितको सुविधा अन्न वसन आगिन की ! प्राप्त नहीं शिक्षा संस्कृति के साधन विकसित--- क्षुधित अविकसित देश तुम्हारे प्रति श्राशान्वित ! सृजन हांख फूँको हे, ग्रन्तःस्वर से मुखरित, नव जीवन उन्मेपों से जन-भन हो प्रेरित ! शान्त धरा देशों के हों स्पर्धा-संघर्षण, राग-द्ेप के भरें हृदय के रक्त ख्रवित ब्रण ! काल दूत, विज्ञान ज्ञान में भरो सन्तुलन, नयी चेतना का प्रतीक हो जन-मू प्रांगण !

देवोत्थान

अधंशती से

हम मानव में

दानव को करते श्राये

अभिषेकित !

गहन मनोवैज्ञानिक स्तर पर

पश्मु भ्रवृत्तियों को

जन जन के जीवन मन में * करते झाये स्थावित! अगले कई दशक सम्भवतः

बीतेंगे अब पु देवों से फिर

मानव अन्तर को करने में मण्डित--

१० | पंत प्रंयावलो

मानवीय जीवन को भावी घरा स्वर्ग में करने पूर्ण प्रतिष्ठित ! कितना कार्य अ्रभी करना है--- सोच सोच कर विस्मम से अभिमूत कभी हो उठता अन्तर ! सुन्दर बाह्य प्रकृति जग,-- इससे भी सुन्दरतर मानव का अन्तर्जग--- सूक्ष्म विभव से भास्वर [ भ्रन्तर्मुख हो हमें खोजना आत्मिक वैभव-- उसे अवतरित करना मू जीवन में अभिनव ! उर में भन्तहित शोभा के भुवन अ्रमोचर इन्द्रलोक की सम्पद्‌ भी जिन पर न्योछावर ! इन्द्रचाप पुल पर चलतीं अप्सरा मनोहर सृजन चेतना नभ में स्वप्निल नूपुर घ्वनि कर ! भूक अचेतन उपचेतन लोकों के गह्नर जाग गुह्य तन्द्ा से मन में भरते ममर! देवों का हो स्वर्ग महतु-- पर जन धरणी पर रचना हमको मानवीय नव स्वर्ग महत्तर-- मन के पशु को, दानव को कर दर्न: उन्तमित--- आश्नो, भूजन, करें विदद जीवन नव निर्मित !

संक्रान्ति

पीले पत्तों में लपेट दी तुमने पाण्डर विश्व प्रकृति की देह--घूल से सेंजो क्षितिज मुख !

शंखध्वनि / ११

मुक्त दिगम्बर अन्तरिक्ष दिखता चिन्तन रत, सुन्दर लगता मौन दृश्य संहार सृजन का !

यह शिव का हो महा इमशान--शून्य, भवत्मावृत,

जहाँ जगत-जीवन लेता नव जन्म निरन्तर--

वरद अष्टमुख तत्वों की पावन छाया में !

गर्भित विश्व प्रकृति--भावी की स्वणिम कोंपल

जाग रहीं स्वप्तिल तन्द्रा से, युग चेतन हो ! मानव के अन्तजंग में भी गढ़ अगोचर महा क्रान्ति श्ब मची हुई--चेतना विटप में मग्त हास विघटन का पतकर छाया दारुण ! अन्ध धुन्ध में देख पातीं मत की आँखें-- अन्घकार ही भाव-गमूल्य बनता जाता अब!

मृत्यु च्ास संशय-हिम जर्जर, श्राध्या विरहित

देख पाते लोग झ्ोट में दिगू विनाश की

नया मनुज ले रहा जन्म भ्रब नये विश्व में !

३.

चाद

मुझे नहीं भ्रच्छा लगता कि चाँद में जाकर

चन्द्र पटल को खोद, क्रूर भू-मानव नोचे

शशि का चाँदी के दर्षण-सा हँसमुख आनन,--

घायल कर सका कोमल उर लौह नखों से ! आज पूर्णिमा का, सरोज सा फुल्न, सुधाकर कितना सुन्दर लगता, राजहंस सा तिरता रजत नील सलिलों में--स्वप्मों के सुरधनु-पर खोले स्वणिम अन्तरिक्ष की शरद-विभा में ! सम्भव, दूरी के कारण ही, उसके विक्षत गौर अंग में लगी खरोंच नहीं दिखती हो!

वह स्वगिक सौन्दर्य कलश सा, उसी भाव से

स्लेह सुधा रस चृष्ठि कर रहा भू-प्रंचल में,--

भुला रकत-प्रिय बर्बर नर के उत्पातों को ![---

जो धरती को दैंन्य दुःख का नरक बना अब

चन्द्र लोक में सीड़ बसाने का साहस कर

स्पर्धा का अभियान वहाँ ले जाता गवित !

अति यान्त्रिकता

निर्मल अब आकाश ! घरा दिय्‌ ज्योति स्नात सी सुन्दर लगती ! बीत ग्रये झड़ 'भंका के दिन! निखर उठी अब सृष्टि सद्य जन्मे नव शिशु सी ! शान्त समीरण--वास रोक एकाग्र समाधित !

१२ | पंत प्रंधावली

पत्र अकम्पित, नम्न क्षितिज, हरिताम धुले तर--

ऐसा उज्ज्वल स्पर्श विश्व का मिला पहिले !

सम्भव, श्राँघी पानी दुदिन से पीड़ित जग

ऐसी सौम्य पवित्र मनःस्थिति अनुभव करता | वर्तेमान भड़ अन्घड़ तूफानों का यग्रुग भी रौंद रहा अब मनुज जगत्‌ को--अपनी यान्त्रिक लौह भयंकरता से--ध्वंसात्मक टापों से ! अट्टहास करता कंकाल खड़ा अन्त्रों का! परिवर्तित हो रही पीठिका--मू जीवत की--- उद्देलित चेतना !--चतुर्दिक्‌ उथल-पुथल सी मचती जाती,--जड़ यान्त्रिकता का आडम्बर बढ़ता जाता ! सिमट रहा जन-जगत्‌ विवश हो, सर्पों की ऐंठी रस्सी सा! देश विपले पाशों में कसते जाते हैं, भोतिकता के जड़ विद्युत्‌ दंशों से प्रेरित !|--कहाँ आज जग, किघर मनुजता, क्या ध्रुव लक्ष्य| ---न सम पा रहा मनुज बुद्धि-हत ! **दानव-्से संगणक यन्त्र ही संचालित कर पायेंगे सम्भव भविष्य में मनुज नियति को, जग जीवन को ! स्वयं मनुज बन रहा यन्त्र प्राविधिक तन्‍्त्र कौशल में दीक्षित

कम्प्यूटर ही कम्प्यूटर अभ्रवः रह जायेंगे

कल के जड़ जग में--विस्थापित कर मनुष्य को !

वही सिन्छु आन्दोलित, जटिल, परस्पर गुम्फित

महत्‌ विश्व जीवन को स्यात्‌ धघरें सुव्यवस्थित,---

वहिर्श्रान्त-तर कृमि सा रेंगेगा तब भू पर ! या सम्भव, नर आत्म-बोध से अ्रभिप्रेरित हो भ्रन्ध धुन्ध से ऊब यन्त्र युग की फमा के, विचरण करे नये क्षितिजों की निर्मलता में यान्त्रिका के घूर्मों से उन्मुबत विद्व में मनुष्यत्व को यन्‍्त्रों के ऊपर स्थापित कर

और, तड़ित्‌ श्रणु के अदइवों की रश्मि खॉंचकर

खोजे अन्तर्मुख जीवन-सौन्दर्य, शान्ति, सुख!

सृष्टि तत्व

ब्राज जीन” की सफल प्राप्ति से जीवन का वह

गुह्म सूत्र मिल गया दिव्य प्रतिनिधि मानव को,

जिससे वह स्नरप्टा बन सकता अपना भी अब ! भले अभी प्रारम्भिक हो उपलब्धि तत्व की, वैज्ञानिक उसके विकास के भ्रति आश्यान्वित !

शांंखघ्यनि / १३

महत्‌ जैविकी सिद्धि घटा पर होगी तब वह, तडित्‌ श्राणविक आदि क्रान्तियों को झतिक्रम कर जँवी क्रान्ति महत्तर होगी लोक विधायक ! जीव जातियों को दे जन्म विविध पृथ्वी पर, मनुजों का निर्माण कर सकेगी वह बहु विधि !

निश्चय, घोर भयंकर दु:स्थिति भी भ्रा सकती---

शुम्भ निशुम्भों की रचना कर भनुज-ब्रह्म तव

ध्वंस धरा पर ढा सकता--स्वार्थों से प्रेरित !

ऐसी स्थिति में, नैतिकता, प्राध्यात्मिकता का

मूल्य और भी बढ़ जायेगा भू-मंगल हित !

नहीं, उभय प्निवायं सत्य तब बन जाएंगे! क्या होगा नव रूप घर्म या नैतिकता, आध्यात्मिकता का ? वे बेंठे रह जायेंगे तब जाति-वर्ग या सम्प्रदाय-गत संस्कृतियों में ! निखिल विश्व ही होगा तव ईश्वर का मन्दिर-- भू के रचना कर्म सभी होंगे प्रमु पूजन! निराकार साकार रूप घर मनुष्यत्व में घरा-स्वर्ग आँगन में होगा मूर्तिमान तब !

एक मनुज परिवार, एक नव मनु की सन्तति

विचरेगी भू पर--मण्डित हो सूक्ष्म विभव,

आनन्द, ज्योति, सौन्दर्य से झमित अधिमानस के !

आन्ति निवास करेगी जन के रोम रोम में! सृष्टि प्रयोजन विधि का सार्थक हो पाएगा-- शिव से शिवतर, सुन्दर से सुन्दरतर पथ पर सत्य स्वयं विकसित होगा, मिथ्या-रज विरहित ! प्रमु, विज्ञान मनुज॒ को लाये निकट तुम्हारे ! शुभ दिन आये श्षीघ्र,--घरा की लौह नियति हो श्री-सुख स्वणिम--अमृत चेतना स्पर्शों से आलोक मंजरित !

स्थित प्रज्ञ

अब सम्भव स्थित प्रज्ञ हो गया मेरा अन्तर--

बुद्धि देख लेती मन में उठते भावों को,

झर सहज ही मूल्यांकन कर, निर्णय अपना

दे देती--बे विश्वकर्म में परिणत हों या

रहें उपेक्षित ! इससे कर्मों के बन्धन में

चित्त नहीं फेंसता, सत्कर्मो में रत रहता! पर, इससे भ्रसल्न हूँ क्‍या मैं? नहीं, मुझे जीवन का क्षेत्र अधिक भाता मन की स्थिरता से !

१४ | पंत ग्रंथावली

पवित्रता,

एक बृहत्‌ आायाम प्रकृति की श्री सुपमा का पवित्रता भी है निःसंशय--तृण तर पत्ते, धूप शीत, वर्षा पतकर हो, हिम बसनन्‍्त या-- सभी वस्तुओं, सभी वृत्तियों में मिसें की पवित्रता का पुलक-स्पश मिलता प्न्तर को | -- घरती की भगवत्‌ पद रज भी रहित उससे !

जब मन प्रसफल इच्छाप्ों से कुष्ठित रहता,

या जब सुहद भ्रकारण ही बरी बन जाता

जिससे आप प्पेक्षा रखते सहृदयता की--

मीरस जीवन भार-रूप तब लगता दुः्सह !

कट जाता मन किसी महत्‌ केन्द्रीय सत्य से

जो मेरी सत्ता का पोषण करता श्रविदित ! दाने, स्वतः ही हो संयुक्त प्रकृति फे जग से मैं बन जाता प्रृंग विश्व जीवन का व्यापक-- स्थूल वनस्पति पशु पक्षी जय को झतिक्रम कर प्रकृति, मा जगमें बन सूक्ष्म, जटिल, निगूढ़तर, प्रकट हुई है जीवन मन के दिव्य विभव से रद होकर ! --देव भाव की प्रत्याशी बन !

किन्तु, एक भ्रज्ेय सत्य जो व्याप्त चतुदिक्‌

मिलता मुझे निसगे जगत्‌ में,--अभिव्यवत सम्भवतः

नहीं हुआ मनुष्य में ! वह है मूमा का विराद

सौन्दर्य अनामय ! जो पावक स्पकज्ञों से छूकर

मनुज प्रकृति को तीर्थ स्‍्नात, तन्‍्मय, प्रन्तःकेन्द्रित

कर देता--निज असीमता की पवित्नता में

सद्य/स्मित (--वही शुअ सोन्दर्य मुझे

करता आकर्षित,--मौन समाधित !

सम्भव, इस सामूहिक संस्कारों के युग में

उस विराद्ता से वंचित रहे मानव जग !

कला की सार्थकता

क्ैक्टस थुग भ्रव विद्यमान साहित्य, कला में,--- अभिवादन करता मन ! संवेदना बह रही उपेक्षितों, दलितों, विक्वतों के प्रति--असंख्य जो ! वांछनीय यह सभी भाँति--मू की कुरूपता मिटे, हंटे दारिद्रय, छेंटें दुदिन के बादल ! कैक्टस प्रमुख प्रतीक झाज विकलांग जगत्‌ का

देख सके सौन्दर्य असुन्दरता में भी मन,

क्योंकि भ्रसुन्दरता केवल संकीण्ण दूष्टि भर !

कैक्टस हो कर्दम--सव कुछ ही सुन्दर जग में !

१६ / पंत ग्रंथावली

संधर्षण करते भ्रविरत वे _जय जीवन से-- उसे बदलना कठिन जानकर स्वयं बदलते, “निज स्वभाव झूचिं का भी भूल्य समझ इस क्रम में ! शने: छोड़नी पड़तीं उनको वे सब स्थितियाँ बहिरन्तर कौ--जो दुर्गंग पथ बाधा बनतीं !-- जिन्हें हृदाना सम्भव नहीं व्यक्ति के बल पर !

हे स्वर्ग दया भी नहीं सहायक होती ! उसको

बाह्य भोग से झात्म योग समधिक श्रेयस्कर !

कहीं छिपा साक्षी श्रन्तर में उनको चुपके

* झात्म भनात्म, प्रसत्‌ सत्‌ की पहचान बताता,--

सूक्ष्म दोध दें व्यक्ति विश्व के संग ईइवर का !

शेष सम्पदा अनुभव पवव वृद्ध शिशु उरमें

रह जाती जो,--वह श्रसंग चैतन्य सत्य की, जो उसका चिर साथी रहता प्रन्तिम क्षण तक !

ऊहापोह

ऐसी भी होती मन की स्थिति कभी किसी दिन * जब कि विरोधी इ॑ष्टकोण दो उभर चित्त में गूढ़ समस्या बन, करते शआझाक्रान्त बुद्धि को! मंगल , शरति हों खड़े सामने क्रूर परस्पर ! दुःक्षण में सम्यकू कत्तेव्य. समभना सहज नहीं होता ! “दुविधा में पड़ जाता मन ! बड़ा कठिन होता अपना विश्लेषण करना! सह स्वभाव की सीमा होती और शक्ति भो, जब कि गहन मन्यन्‌ करता मन--भू जीवन के इन्दों में उलभा-नप्रकांश पाने को बूतन! समाधान मिलता: सदा ही श्रात्म-सुष्टिकर !' सुधी 'गतागत' पर “सोच करते--गीता की सूक्ति सान्‍्तना देने, में जब॒ सफल होती--- पर देता छोड़ समस्या का निदान मैं! मौत : अतीक्षा:: करता हृदय प्रमन्ने बोध की, चित्त शान्त हो, स्वयं प्रशन' का बनता उत्तर”! 48 का ०7 आम.

प्ररती :से रज देह 'सींच कर अटल : जसूर्य किरण से शक्ति खींच कर ६« ज्|यटा *रेए : ;मैंहोती वरधित, रस पोषित !

१८२ पूंत:प्रंयावली

छक बात बतला दूँ गोपन-- पृथ्वी सूर्य-प्रभा से भले ग्रहण करती मैं पोपण,-- * अपने ही अस्तित्व बोध से मैं उन्मेपषित, अपने ही भीतर से रहती सहज उललसित ! घुटनों घुटनों पहुँच मनुज के जब अल्हड युवती सी करती ताक भांकि मैं बाहर-- मुझे सुनायी पड़ता--दुस्तर उदर'““उदर'* “हा उदर ! सोच मग्नं, विस्मित' सी होकर कहती मैं मन ही मन--ईश्वर ! यह मैं कैसा करती अनुभव जीव धारियों का.किरोट जो भानव जिसने रचे समाज, सभ्यता, संस्कृति,-- महत्‌_ विश्व इतिहास शिल्प साहित्य ' कला जिसकी कृति,-- घमें, ज्ञान, विज्ञान मनुज गोरव उद्घोपक, अन्तरिक्ष .. भ्रभियान साहसिंकता 'का- द्योतक | -- छ्ुद्र पेट के बल बह कृमि सा रेंग घरा पर अणत गिड़गिड़ाता, घिघियाता नंगा पेट दिखा कर ! तृप्त विश्व के सभी चराचर सदियों से केवल भूखा नर! हम मानव के संवर्धेन ' हि कि करतीं अपना जीवन अपित-- आस्‍्य, , द्यामला धरा उर्वरा उपजाती नित अन्न अपरिभित ! -->र- फिर भी पेट नहीं भरता

मानव का. भूखा-- पशु पक्षी रहते प्रसन्न. खा झ्खा सु 26४,

खाद्य पदार्थ जगत में अग्रणित | नहीं मिटती मानव की किचितु! .

“कुछ रहस्य 'होगा ही इसका गोपने--- रे - खाद्ये. समस्या पर_ में तब से है करती ' आबी चिन्तन !

* झंबष्दति | १६?

मुमक्को लगता-- मात्र पेट की भूषण नहीं यह निश्चय, उसको मनुज तृप्त कर सकता उपजा भू-से अमित अन्त भण्डारों में कर संचय )! चिर असृप्त पर पेट स्वार्थ का वह कभी भर सकता, अति भोगी रे उदर लोभ का जो अघाते थकता! दोनों. क्षुधा अ्रवेतन मन की, क्या कर, सकती धरती, जीवन की तुप्पा . भ्थाह वह नहीं किसी से भरती! दानवीय उर दैन्य ने त्रिमुवन की लक्ष्मी , हर सकती, नारकीय तम गते भअ्रमरों की सम्पद॒ तर सकती [

खेती आवश्यक, . प्रनन॒ उगाएँ-+ ०. साथ निराएँ हर तृष्णा के सर कॉंटक !! वितरित

जन . में श्रम फल घरती को मिटे विपमता,

विकसित हो . के आत्मिक बल, , . - सित संयम से झाती समता! मैं मुघा सोने की बाली ., प्राण हरित, रोमांचित--,

हक

8८

कहत्ती-- निज, जीवन', कर , अवित-- बहिरन्तर सम्पन्न भनुज हो . आत्म , बोच से प्रेरित | शुभक्षण ,

घायल सब;जग, घायल अब भय से जन का मन छाये हैं दारुण विनाश के- दानव दिग्‌ घन ! क्या तोपें तलखवारें व्यर्थ --करेंगी लड़कर ? सुलग रही विद्रोह वह्ति श्रव ,भीतर बाहर!!!

२० | पंत प्रंथादली

ऑब्कार ही विश्व सागर से निशसृत, शत ध्वमि वर्णों भावों में नव जीवन मुखरित,-- शुशत्र जागरण का पाद्वान ,.; सुनो सव स्त्री -नरं

धूप का दुकड़ा

एक धूप का हेंसमुख दुकड़ा तरु के हरे भरोखे से मर अलसाया है धरा घूल पर-- चिड़िया के सुफ़ेद बच्चेन्सा !

उसे व्यार है भू रज से लेटा है चुपके ! वह उड़ कर किरणों के रोमिल पंख . खोल तर पर चढ़ ओझोभल हो सकता फिर अमित नील:में ! लोग समभते मैं उसको व्यक्तित्व दे रहा कला स्पर्श 2९ 05३ मुभको लगता « बही:कला को देता निज व्यक्तित्व स्वयं व्यक्तिववान्‌ ज्योतिमेय जो ! भू-रज में लिपटा श्री शुश्र घूप का टुकड़ा वह . रे स्वयंप्रकाश अखण्ड प्रकाशवान्‌ !

बे

भारत भ्‌ मु

युग युग की आस्था मन को डग्रमगा रही भ्रव, धरती सा धीरज भी भूजन खोते श्रपना, रक्त-नखर-द्वंष्द्रा_ निर्मम यथार्थ के सम्मुख मानवीय झादशवाद सब लगता सपना ! औंधे मुँह गिर पश्चिम के जगमग प्रभाव में अन्ध अनुकरण -करते नव शिक्षित पग पम पर, भूल शयी- भू अपना ,अन्तर-अआलोकित जीवन -स्थितियाँ होती जातीं प्रतिदिन दुस्तर !

के

२२-/-पंत्त ग्रंथावलो

» आर वह गथार्थ के 'माप तोल की तुला नहीं/-- संमण 7- ज्ञाव बदलता रहता जिसका: दिन प्रतिदिन, मानव ग्रात्मा'की गरिमा का ज्ञान उसे

“४ जिससे सार्थक होते जीर्व॑न केः पल छिल | शब्द नहीं हैं जहाँ, भाव भी हैक जहाँ, वह अवाक नीरंबता को देता बाणी// | /| सोमी रहती जंग के कोलाहल में जो. निराकार की प्रतिमा गढ़ता कल्याणी! . हि 5 शआन्‍्दोलित जन सागर जेब भरता गजब ध्यान मौन सुनता यग्रुग परिव्तेन के स्वर,

सौम्य चन्द्र सा सुक्ष्म' ज्योत्ति बरसाता वह

2 जन ' धरणी को नव जीवन ज्वारों से भर! निखिल विपमताएँ स्वरूलय में बँध जातीं

» बनता युग-संगीत जगत्‌ का संघपंण, » कंटु यथार्थ ढल नये विश्व आादशों में मंगल घन वन वरसाता नव भावनसुमन ! वह महानता में लघु, लघुता में भहानु,

वह्‌ विशिष्टिता से विशिष्ट भी साधारण,

रक्त, मांस पेशियाँ, अ्स्थियाँ गातीं| सब

रचना-शुभ प्रति निश्चिल भक्ति उसकी श्रपंण

&

संक्रमण मि हा विस्तृत लगतीं रुद्ध दिशा, झाश्चर्य चकित सा अम्बर, सेंदियों का दारिद्रय देत्य अब जगता_ झेंगड़ाई भर !

करवट लेता जन-भून्‍जीवन, भनः सिन्धु आन्दोलित,

अन्धकार की गृहा घरा की अरब धीरे आलोकित !.

प्राणों में रस ज्वार, चैतना'में प्रभात का स्पन्दन,

नयी एकता में बंधने को मानव का खण्डित मन! _.

नव सौन्दर्योन्मिप मनोनयनों को रखता' विस्मित,

निर्खर रहा मातव का सुख नव गरिमा रेखा मण्डित ! खोल दिये उपचेतन निरंचेततन ने गोपन' गहूर रुकी हुई थी विश्व प्रकृति कव हो उसका खूपान्तर !

अनगढ़ पाषाणों से मणि रत्तों को छौट सेजोकर

नव मूल्यों के दैभव से गढ़ना मानव का अन्तर !

यह महान्‌ संक्रान्ति काल सुतता मैं फिर डमरु स्वन, परिवर्तेत खेलता फाग, युग करता ताण्डव नतेंन !

« » खड़े सामने जन्म मृत्यु, विप अ्रमृत, भीम श्रौ' सुन्दर,

* विजय पराजय, हास प्रगति का रूपक ! दृश्य भयंकर जीवन' संघर्षण को देती नयी दिशा लोकोत्तर सृजन लेतना के सुनता मैं दिद्टू मादन वंशी स्वर!

२४ | पंत प्रंथजलो

युगरमणी

आज सभी क्षेत्रों ' में स्त्री नेतृत्व ग्रहण कर

श्रागे चढ़ती--लाँघ देहरी घर आँगन की ! --

डाक्टर, इंजीनियर, प्रशासक, प्राध्यापक वह

पुरुष वर्ग से होड़ ले रही गुग-जीवन, की ! पर्वेतरोही, सेनिक, कुशल यान चालक वह, युग-प्रवुद्ध, शिक्षित, समर्ज निर्माता नारी, व्वह्‌ स्वृतन्त्र, नर की समकक्षी, नेता; मन्त्री, झबला अब सबला कहलाने की अधिकारी !

पुरुषों के गुण आत्मसात्‌ करती बह प्रतिदिन,

यन्त्र सभ्यता की भी माँग यही निःसंशय,

* किन्तु कहाँ वह सुघर शील सुपमा की प्रतिमा

भ्रन्तश्चेतन गरिमा उर में भरती विस्मय !

फूल चाँद, पिक मृग, चलोमि ऋप---निंखिल प्रकृति के

श्री शोभा उपकरण प्रणत थे जिसके सम्मुख -- बाहाँ श्रनिरवंचचीय नील सा उर रहस्यमय, मर्यादा का मघुर मुकुर स्मित लाज मौन मुख !

निखिल सम्यता बनी प्रसाधन युग रमणी की,

« “पर श्रन्तः सौन्दर्य खो गया--प्रमुख विभूषण,

भोग तल्प वह मात्र--न श्रद्धा पात्र प्रीति की-

हृदय-सत्य ही साध्य--सम्यता-संस्कृति साधन !

'वस्तु बोध |

वस्तु' जगत्‌ चाहिए सम्य नर को अरब,

» भाव गीत से *ऊंब गया उसका मन ! 'अब' रवीन्द्र संगीत भाता 'उठर को 'बहरे हृदयों को न॑ ' हिलाता गायने, सूक्ष्म कल्पना की “उड़ान पर हंसते, उन्हें स्थूल मंगुर के प्रति आकर्षण !

कला तुच्छ कुत्सित यथार्थ की सेवक,

काव्य अवब' सौन्दर्य बोध का दर्पण,

यौद गन्ध प्रति अन्धच प्राण मन प्रेरित्त

त्रास, अनास्था, संशय के उर में ब्रण ! परिवर्तेत युग : ग्रुह्म अचेतन से जग 'घुणित विकृतियाँ उमड़ रहीं मन में छन,

'विघटित मूल्यों के ह्ासोन्मुख युग में “॥; 5: स्पर्धा कुत्सा का उर में चलता रण!

/ “भाव भूमि नव उदय हृदय में होकर

)०. अन्तर में सन्तुलत भरेगी नूतन,

शंखध्वनि रह

नये सत्य का ज्योति स्पर्श पा जन मत मनुप्यत्व॒के प्रति होगा नव चेतन! वस्तु जंगत्‌ की सीमाएँ अतिक्रम कर भाव बोध नत्र भरता उर में स्पन्दन !

विकास क्रम

मानवीय संवेदन शून्य धरा जीवन भव +-- निखिल यन्त्र सम्यता, विश्व की श्रतुल सम्पदा पृत्ति नहीं कर सकती इस दारुण श्रमाव की !

एक और भू के असंख्य जन गण का जीवन

विगत युमों की रूढ़ि रीतियों में पथराया

मतुज चेतना के विकास पथ का अवरोधक !

ओर दूसरी शोर श्रासुरी भौतिक युग के

विपुल विभव, सुख सुविधा का आकांक्षी मानव

भोगवाद के पीछे पागल, वहिर्आन्त हो,

भूल गया--बहुविधि स्थापित स्वार्यों से जजेर,/

बह प्रतितिधि भावी नव भू जीवन विकास कॉ---

कदु स्पर्धा से दंशित ऋय-विक्रय के जग में ! ममुष्यत्व से विरहित नर-पशु विचरण करता अग्न घश पर,--अन्तर्मूल्यों से वियुवत्त कर इन्द्रिय जीवन का भंगुर सुख ! मध्य युगों में ज्यों विभवत था भाव-बोघ इन्द्रिय जीवन से !

लौह यान्त्रिकी की सन्‍्तति रोबॉट, संकलक

स्थान ग्रहण कर रहे मुक्त मानव झात्मा का-

निमित कर परिवेश जटिल कृत्रिम स्थितियों का,

जकड़ मनुज जीवन को यन्त्रों के पंज़ों में | --

ईश्वर ही रक्षक अब हृदयहीन मानव का ! भीम भयंकर मोड़ ले: रही मनुज सम्पता दुर्बेल हृदय तनिक कल्पना भी- कर सकता जीवन की उस नयी भूमिका का--गत सीमित अम्यासों - में बंधा मनुज-मन अ्रक्षम “उसके !

पिघल मोम से जायेंगे जग के विधात सब

भाव ऊष्णिमा में वह नव प्राणिक जीवन की---

महत्‌ ज्वार उठ विश्व चेतना के समुद्र में

प्लावित कर देगा सैकत तट विगत युगों के | ---

महत्‌ सौख्य सौभाग्य मनुज के लिए सुरक्षित !- -

लाठी का घोड़ा

* 4 है छुटपन में मुझको प्रिय था लाठी का घोड़ा उसने तब से मेरा साथ नहीं ही छोड़ा !

२६ | पंत ग्रंथावली

सौ सी रूपों में अमूर्त श्री ओभा होती स्वयं 'जहाँ साकार समाधित उरे चिन्तन'में अभिव्यक्ति की इन्द्रधनुप रलच्छायाएँ छलोंटां सी करतीं. उन्मेपषित उर-ऑँग्न में-- मुझे प्रेर्णाग्रों, उन्मेपों के उस - जग में नव प्रहर्प की सित वाँहों में भर ले जाओ! स्वर्ग सुधा के घट पर घट पीते म्‌ अ्घाता' ' जहाँ युगों से प्यासा निश्चेततव उपचेतत, तृप्त महीं होता तुमसे सर्वस्व दान पा जन भू के प्राणों का अक्षेय आकुल यौवन ! जहाँ प्रतीक्षा में रत प्रेम, मनुज भावी के अन्तर्मूख मणि सीपानों पर मुझे उठाग्नो ओऔ्ी' सेरे साथी, परावनता को ओआभा .में मेरे तन मन प्रा्णों को' अहरह लिपटाओी !

अनुपमा 6 पक 2

वाल भवन में तुम्हें देखकर झ्ाज अनुपमें, /*

आत्म पराजित झनुभव करता मैं निज मन मैं---

कैसे तुम्हें उबाझू 7--मार्ग मुर्के सूकता !

अह, कसी दयनीय मलिन स्थिति में रहती तुम

छोटे बच्चों की संस्था में पड़ी उपेक्षित-«

मानव उर की निर्ममता का नरक «हार जो [। तुम्हें गोद लेने को आाठुर तब 'से मेरा हृदय तड़पता---तुम निरीह सुकुमार बालिका, हिम निपात अ्रप्ति हत प्राणों की कलिका कोमल!

तुम हो कुछ श्रस्वस्थ, - चिकित्सक कहते मुझसे :

एक पैर की हड्डी में सूजन है सम्भव;--

मैं इसका उपचार कराऊंगा, निष्ठा से

पालन पोषण का दायित्व सेभाल तुम्हारा

सार्थक सममूँगा अपना जीवन, प्रिय दृहिते! .. -.६ «३७

लुमसे सुन्दर कन्या मुझको नहीं चाहिए! ' तुम सुन्दर बन सको हृदय से--पा अनुकूल परिस्यिति, रुचिकर शिक्षा दीक्षा,-उन्नत संस्कृत श्ील-सौम्य संस्कार प्रहण कर सको निरन्तर,--- मन, का ही सौन्दर्य चाहता .हूँ मैं -तुमसे !

स्तुतिकेप्रति

एक किरण उतरी आँगन में मैं उसको कहता स्तुति मनः कक्ष में छायी नीरव उसकी स्मित शेशव युति !

घ॒स प्रार्थना सी बह 5.3 उठकर धीरे ऊपर ईइवर का मुख देख सके अनिमेष हृदय में छवि भर !

३२६ | पंत ग्रंथोंचली

उतर वस्त्र सा देह-बोप छायान्सा गिर चरणों पर अपने ही में उसे प्रनावृत स्थित्‌ रस सके निरन्तर !_ शूल फूल की जीवन बीवी में विचरे बह निर्मय, जग के इस्दों से हो परिचित, भू-जन केः प्रति सहृदय ! घरण चिद्ठ जो परती की रज में हों उसके प्रंकित दीपित हो उनमे युग का पय--नयी लीक हो निमित ! रचना की दाक्तियाँ प्रेरणा पाएँ उसके मुस्स से, निज सुर में हो प्रविच्छिन्न संयुक्त धन्य के दुस से ! मन से सुरर हि वह, भपने कर्मों में सुन्दरतर, युग प्रदचुद्ध हो बुद्ध, सरल उर जीवन-ईश्वर का घर ! देश देश वी भाव विभव, सुपमा से हो बह मण्डित, शोभा प्रतिमा को करता मैं मू-मंगल प्रति भपित ! दीपशिया बालिका ग्रह जो मेरा करती दीपित पूर्ण योषबना ऊपा बन वह करे विश्व पथ ज्योतित !

पावन अबोधता मुझको लियता देखें, हाथ से कलम छीनकर, मरी पोती नें टेंढ़ी मेढ़ी रेखाएं +* -कागज , पर मुछ सींच, . मोड़ “अपनी प्रिय ग्रीवा, देखा मेरी. शोर, ;दर्ष से--स्फीत दृष्टि से ! *** उन सिर्मल्त 'नीले नयतों से- भझाँक रहा था विस्मय का झाकादश, भ्रमित विश्वास से भरा, श्रात्म विजय के - स्मित प्रकाश से विस्फारित सा ! ।», मुग्ध भाव. से पीता रहा सरल प्रसन्नता : मैं पलक चितवन की--मन में लगा सोचने बचपन की पावन अवोधता कंसी अदभुत, मधुर, कल्पना प्रिय होती है !, के 'सहसा * मेरा _ ध्यान गया श्रपने ऊपर ! ...कुछ सीधे टेढ़े आखर कागज पर लिख, उनको गीत छन्द कह, में भी सम्भवतः सर्वेत्ष समभता हूँ भव अपने को, गौरव से फूला! बया भनुप्य में शाश्वत शेशव कहीं ' छिपा रहता, प्रन्तस की £भाव-मूक गोपन खोहों -में ? हा 2० लए ६4 कितना थोड़ा 'मैनुज जान - पाता -श्राजीवन विद्यार्जज कर! सदा अग्रम्य ; रहेगा ज्ञान, मनुज अवोध शिशु? “+- पौती की : विस्मित चितवन में सत्य था महतव !

पोशाजरमिक

यथार्थ और आदर्श

ज्यों ज्यों में देखता निकट से मुख यथांथ का आदणों का ही प्रेमी बनता जाता मन! कर्दम को सार्थकता इसमें वह पंकज को देता जनन्‍्म-- - ऊध्वेमुख लीचन ! लक्ष्य विना ज्यों भार्ग व्यर्थ ही, डर त्यों आदर्श बिना यथार्थ का प्रांगण, . ्े मानवीय झादर्श साध्य-- अनगढ़ यथार्थ जड़, ली आत्म प्रगति के कंटक-पथ का साधन ! बहिर्ँश्नान्त युग भोगवाद के पीछे पागल, , : खो मानव श्रात्मा का घचिर अजित गौरव धन |- नग्न योौत शोभा में लिपटा जड़ यथार्थ को चित्ताकर्षफक देता बहु विज्ञापन ! जीवन संघर्षण की करण दुहाई देकर नारकीय खल कर्मों में रत भू-जन--- राल टपकती मुंह से हज धन की वातें सुनकर, मै ये निरीह का करते शोपण दोहन! समझौता करते रहते ' आत्मा से -प्रतिक्षण . घोषित कर विकसित गथार्थ का दशन,-- कर्देस कृमि ये कर्देम जग ही भाता इनको

कुत्सित'. घृणित | हि विकृत के प्रति ही . हू - . . करते झात्म समर्रेण! / हा

ययोर्य_का भी तो

हे मूल्य. भलों क्या जॉने ?- उल्लू सीधा करना जिनको प्रतिक्षण, प्रथम पंक्ति में" सम्य जनों की कई हि का 20 कलह कक अनुष्यता से बंचिते जिमकीा जीवन |

श्र, देखता जब हे यथाये के पक्षघरों को, आदशों के प्रति समधिक अधपित होता मत-- मूल्य यही जीवन यथार्थ का मानवीय आद्यों का वन सके प्रणत सिंहासन !

मेरा जग

कवि, किस दुनिया में रहते तुम ?--पूछा करते मुझसे सब जन, तुम कोकिल चातक के स्वर में गाते रहते किसके गायन ? नहीं देखते, कैसा तीखा श्रव भू पर जीवन संधर्षण, प्रतिदिन दुष्कर होता जाता जग में जीवन करना धारण !

धेंसने को मानवता का रथ अब भौतिक कर्दम में दुर्गम,

प्राणों का दुर्देभ मत्त वृषभ तोड़ता रास, पथ कर अतिक्रम !

हा, कहाँ गया जीवन सारथि, मच रही पुकार सकल जग में,

अब दिशा हीन भागती बुद्धि, गहरे खाई खन्‍्दक मग में ! दारिदय दुःख का ढो पर्वत जन-कइृमि श्रव जीवन-मृत, हत-मन, हो विश्व विषमता से आहत विध्वंस गरजने को भीषण ! अन्धा सा भटक रहा विवेक शतमुख पन्थों में लक्ष्य-हीन, दिशि रहित “हास विधटन तम में प्रज्ञा प्रदीप लौ हुई क्षीण !

सबके भीतर प्रब मूक! रुदन, सबके उर में नैराश्य घोर,

प्राशाक्रांक्षाएँ धूम-शेष, दीखता विपंद्‌ का नहीं छोर | --

मैं चुप रहता, कहता मन में सब ज्ञात मुझे भय का कारण,

शस्त्रों से संमधिक शब्दों से कवि लेंड्ता जय जीवन का रण ! अपने 'में, अपने जग में रखे संघर्षण का कर विज्ञापन तुम लाभ उठाते जगती से जीवन 'का कर शोषण दोहन! मैं ख्रष्टा''के जग में रहता अब सृजन भूमि मेरा आँगन, उपकरण जूुटाता रहता नित जग में आये नव संयोजन !

'कृमि-मानव भी मानव की कृति, युग-जीवन उसका ही दपंण,--

मैं लॉघ स्वयं को, निज युग की जन सृष्टि रच रहा हूँ नूतन !

निर्मित करता नव मानव मैं युग सीमाप्नों से उठ ऊपर,

जो नव प्रबुद्ध मानवता को दे सके जन्म रस की भू पर ! मैं जिस भू पर रहता, उसमें कल तुमको भी करना विचरण, मेरे प्रिय कोयल पी-खग भी उस भू का ही करते कीतेन ! मुभसे: चिढ़ते बन मित्र' शत्रु--मैं .हुँ. अचेत युग संकट प्रति, बाँसुरी बंजा मन के वन में खोजा 'करंता नव स्वर-संगति !

उनको ने सूक्ष्म का ततिक बोध, वे दबे स्थूल के पर्वत से,

मैं एक साँस में; उंडा उसे पाता हैँ शक्ति अनाग्रत से !

कवि रे भविष्य की क्रांन्त दृष्टि, देखता जगत्‌ के आर-पार,

स्वर स्पर्श सुधा से ज॑त मन? का जीवन का हसता व्यथा-भार !

“आंखध्वनि | ३१

वह बाँध विसंगति को , लय में अन्तर्जंज की कर नयी शोघध-- गाता--शुक रोर डुबा जग का, दे बुद्धिरश्नान्त को लक्ष्यबोध !

सुखर ०. पड » प्रातः आँख खलीं तो खिड़की से शआ्रान्प्ाकर चिड़ियों के कलरव ने समा कफ झअलस उनींदे मन को « मोह सा लिया श्रांख. मूंद है

में लगा देखने, भुण्ड भझुण्ड सतबहिनी जुट मेरे आँगन में चहक रही, हैं फुदक फुदक कर. हे भरे, सैकड़ों स्वरों में.!--- वादयवृन्द बजता हो * कल कोमल कण्ठों, का ! भेंगड़ाई .. मैं निम्न की स्वर ;ध्वनियों: का रस लेता जाता था-मसन :में**. 4. /४ै - . सेट, 6 लेटा !,,, . कर इतने- ही में. , का 5 सतवहिनों की मधुर, सभा में एक काक झा ,गया -कहीं से४!--!' -3 सम्भवतः: ,यह + सोच - ६.5 पु है कि ; चारा ,ववहाँ.- प्रढा। री -. - भौर ल्‍चीखने लगा.

|

गले, को “फाड़ काक बहूं।-- की काँव काँव कर ,काँव “काँव ,।

" कटू काँव, काँव [- «४ (पं उसका मुखर निमन्त्रण +,था -वहू .,. : -_ बायस, कुल को;! + काँव के :.; .?

-_ उन भ्रनमेल, स्वरों से /कुढ़कर . . चबहिनें धीरे लगीं, बिसकने !."* + -- झव' कठ कर्कंश

कऋ्र- कणप्ठ का, एकाकी - स्वर >मेरे उर को लगा बेघने दा ;+ ४-०. ,

बह कई. तीक्ष्ण - नोंक, « से

नह

३३ [ पंत प्रंचावप्तो

मैं उठ बैठा-- * लगा सोचने-- डीठ मुखरता ही क्‍या विजयी होती जग में? मनुज हृदय की मधुर सूद्षम स्वर संगतियों को छिन्त भिन्‍न कर, आज काक युग मुखर हुआा भू के शभ्राँगन में! संस्कृत सौम्य सुयोग्य सुरुचि के लिए उपेक्षित पीछे हटते ,जाते, ह॒टते जाते, उपरत, मन के बन में! कु कदये निर्मम कठोर जंगली काक ककंश कठ स्वर में बबेर विज्ञापन. कर निज आसुरी शक्ति का,-- मुखरित करते अनगढ़ जग के लोक मंच को, आत्मकथा गढ़ लज्जातग्न दर्प से दंशित ! विश्व जयी वे निरचय अ्रब-- पर श्रात्म पराजित !

संकेत शक 4 पा क्या ऐसा हो सकता ? ,“ 75 ।-मैं कहना + -चाहूँ ,- उसे लिख. कर पर शब्द दूसरे ही लिख «|. कीमल करतल पर! ना और समझ जाओ; - - तुम मेरे 'मन का आभाशय ? ज्ञात है, थक * आम कम और मुझे भी; जो कुछ कहना +मुझे पट वही बया।तठुमसे कहता या जो तुमको कहना- हो नर क्या तुम वह कहती,? ,

“£ शांखध्वनि / ३१

जि

शब्द खोखले स्थूल मनः- स्थितियों के द्योतक ! सूक्ष भाव अनकहे : «5 समझा में जातेः नित [| उन्हें चाहने पर भी 05 सहीं कहा जा : सकता ! तब वे अपना स्पर्श मर्म या। मूल्य सभी कुछ खो देते हैं! भेधा, प्रवचन असफल होते सब क्षेत्रों में-- . 5 सब स्थितियों में ! इसीलिए निःस्वर संकेत सबल है! जीवनप्रद, प्रेरक है मुखर शब्द से !

प्रेम

मुझे स्मरण है--- ब्रचपन में--तब मैं किशौर था--- * स्फटिक 'चाँदनी में बैठा पर्वत (प्रदेश कौ-- सोचा करता डूब प्रेम के बारे में में ! कहीं सुना था, प्रेम बड़ा भ्रदमुत होता है | कोई युवती, परी,: किशोरी जो पहिले परिचित भी हो-- अचानक झाकर :»: फूल स्पश पा, मधुर प्रेम का अपित कर देती निज जीवम ! था दोनों। जन रह एके+ घूसरे * के .-प्रति 'खिचकर कर देते सर्वेस्व निछावर हे तट 5 प्रेम शक्ति से प्रेरित | -- ०. :८: कं उन्हें मनुज क्‍या 7 7 यम भी नहीं छुड़ा सकता फिर ! पुन्जेन्स लेकर भी मे ( वे प्रेमी ही/बनते |. 03 7८

इ४ ॥,पंते!श्रेयांबलो

तनन्‍्मय हो जाता तन मन तब भ्रमर प्रेम के स्वप्न स्ोक,में-- तारे भी कुछ नीरव स्वर में ऐसी ही वातें-सी बहूते, मुक्त नौल भी

करता सस्मित

मौन समन ! धीरे धीरे

तरुण हुप्रा मैं! प्रगणित प्रन्यों भें फी खोज

झजेय प्रेम की!

देश विदेशों में भी घूमा, मिलीं प्रनेक युवतियाँ भी -सुन्दरियाँ--परियाँ-- भावों का प्रादान-प्रदान 2 भी मश डड से की किन्तु, दूससे हो भभनुः

3 हुई कवि मन को !

प्रात्मय समर्पण. करनेवाला सर्वत्यागी रूप प्रेम का कहीं नहीं ही दिखा मुझे ! बस मूक व्यथा,

बेदना,. तिराक्षा, प्रश्रु, त्तप्त निःइवास

मिले उपहार रूप में--- आत्म पराजय

झौर ग्लानि भी ! छायावादी कवियों ने, जिस दुख की महिमा गायी अस्फूट स्वर में छिन्म हृदय तन्त्री में !

सुज्ञ प्रौढ़ मन बोला मन ही मन अपने से-- प्रेम कल्पना है किशोर मन की, यौवन की ! --- हाँ, : स्वगिक -कल्पना किन्तु, बह इस धरती पर

कभी "- उतर

. : साकार 7नहीं- होती ! ***

जन वृद्ध हुम्ना

वहू कहता, कल्पना भले. - हो,

अब ! +-

रे शंखध्वनि [ _

सत्य बही है, . सनुज हृदय को प्रिय भी!

कहता आत्म बोध तनन्‍्मय हो--

हाँ, प्रेमी प्रेमिका युगल भी वही . प्रेम है!

ईदवर को, अपित अ्ब/-- भू पर होगा सूततित

तभी स्वये -भी सार्थक होगा जन घरणी पर !

सन का साथी अर

कभी सोचता हूँ जब मन, में :. क्यार्भमे , ४: बजाज पा एकाकी ही श्राया -जग , में ?--- शूलों फूलों के भू-मग में !-- तो, तोता-मति करती घोषण गुरू गंभीर बन, कहाँ भ्रकेले भरायें हो तुम ? पूर्व जन्म के कर्मों का फल , अपने सेंग में लाये हो ठुम ! इस जीवन में पूर्व जन्म ही का फल फलता कर्म विपाक निरन्तर चलता! * टी रटाई बातें सुनकर मेरा मन कुढ़ देता, उत्तर-- पूर्व जन्म का 'यह अनचाहा बोर भले ही मैं सेंग लाथा,-- पर जिस पर है गये मुफे जिससे रहता मैं -,जीवित जिसके प्रति +मैं अपित--- बह पाप पुण्यों का फल «. “वह भले हो सबल-- जन्मजात आनन्द सहज जो बहता उर में प्रतिपलत * : बही हृदय का सस्वल सुख दुख के कु दंक्ष मुलाकर, * के हट

7&

राग द्वेष स्पर्धा के क्षत भर, . : ८2 %+

३६ | पंत प्रंचावली

मुक्त हृदय जो जीवन का करता

अभिवादन,

रंगता मित नव श्री शोभा से पिश्व प्रकृति का अआ्रानन !

मुमको मन से ले जा बाहर भूमा का रस लेता जो भावों की वाँहों में भर,

तदाकार हो निःस्वर !

अन्तर-तन्मय

गूंज प्राण मधुकर उठते जीवन-मंघु करने संचय ! नहीं अकेला झ्राया मैं

नि: संशय,

बँधा सूक्ष्म आनन्द सूत्र में

जग को भी

अपने ही संग लाया हूँ. निदचय !

युग गाथा

इस अबोधता पर जन युग की हँसता मेरा कवि-मन !

नर ययार्थ के पीछे पागल खोता जाता आन्तर सम्बल, देख बिम्व निज जग दर्पण में गया झअपनापन !

स्थितियाँ _ श्रब उसकी निर्माता -

“जो स्थितियों में नहीं -समाता, “विजयी स्थितियाँ, स्वयं विजित वह, अन्त बहिर्मुख जीवन !

भोगवाद के प्रति वह अ्रपित आद्शों को गिनता कल्पित, मृगतृष्ण से जीवन _ क्रुण्ठित

उर में कटु स्पर्धा रण ! सामूहिकता का वह प्रतिनिधि भूल गया मणि दीप आत्म निधि, यन्त्र चक्र बनना उसकी विधि

भौतिक सुख अवलम्बन ! अपना दास, जगत्‌ का नेता, वह दुःखान्त रंग अभिनेता, श्रात्म अन्ध, बनता युग वेत्ता, जयी साध्य पर साधन ! हे वि

शंखध्यनि +

शस्त्रास्त्रों की होड़ शिखर पर: महानाश् के हित नर ततर-- अस्पए्सयुर सिर पर ने धरे कर,

आ्रात्म परीक्षा का क्षण! भू जीवन यथारथे | का पाँगन,- घोना मुझको उसका _प्ानन/ मानवीय भर उर में स्पन्दना

जड़ को करना चेतन !

जीवन मुक्त

मैं धरती की धूल भाड़कर' खड़ा मुक्त जीवन के तट पर! मिट्टी के जड़ मूक खिलौने ये मुझको झव सभी सेंजोने, नयी चेतना फूक रहा मैं इनमें नव जीवन - स्पन्दन भर! इनमें नहीं मनुष्य सभी जन पशु भी, कृमि भी, अरहि भी विष फन, 7 देख सृष्टि वेचित्य बहुमुखी, नया बोध जगता उर भीतर चाक चलाकर, मैं मन ही भन मनुज मूर्ति गढ़ता नव चेतन,-- * - अन्तर का दर्पण ही' बाहर बाह्य विकृति भर बने अन्तर !॥ 7 सागर लहरें युग-आन्दोलित अन्तर को करतीं उद्देलित, / फ्रेमों के -शिखरों पर चढ़: मैं 3. युग वंशी में भरता नव स्वर !: जग की सीमाओं में बेघकर मनुज उठ पायेगा ऊपर, जन-मू. जीवन का द्रष्टा वह नव दीपित हो दृष्टि दिगन्तर !' मानवीय बन सके धरा-तल नयी चेतना का पा सम्बल, भेरी नव स्वष्नों " की त्तरणी पार लगाये तुम्हें डुबोकर!:

मध्य स्थिति

मैंने चुना अघर _ भ्रपे हित, ' यही मंध्य स्थिति सबसे सुन्दर !

३5 | पंत ग्रंथावलो

जी करता, होता ऊपर लय, भू पर विचरण करता निर्मय, अन्तर तुम में रहता तन्मय-- आता जाता बाहर भीतर ! हृदय कमल में स्थित तुम मेरे जग जीवन नित रहता घेरे, मुझे चीन्ते स्नेही चेरे भव विकास अवलम्बित जिन पर! मैं साधारण से साधारण उर में लिये घरा जन के ब्नरण, मुझे हिमालय प्रति हिम का कण, सत्य अखण्ड, भ्रखण्ड चराचर! वद्ध नहीं मैं, भुक्त नहीं मैं, तुम से चिर संयुक्त कहीं मैं! तुम्हें देखता सदा यहीं मैं मनुजों में तुम मनुज झनश्वर ! श्रात्म-नम्र रखते तुम मन को, शाइवत-गर्भित जीवन-क्षण को, भरते करुणा से भू-त्रण को,-- मिटा श्रात्म-पर के लघु अन्तर ! दूर निकट आता जाता नित, जड़ नव चित्‌-स्पर्शों से प्रेरित, उर को तुम नित रखते विस्मित .., खोल दृष्टि में नया दिगन्तर

फूल फल ४“तनिनिमेष सौन्दये, रूप संयोजन श्री हरती मन, दीप्त वर्ण सुन्दर भावों के ज्यों प्रतीक हों गोपन !

सौरभ-साँसों से भर देते जन भू उर का आँगन,--- सुघर फूल, सौन्दर्य कला के तुम हो जग्र में दर्पण !

“फूलों से क्या हीगा, कवि, ग्रपलक भर रखते लोचन, रंगों गन्धों से हो सकता क्या जीवन का पोषण ? हैं स्तुत्य,--भुकी तर डालें भू प्रति किये समर्पण, निरुपम वन निधि वे, रस करता सहज स्वास्थ्य संवर्धन! “फूल फूल है, फल फल हैं, तुलना सर्देव ही ' घातक, “सुन्दर को सुन्दर के लिए वरना दारुण पातक ! तन के भोजन के सेंग मन का भोजन भी आवश्यक, सुन्दरता आत्मा की पोषक, मूं मांगल्य विधायक ! “कला पूर्ण यदि अपने में, वह होगी जन अभिभावक, सुन्दरता रस-सार सुष्टि को, सूक्ष्म भाव उनन्‍्नायक !

शंखध्वनि | रे६&

प्रेम शक्ति की प्रेरक वह, जन जीवन शभिमत दायक, सृजन कर्म संचालक, मधु के फूलों की मृदु साथक !

अन्‍्तजेग पा जब मेरी हृत्तन्त्री में जगता रस स्पन्दन मव स्वर संगति में-से बंध जाते जड़ँ चेतन! भर-से जाते ऋूर विपमताओों के भू-श्रण, निखिल विद्व में भरा जाता भ्रान्तरिक सब्तुलन !

अर्घ खुले दिगू बातायन में सद्यः जागृत

जव प्रभात मुख दिखलाता किरणों से मण्डित,--

मसृण रेशमी झाभा-प्रंचल से हो आझ्ावृत

अंग अंग धरती के लगने लगते झोभित ! गा उठते खग वृन्द, मत्त नाचता समीरण, डुवा कूल, सागर लहरें उठ करतीं नर्तेन, मौन मन्त्रणा-से करते रवि शणि तारागण मानव जीवन का करने नव पर्यालोचन !

नि:संशव हो जाता तव मेरा भन्तर्मन---

मे प्रकाश, आनन्द, शान्ति, सौन्दयं के मुबन

कहीं मनुज के अन्तर्जंग ही में चिर गोपत,---

प्रेम प्रतीक्षा करता जिनकी पथ में प्रतिक्षण !

सुत्यु

यह जीवन कितना महान्‌ है! इसके सिर पर विधि ने वीरव नीलमणि जड़ित मृत्यु मुकुट घर गोरव उसे दिया है,--जीवन प्रति हो सहृंदय,-- बह फिर से नव जन्म ग्रहण कर सकता निर्मय॥ जव यौवन को मांसल शोभा से हो वेष्टित विचरण कर सकता मू पर श्राणों से मण्डित ! जत्म मरण की आश्रांख मिचोनी से चिर परिचित : जीवन रे श्रविजेय सत्य जन-मू पर, निश्चित !

उदय कभी होते छइतानत आँखों के सम्मुख

देख बच्च दृढ़ नील गात्र मन की' मिलता सुख !

* न्याय यघष्टि कर में, करुणा से आद नयन मन,

-, जीवन, संरक्षक-से लगते ,वे, चिर-: गोपन ! मृत्यु लोक की दारुण स्थिति दुख देती मन को देख मृतक के हिर्त सन्तप्त विलखते जन को! आँसू की. मुक्ता लड़ियों को माला अतगिन' मृत्यु देव के वक्षस्थल में पड़ती प्रतिदिन !*

४० | पंत ग्रंधावली

खलता प्रपनों का बिछोह,--भावों का बन्धन सहज होता छिन्न, दुःख के लगते दंशन ! पर गरिमा से सहना उसको लगता शोभन, मृत को दें सम्मान, मृत्यु को निःस्वर पूजन ! भू-जीवत में मैरक-झसुन्दर मृत्यु असंद्यय, उसका ग्रुरु व्यक्तित्व गभीर, पवित्र, अनामय ! मृत्यु पार भी मुझे दिखायी देता जीवन, स्वप्म द्वार भर मृत्यु,-करें जन सहज सन्तरण !

यन्त्र नगर

भगवन्‌, ऐसा कभी ने हो इस भारत-मू में जब घर पर घर, मंजिल पर सौ मंजिल उठकर श्रौद्योगिग देशों नगरों - सा दारुण दुर्गंम ईंट पत्थरों का निर्मम गढ़ इसे बना दें,--- ठेढ़े.. भेढ़े सर्पीलि मार्गों से गुम्फित ! जहाँ देखने को मिलें फूलों के प्रिय मुख, मुखर भरोखों से आा-जाकर चिड़ियाँ फर-फर भीतों के पंखों में मन की व्यथा अजाने 'उड़ा ले जा सकें! जहाँ खिड़की से भर-भर चाँदी के थक्‍के सी धूप हेंसे फ़र्श पर! जहाँ मुक्त-व्यक्तित्वत नहीं खो जाय प्रकृति का घनी साज सज्जाओ्ों में आधुनिक गृहों की-- हरा भरा मृदु दूबड़ विछा हो ग्ाँगन में पग पग पर उठता दवता मखमली तल्प सा! उका हो उन्मुक्त, नील धूमों के घन से श्राँखों में कड्आता, साँसों में चुभता सा! भटक जाये ज्योत्स्यमा बिजली के प्रकाश में स्वप्नों के अंचल में मन को रहे” लपेदे ! मुक्त प्राणप्रद बहे ने वायु-बनों की सद्यः सोरभ-साँसों से जीवन मन का विषाद हर! तारों का नभ भुका हो भीतरी सहन में नि:स्वर सम्भाषण सा करता शरद निशा में !

पडुऋतु पोषित श्री सुन्दर मिरुपम निसर्ग को प्रमू, कभी विच्छिन्न मनुज से होने देना !

चिड़ियों की सभा

पचिड़ियों की उस बृहत्‌ सभा ने मुझको चुना सभापति,/-- मैं भी मन से उड़ता, गाता, भाई उनकी संगति ! कभी बैठ मेरी गोदी में, कन्धों पर, फिर-सिर पर, करने लगीं मधुर कूजन बे--भाव मुस्ध स्वर-सहचर !

इांखघ्वनि / ४१

मिला मनुज साथी था उनको वे थीं मन में हित,

मेरे भी मणि-वर्ण कल्पना-यंख फड़कते पुलकित !

चुनता सहज स्फूरित ग्रायन मैं, सुनता निःस्वर श्रम्बर,

चदुल समीरण, मुखर दिशाएँ स्वर पर हुईं निछाबर ! हि निखिल प्रकृति करताली देती, तस्वन भरते ममंर,. घुल जाता उर का विषाद, लय में लवलीन चराचर ! पूछा मैंने, कैसे गातीं तुम रस तन्मय गायन, रुक सा जाता काल भूल गति, मोहित हो उठते क्षण !

बोले खग, कुछ क्षण मीरव रह, नहीं जानते कारण,

क्यों उन्मेषित होता भ्रन्तर--स्वतः फूठते गायन!

तुम्हीं बताओ, कवि हो तुम, क्या गीत शब्द-स्वर साधन ?--

रहा सोचता जाने कब तक मैं कर भ्रात्म निरीक्षण ! जान पाया मैं भी कुछ भी सृजन रहस्य अगोचर-- विहग उड़ गये थे सब कब के मुझको देख निरुत्तर ! नही जातता, बयों गाते खग, गन्ध कुसुम क्‍यों निःस्वर,-- मूक मुखर--दोनों क्‍या कहते इसे जानता अ्रन्तर !

भाव सिद्धि

फूलों की श्रात्मा से सहसा मेरी भेंट हुई निर्जन मैं-- उसकी अपलक श्री शोभा से विस्मय-मूढ़ हुआ मैं क्षण में ! वर्णो की किरणों से गुम्फित तन पर साढ़ी थी त्वच-कोमल, कैसर-पावक की मधु अलके शोभित थीं स्मित मुख पर निशचल !

सौरभ की उन्मद साँसों से प्राण हो उठे मेरे पुलकित,

फूलों में छू मुझे डेस लिया प्रीति तड़ितु से कर तन वेष्टित !

ने सह सका दीप्त स्पर्श सुख हुआ अंक में उनके मूछित,

कौन पचा सकता शोभा-विष- शक्ति पात के सु से दंशित ! बोली पुष्पात्मा, तुम मृछित जग के प्रति, मेरे प्रति जागृत,. शोभा की साधना तुम्हारी पूर्ण हुई,---मैं सिद्धि प्रवतरित ! हुंदय चेतना थी वह्‌ निर्मल स्वरग्रिक भाव विभव से कल्पित,.

_._ तीर्थ स्तान सा कर मेरा मन देह-मुक्त हो 'उठा उललसित !

उभे देख रस-तन्मय स्थिति में बोली बह, स्मृति पुलकित मन में,

कहाँ समाधित होते ? मुकको स्थापित करो धरा आँगन में ! सोचा, जय के प्रति विरक्त रह में पूर्ण हो . सकता निश्चित जग जीवन से भाव-सिद्धि को करना होगा मुझे समस्वित ! तब से विश्व विसंगतियों में अन्तः शोभा कर संयोजित नव भू जीवन रचना के प्रति सृजन हष॑ से हू मैं प्रेरित !

पत्थर में फूल रु

दो पापाण खण्ड सुहृदों-से ; सटे परस्पर, - लेटे हैं बन के अंचल में !

४२ | पंत ग्रंयावली

छायाएँ जब केपतीं तन पर लगता दोनों साँस ले रहे, या आपस में चुपके से फुफफुूसा रहे कुछ ! पडऋतुएं. आातीं पर उनमें कोई भी परिवततंत नहीं दिखायी पड़ता ! कोौयल गाती, शरद पूर्णिमा भाती, फाल्गुन की उन्‍्मद बयार बन में सौरभ बिखराती-- उन पर तनिक प्रभाव पड़ता, कभी दिल ही उछल मचलता,--- रक्त दौड़ता दूर रहा उन्मत्त शिरा्रों के भीतर ! हाँ, गर्मी में वृद्ध गृद्ध कुछ देर के लिए वहाँ ठहरता थककर क्षण भर ! सावन भादों में अलबता कुछ काई सी जम जाती बदन पर ! शेप सनातन जीवन उनका गुह्य मौन में बन्दी रहता ! झाज अचानक एक जंगली फूल फोड़ उनकी दरार को साहस कर, उनके सीने से फूट निकल श्राया लो बाहर ! निज विस्फारित चकित दृष्ठिसे देख रहा वह - यमज अनमने पापाणों को सोए तदाकार तलन्द्रा में ! प्रतनु वुन्‍्त पर नाच रहा वह मन्द पवन में-- निज उर का उल्लास थिरक, उन पर उडेलने ! दोनों _ मित्र हे स्वयं भी कुछ विस्मय विमूढ़- > निविकार नयनों से देख रहे उसका मुख!

इंखपघ्वनि / ४३:

मन ही मन . हि ज्यों सोच रहे हों--

हाय विधाता,

पत्थर उर में

फूल खिलाना था क्या तुमकी !

समाधान

समाधान वया सम्भव मन के स्तर पर -- ऊब कि बदलना निखिल विश्व जीवन को! बाह्य परिस्थितियों पर अवलम्वित जन-जीवन, छिड़ा विगत में मुक-अनागत में संघर्षण,/-- स्वाभाविक झव आधिक सामाजिक परिवर्तत (-- स्वर्ग प्रतीक्षा रत--वह्‌ करे धरा पर विचरण ! समाधान सम्भव है अब भी मन के स्तर पर यदि प्रवुद्ध मन निज कर में लें भू झासन को ! या फिर कु संघर्पण, रण, विनाश भी सम्भव, दो दृढ़ शिविरों में विभक्त सम्प्रतिं बल वैभव, पर विश्वास मुझे, ध्वंस ढायेगा' मानव,/-- विश्व सभ्यता का समस्त जी दारुण परिभव आस्था ईश्वर पर मुभको,--उससे सब सम्भव, वही बदल सकता बहिरन्तर जीवन मन को,--- काल सृष्टि का साक्षी--प्रगति विकास प्रवर्तेक, ईइवर-गर्भित जानो उसके झाश्वत-क्षण को !

'पंखड़ियाँ

फूल फूल हैं! हा ये केवल पंखड़ियाँ कोमल, नहीं पुष्प का सा श्री सौष्ठव,-- रंग गन्ध रज के भुरके दल! बिखर गयी स्वर्णिक स्वर संगति रहा वह अस्त: संयोजन, अ्रब पूर्णता के ये “दर्षण, पृथक्‌ पृथक्‌ जीवन क्षण निष्फल ! मधुरस कोष नहीं अब अन्तर, अनिमिष दृष्टि छूती अम्बर, कहाँ भुलाता झव मलयानिल ? वृन्तच्युत, घायल अन्तस्तल ! मधुपों से अधर रस चुम्बित, साँसों से समीरण सुरभि, केसर अलक हिंम जल गुम्फित, चार तार ज्ञोभा का अंचल

'डड | पंत प्रंधावली

अरब ये फूल बन पायेंग्ी,

मिट्टी में भर मिल जायेंगी,--

पंखड़ियों से फूल बनते, फूलों के ही पंखड़ि-करतल !

फिर भी ये हो सकतीं सार्थक

मधुर प्रतीक्ष में रत अपलक,

नव मधु पथ में पलक पाँवड़े बिछा,--फूल बन सकतीं अ्रविकल ! ये प्रसूत पंखड़ियाँ कोमल !

एक सत्‌

कवि के मन को जित प्रकार छता जग जीवन

बह उसमें संगति भर स्वर-विम्वित कर देता,

शब्दों को वह सौंप जगत्‌ की व्यापक पीड़ा

अपने मन की गोपन व्यथा सहत कर लेता ! हृदय शिराग्रों में बहता जो जीवन शोणित उसको साँसे भरा जा शोधित करती रहतीं, भाव-व्यथा प्रेरणा-किरण पा ग्रीत-स्पर्श की लोकोत्तर सुख बन जन जन के मन में बहतीं !

केन्द्र परिधि दोनों ही अविकल अ्रंग वृत्त के,.

आस्था केन्द्र, परिधि जग-जीवन मानव मन की,

बहिर्शान्त खो जाए नहीं जग्रत्‌ मरु में नर

श्रावश्यक्ता उसको झात्मिक अ्रवलम्बन की! अमृत स्रोत्‌ 'रस-आत्मा, जिसकी अक्षय धारा जीवन संघर्षण में भरती, नव . संजीवन, जग प्रिय हो, जन प्रिय हों, मू जीवन भी प्रिय हो सब से प्रियतर हो आत्मा का संत्‌ चित्‌ आनन

सखे, एक .ही स्वर -में गाता अब मेरा मन,.

निखिल स्वरों का स्वर जो, निखिल स्व॒रों का आराशय,

स्वर्ग मर्त्य॑ संगीत स्रोत भकृत जिस स्वर में,.

_ जिसके बिना जगत्‌ जीवन दारुण भय संशय !

आत्म चुरी रे

छोटी मिट्टी के लेंटूदू सी घरती »“नाचा करती दिशि के करतल में मित, * आत्म सूर्य की परिक्रमा करती ! देखा करता मैं उसका यौवन * , ,इयामल शस्य स्मित,

. ऋषफकक्‍कर्नक ७ञ७छ.

देखा करता भाव प्रव्ण मन सागर सा भान्दोलित ! देखा करता रजत किरीट बी, हिमालय-से. शिसरों को, देखा फरता भ्रन्ययार से भरे अचेतन प्राण गद्धरों को! ही मिट॒टी के लद॒दू सी घरती भंक गणित के क्षुद्र बिन्दु सी पर झपने में महन स़िन्पु सी, उसका भी रे शझपना जीवन विधि जिसका करता संचालन !

वृष्टि भ्रवर्षण अंफा उल्का भूमि कम्प भा रक्त प्रस्थि नित करते मन्पत,--- अपने उर में * कोटि चराचर श्रगः जंग उवर करती धारण ! न्चहु तटस्य हो इन सबसे-- लट॒टू सी नाचा करती नित अपनी ही गति में-- हर बेंघ भूमा की स्वर संगति में! देख मुझे भव भय से 2 जर्जर कातर, नृत्यपरा धरती दिग हपित शस्य. हरित आ्रॉँचल सेमालकर कुहती--- जग जीवन घारा भ्रनादि से बहती ! तुमको यदि अपना जीवन दे कुसुमित जग को करना झौरों का दुख हरना-- श्रात्म धुरी में रहो .सहज स्थित, "जंग जीवन _ को' 'भी अपने में करो ,समन्वित,-- --त़भी जगत्‌ को तुम यत्किचित्‌ अपनी उर-निधि दे पाझोगे ! - अपने जीवन में भी : इससे ५« 7 : साथेकता «पाम्रोगे !

“४६०|' पंत प्रंथावली

सीमित जग, कंटकित घण मग, मोह पंक में डूवे जन पग, जग के बाहर- से साता रखना सामग्री गोपन ! झन्धकार में चलता भनुश्षय बल पाता भय संकट से मने, खुला हृदय में प्रीति-स्पर्श से ज्योति -- नयन बातायन मैं प्नन्‍्त प्रतिनिधि, गत बन्धन, कालहीन भालोकित सपघु क्षण, जन्म मरण जीवत से पर- शाश्वत: हे का स्लित दर्पण! सूद्म वस्तुओों से चुन चुन स्वर संयोजित कर उन्‍हें निरस्तर, 2 .फदीर-पन्‍्यी कवि भू जीवन पट बुनता नूतन ! आत्म दप

मेरी रचना चुमतीं कुछ को सूक्ष्म कार्य थे करती भपना, असन्दि्ध भ्रव मेरा भन्तर एक सत्य स्वर मुमको जपना ! मुझे छेडते जब, वंशी सा गा उठता मेरा तन्‍्मय भन, विश्व विसंगति में नव संगति भरता मैं--जग के प्रति चेतन ! सृजन कर्म में रोक सकता , वह मेरे स्वभाव -, का दर्पण, मैं हँसता--जब -कहते सुनता। लिये हुए मैं उनका भासन! -दात्रु , मित्र का हो स्पर्धा बश है > . बनता ;नर भपना ही भक्षक, बिसुख प्रेम के होता जो जन #5४. *: उसका ईइ्वर, ही रे रक्षक [ साक्ष्य सत्य क्यू जिसको

अंदर

अहू दर्ष मद का प्रक्षेपण नहीं मनुजता का शुभ लक्षण, छुद्र अहंता सदा चाहती बुहद्‌ बिम्ब दिखलाये दर्पण!

सत्य कथन का रिक्त दर्ष ही

पर प्य करता मिथ्या भाषण,

सौम्य, विनम्न, उदार चरित का मानव मन करता श्रभिवादन है

विद्युत्‌ गरग

आज भ्रचानक बिजली चली गयी जब मुझको शरण मोमवत्ती की लेनी पड़ी विवश हो! तन्‍्वी लौ का स्वणिम सौम्य प्रकाश भर गया चुपके मन में! स्वप्नों का संसार सहज साकार हो उठा नीरव क्षण में ! मुर्ध शलभ का प्रेम, दग्थ जीवन आकांक्षा, आत्म समर्पण, नाच उठा आँखों के सम्मुख मृत्यु दशयन को उन्म्रुख! प्रेम त्याग ही का हो दर्पण ! सहज शीलमय मानवीय सी लगी मुझे लौ,-- कनक किरण मण्डल से घेर लिया था स्मित मुख! मैं उन्मन सा रहा सोचता-- बयों भाती दुबली पतली लौ बिजली की जगमग फुहार से-- स्‍त्री सी नत मुख खड़ी सामने, लाज लता सी, कृम्पित तने मन स्तेह सने ! कया बिजली के दिकू - अ्रशस्त व्यापफ भ्रकाश से

शंखध्वनि / ४६

श्रेपष्ट मोमबत्ती या दीपशिसा हो सकती ? भू मानव की पथ दर्शक बन सकती जम में? काँटों के भू जीवन मंग में? नहीं, नहीं,-- यह मोह मात्र अम्यासी मन का-- जपता रहा रूढ़ि का मनका! विद्युत्‌ का हीरक प्रकाश ही ज्योति दूत जन-भावी जग का, शही सम्यता का भी प्रतितिधि, प्रात्म प्रवुद्ध प्रतीक महत्‌ वैज्ञानिक युग का! दीपक का युग गया! मोह उसदवय स्वाभाविक, पर, विवेक फरता ने समर्थन दीप शिक्षा का, शयन पक्ष में कम्पित वक्ष, विनत सिर शोभा दे वह अझव भी! विद्युत्‌ किरणों से दीपित प्रव सम्प जमत्‌ की. निशा-- वही अन्ध तम का मुख घोती, स्पर्श मात्र से उसके अग जग में उजियाली होती | -- यबन्‍्त शिराप्रों में बहता अब उसका श्रति गति शोणित,-- पार लगाता तिमिर सिन्घु में जन जीवन का बीहित ! बञ्राण दाक्ति की प्रतिनिधि विधुत्‌

द्रुत से द्वुत, चह पिदा सकेगी भूत तिज्ञा? वह॒स्थूल शक्ति, क्या मानवता के सुझा सकेगी नयी दिशा? मुझे नहीं सन्देह सहायक होगी वह भौतिक विकास में--- मनुष्यलव खोजा जा सकता +जात मसुझे-- अन्तर्मुंख आत्मा के प्रकाश में!

५० | पंत ग्रंथावली

च्स्त्नी

मुभको लोहे का तार बनाया सख्रष्ठा ने मंकार बनाया मेरे प्रन्तर की,

में समझ नहीं पाता था झपनी साथर्थकता तुम देह सहज घर लायी भाव मधुर स्वर की !

मैं बाँध पाया तुम्हें पूर्ण स्वर-संगति में, मेरी अक्षमता,--मन मुभसे कहता निश्चय,

अकार मात्र तुम रही हृदय की चिर प्मूत्ं, बन पायी नहीं प्रणय प्रतिमा शोभा-तन्मय !

संगीत नहीं फूटा, उर को कर रस विभोर, स्वर रहा समाया प्राणों ही में भाव-मौन,

गूजता रहा कलियों को घेर हृदय-मघुकर चुन पाया सलज नहीं उनमें प्रेयली कौन !

श्री शोभा लतिका तुम, मुभको अस्पृश्य रहीं, वंशी की रस-अवयव मांसल लय सी कोमल,

नव भाव रूप घर छूती स्वप्नों के उर को हो उठते प्राण श्रदृश्य स्पर्ण पाकर चंचल !

तुम वाद्य मधुर होतीं--मन के तारों को छू मैं अपनी लय में उन्हें बाँध लेता सुखमय,

“कल्पना स्वप्न भी होतीं, परिचित मैं उनसे प्राणों से कर लेता उनका अक्षय परिणय !

तुम मलय झनिल सी झा, रोमांचित कर जातीं सांसों की सौरभ से छू आकुल अन्तस्तल,

ज्योत्सना सी छिपकर स्वप्मों में नहला जाती फहरा सुपमा की शीतल लपटों का अंचल ! सुन्दर स्त्री भी है जग में, मन पुलकित रहता, घेरे रहती स्मृति छायाएँ उर को अरनुक्षण, तुम सृजन हे के पंख खोल गाती चुपके भावी के श्री सुख स्वप्नों से भर जाता मन !

पज्ञथपित जीवन

-सध जाता जब तार हृदय का रस तनन्‍्मय गाने लगते प्राण स्वयं ही नीरव स्वर में ! व्जग जीवन के कोलाहल को लाघ मौत से - सूक्ष्म स्वप्न-भंकार फूट पड़ती झन्तर भें !

इंखध्वनि / ५१

काल-मुक्त से हो उठते क्षण नभ सा विस्तृत राम-झद़ मत, हार विजय सी विजय हार सी है लगती जग जीवन-संगर में | दूर कुछ भी सगता मग मे, निकट राभी के मैं भ्रव जग में, से अपने में डद तैरता. निर्मय सुस दुस के सागर में ! श्रास्थां से पा नय संजीवन श्रद्धा मे पथ पर चलते द्षण, झपित मन जीवन के हित अब भेद कुछ बाहर भीतर में |

झायें, भायें विश्व चराचर फूलों-से मुड़े ले सुन्दर-- जग के जन-वन में खोया भी

रहता मन भपने ही घर में! सुख दुस उर में भाते जाते घृष्ठाह दोनों ही भाते,-- में है. सुर

पक्त तुम्हारे नाते, क्‍या मानूँ प्रन्तर में !

जीवन उल्लास

चिड़ियाँ गाती मधु कलरव भर

छाया गात्ी कंप कैप निःस्वर,

रवि किरणें ज्योति स्पशशों से « शसात्ती मन को छूकर !

सभी वस्तुएं गाती निरचय,

क्या तुमकी सुन होता विस्मय ?

सब जग में कहने को आाकुल क्यों रस झातुर अन्तर |

४२ | पंत प्रंथादली -

भर्भर करते रहते तरुदल,. ग्रन्ध अनिल फिरती स्मृति चंचल, गूढ़ सृजन उल्लास सिहरताः सबके उर में थर्‌ थर्‌ ! आमो, हम तुम भी मिल गाएँ, अपने मन के भेद भुलाएं,,

पूृथक्‌ रहें हम, एक साथ भी, प्रेम प्रतीक चराचर !

सुझे मौन नीलिमा डुबाती,

ज्योत्सा स्वप्नों में नहलाती,

मैं सबसे ही परिचत जग में-- एक सत्य के सौ स्वर !

सुजन दायित्व

कोयल जब गाती वसन्त में नया फूलया खिल उठता उपवन में-- विश्व प्रकृति तब सृजनोल्‍लास प्रकट करती उस क्षण में! कलाकार साहित्यकार का क्या दायित्व भला हो सकता इससे सुन्दर ?-- शोभा की अंगुलि से छूकर वह संगीत पिरोता जन-भू मन में खोल परिस्थितियों के बन्धन वह रस-मुक्त चेतना करता तरक्षण, झतिक्रम कर युग की सीमाएँ, झतिक्रा कर जग जीवन ! वह सौन्दर्य, प्रकाश, प्रेम, झानन्द लोक के द्वार खोलकर भात्मा से साक्षात्‌ कराता निखिल क्षुद्रताओ्ों से ऊपर, सुख दुख के सागर तर !

सहण बोध से उन्मेषिव वह तक चुद्धि फे क्षितिज लाँघ उड़ता धाणी के राजहंस सा छू चैतन्य दिगन्तर--- मानव प्रात्मा भूजीवन को लाकर नित्य निकटतर ! 'और कौन दायित्व लादता लगे उसके कन्पों पर ?-- नमनुब्यलव का श्रतिनिधि बन देता समग्र वह दृष्टि विश्व फो,

शंणप्दनि (हि

राजनीति या प्ररय॑शास्त्र या सामाजिकता में भी नयी प्रेरणाएँ भर! कोकिल जब गाती मधुवन में, नया फूल या खिलता घरती के झाँगन में--- स्रष्टा तब रस मग्न निखिल दायित्व मुक्त हो, शाइवत को बाँघता सृजन के क्षण में, भू जीवन में, मन में!

भविष्य वाणी

मैं छाया में बैठा उस दिन घरती पर कुछ झाड़ी तिरछी रेखाएँ श्गुली से यों ही खींच रहा था-- झोर, सोचता सा कुछ मन में बीच बीच में आँखें चुपके मींच रहा था! इतने में कानों में सहसा नूपुर की ध्वनि पड़ी मनोह्‌र--+- आँखें »_ सामने देखा एक किशोरी को आते श्री सुन्दर ! अर्घ श्रगुण्ठित, शीश भुकाये, रक्तिम आनन, . सहर्ज लजाये, - स्वर्ण तृण हरित साड़ी पहने अंगों में फूलों के गहने-- बैठ गयी यह मेरे निकट हाथ घर कर में,-- भौंहों में संकेत, सलज समिति भधुर अधघर में! कहती हो, बाँचो तो पण्डित, मेरा करतल! सत्य हस्त रेखा विद्या या केवल वाग्छल ? सुनती हूँ, तुम सामुद्रिक हो, मन्त्र सिद्ध हो, अपने मित्रों में श्रसिद्ध हो !

घ४ | पंत ग्रंथावली

में हूँ घरती,

सूंदेव की परिक्रमा नित करती! मेरा भाग्य पढ़ो,

भविष्य बतलाओ मेरा/-- दुर्गेग विषम परिस्थितियों ने मुझको घेरा ! मन को कातर स्वर छुम्रा, हृदय विद्रवित हुआ | वयःसन्धि से शोभित प्रिय तन, खिच जाते थे सहज नयन मन ! फूलों का करतल मैं थामे रहा देर तक, उसको निरखा परखा मैंने घण्टों अपलक ! जन-भू जीवन का विकास ताचा आँखों में विश्व सभ्यता का इतिहास भें छाया, उड़ स्मृति के पांखों में ! बोला, मैं तुम पर हूँ मोहित !-- कहा, हटो, मत छेड़ो मुझको,-- गालों में द्रुत दौड़ा शोणित | मैं बोला, यों मत सकुचाग्रो, तुम हो जनगण मन की प्यारी, प्राणीं की प्रिय शोभा अतिमा, मुग्ध किशोरी नारी! मैं करतल पढ़ चुका ध्यान से, सुनो, भविष्य बताता हूँ निज गुद्य ज्ञान से! झभी तीन रेखाएँ कर में निकलीं केवल, भ्रश्न प्राण मन की द्योतक जन जीवन सम्बल ! झायु, बुद्धि भावना नाम भी

हे

इनके निश्चय, जीवन इनके ही घिर सुख दुख का विनिमय ! एक और रेखा

प्रकोष्ठ से ऊपर उठकर

शंएप्यनि / ५५

अभी सूमे श्रेंगुली छूयेगी-- दीघ, ऊषघ्बंतर ! भू जीवन को कर शाइवत सौन्दर्य प्रेममय कीवि तुम्हें. देगी-- आनन्द, प्रकाश भ्नामय ! .#. अन्त: स्थित हीगी ७5 अधिक बहिर्मुंख विस्तृत, यही तुम्हारी भाग्य रेख बतलाठी निश्चित ! सा्थेक होगी सूर्य देव की प्रिय परिक्रमा, स्व शिखर चुम्बी होगी भू मानवता की महिमा! बोली प्रमुदित- बाह्य क्षितिज भर छुपा अभी मानव ते निश्चित भ्रन्तरिक्ष युग कर हे भू मन में नव उद्घादित ! तुम हे अन्त: शिखरों पर भी विचरण कर स्वयं विभव बरसायेगा भू पर प्रबुद्ध नरों धन्यवाद करती मैं नत सिर आाऊँगी तुमसे मिलने फिर!

मधु पंखड़ियाँ

जो बिखर गयी मधु पंखड़ियाँ वे बत पायेंगी फूल झब बंध वुन्त-मूल से--मास्द में हँस हँस पार्येगी भूल अब ! सौन्दय-वृत्त में संयोजित वे दूग करेंगी भझ्राकपित, निज उर-सौरभ भू-नभ में भर हो पायेंगी स्वयं . उपकृत ! सघुपात॒ बन सकते करतल, अझलि को क्या देंगी आमन्त्रण ? उड़ जायेंगे प्रिय रूप रंग, कुम्हलायेगा कृमि सा रज तन स्वर संगति से विच्छिन्न विकृत अस्तित्व किसे लगता शोभन,

#६ | पंत प्रंधावलो

सन्तुलत॒ चित्त जब खो देता प्रतिकूल उसे लगता जीवन ! फिर भी वे चाहें तो सार्थक हों पतित उपेक्षित जीवन क्षण--- वन पलक पाँवड़े बिछें प्रणत, जीवन नव मधु को कर भ्रपेण !

सूर्य बोध

मैं जब छोटा था, किशोर, तब देख प्रकृति मुख अनजाने हो उठता था सुख से विभोर ! आँगन से, तरु शिखरों पर से मन उड़ता चुपके शभ्रम्वर में, मैं मौन शान्ति में खो जाता तिर रहस नीलिमा के सर में ! कोमल पंखों का स्वप्त नीड़ प्रिय नील शूत्य था मन का घर !

विस्मृत हो जाता बाह्म विश्व नामों रूपों का वस्तु जगत्‌-- मन मुक्त नील में होता लय, वह भी करता मेरा स्वागत! मैं भूल भ्रकृति से शक्ति खींचता नील शान्ति से प्राण खींचता,-- भेरे मन का सूर्य देखता बाह्य सूर्य को अपलक लोचन ! -- उर में भर जाता नव जीवन झग जग की झात्मा का यौवन! अब भी कुछ ऐसे क्षण आते ज्योति पान करता मेरा मन ! जग में केवल सुहूद सूये ओऔ!' मैं रह जाते [--- ध्यान लीन, तनन्‍्मय, नव चेतन ! रोम रोम तब लेता साँस अजाने प्रतिक्षण स्वच्छ, . प्राणप्रद, उच्च वायुझ्रों में उन्मेषित--

झंखध्वनि / ५७

विश्वात्मा

संग

सहज ऐकय हो जाता स्थापित ! यही वास्तविक जग है निश्चय,

नाम

सूक्ष्म बोध

जो प्रकाश से भरता अन्तर, सूर्यात्मा का श्रालय ! रूप के जंग से घिर मत दवा दबा रहता निःसंशय, डूब नील में, सूर्य लोक से नव गति-जव वह करता संचय--- निर्मय, तन्मय !

में बाँध ने पाऊँणा तुमको शब्दों की वेणी कर गुम्फित, साकार नहीं कर पाऊंगा अन्तर के तारों में भंझत ! शत भावों बिम्बों में कभी झट पायेगी सुपमा श्रतुलित, छवि बिन्दु सभा पाएगा वंया जग जीवन सागर में विस्तृत रै

फट पड़ता बादल अंचल जब

तुम विद्युत्‌ गति करती नतंन, करवट लेती रस ऊर्जा जब

गिरि वन भू में जग्रता कम्पन ! भर, इंगित भर से गुह्मय व्यथा

गीतों में हो उठती छन्दित, मधु स्पर्श मात्र से भर्म कथा

पा जाती स्व॒र॒लय गति अकथित ! सौन्दर्य झनावृत. हो जाये

यदि कला करे तुमको गंकित, वह डूब लाज में तुममें ही

हो जाये निस्तल शभ्रन्तहित ! तुम उर के वबातायन पर

दिखला जाब्रो गुण्ठित आनन, कृतका्य सहज इतने में

हो जायेगा जग का जीवन !

तुम हो, इसका ही सूक्ष्म बोध बनता उर का अक्षय सम्बल,

भू जीवल संघर्षण में

बजती रहती अश्वुत पायल !

इुछ | पंत प्रंथावली

स्मृति भी जान पाती अब तो हो उठता पभ्रन्तस्तल॒ तम्मय,. उर नम्नर, भात्म रक्षा के हित तुमको झपित--इससे निर्मेय

जयनाद शुशत्र दांख बन ग्रयी बोध के हाथों में झ्ब मेरी वीणा दुःसह सात्विक मन्यु से भरी! बहने मघुर भावों को सुरली अधघर श्वास-मधु पीने वाली प्राणों के बाँसों की हरी !-- हृदय चीर कर फूद निकलती उससे रहस वेदना गहरी, क्या नाद सुन जाग उठेगी सोयी लोक चेतना बहरी! मेघों में विद्युत सी पायल व्यथा ज्वाल प्राणों में लहरी--- झो शंख ध्वनि, हृदय खोल कर अपनी बात जगत्‌ से कह री! प्रतिध्वनित हो वन पर्वत से' अम्बर का प्रसार तू गह री,. बन अकूल, जीवन सागर की अतल गहनताओं में बह री! लाँघ पन्‍थ के अवरोधों को जग की कऋुंद्ध चुनोती सह री,. देखें जन, युग-ध्वंस ढूह पर विजय वैजयन्ती नव फहरी !

नप्र

तृण का क्या कर लेगी आँघी ? हहराती झायेगी कुछ क्षण फुंकारेगी पटक घुन्च फण, गहरे मूल जमाये पादप ढह जायेंगे! काँपेणा बन!

सब का मुंह भर देगी आँघी ! सौ सौ अ्हि लोटेंगे भू पर रस्सी से बट बट दिग्‌ घूसर, मन्यित होंगे फेन-जिल्न जल, उखड़ जाँय सम्भव उड़ भूषर,

अम्बर-पथ तर लेगी आ्ाँधी !

शंखध्वनि / ५&- कं

लघु तृणष भुक जायेगा सम्मुस प्रथपर विछ जाने को उन्मुख, भयवद्य नहीं, श्लीलवश सज्जित, शक्ति दर्प प्रति फेर सौम्य मुख,-- उसका क्‍या घर लेगी भ्राथी ! भव संकट में रह वह झक्षत, हरा-मरा, पहिले से उच्नत, शक्ति प्रदर्शन का झ्पराणित रहा नम्न, भात्मस्यित, उद्यत,--- यही ' कह गये ईसा गांधी ! युग झब वल-शिविरों में सण्डित, भस्त्र शस्त्र फरने में भजित, शक्ति द्क्ति से विजित होगी, मानवीय ब्रह्मास्त्र प्रपरिचित ! तिनके ने तव हिम्मत बाँघी!

आकांक्षा

मुझे ताजगी,

नव जीवन उल्लास चाहिए,

जड़ यथार्थ को टहनी में

चेतन स्वप्नों का बास चाहिए ! प्रतिक्र। करता रहता नित

यथार्थ भ्रपने को, मूतिमान करता

अमृर्त मन के सपने को |

मुझे स्फूर्ति,

मन प्राणों में भ्रभ्ििलाप चाहिए-. विश्व , हास विघटन में नया विकास चाहिए! कौन सत्य है, कौन स्वप्न पीछे. जानोगे, क्या यथार्थ आदर्श शने: ही पहचानोगे ! मुझे सत्य शिव सुन्दर, शान्ति, प्रकाश चाहिए, प्रकर बन में हँंसता : नव भधुमास चाहिए ! त्याग में हे

मुझे त्यागमर्य भोग चाहिए,

भोग

काय व्यस्तता में घ्यानस्थित योग चाहिए!

7६० | पंत ग्रंयावली

युग के भौतिक पिजड़े में बन्दी जग का सन-- मुझे चाहिए ग्राष्यात्मकय नव लोक जागरण मंगुर जग में ईश्वर का भ्रधिवास चाहिए, दशाइवत का सित स्पर्श, शक्ति, विश्वास चाहिए !

प्रतीक कैसे रंग उभरते ये आँखों के सम्मुंख--- रंगों के पक्के 43 भर ग॑ लेते हर,--- बी गा इनके आँख कान मुख ! केबल हँसते रंग हृदय को करते मोहित ! कौन चेतना अभिव्यक्त करती अपने को! मैं कैसे समझ रहस्यमय सन के इस जाम्रत्‌ सपने को ! इन रंगों में शब्द अर्थ भाव भर केवल--- ये करते मन प्राण उल्लसित! खोज रहा मैं वह प्रकाश की किरण मोहती जो मेरा मन- रंगों में जो कहती प्रतिक्षण मुझसे संकेतों में ग्रोपन उर को बातें अकथित! कर्मी

घरा स्वर्ग कश्मीर, प्रकृति का सच्चा: सौन्दर्यस्थल, इन्द्रनगील नम, मरकत हरित धरित्री शस्य श्यामल | गाता सर सरिता भरलनों में गिरि का गीत-मुखर जल, फूलों के रंगों की घादी,--हँसता मुक्त दिगंचल !

शंखध्वति | ६१

केसर की रोमांचित खेती अपलक रखतो लोचन, साँसों में बहता अनाम गन्धों से 2803 ! पहलगाँव, गुलमर्ग मोहंते मुग्ध यात्रियों के मन, निश्चय ही उन्मुक्त प्रकृति का यह प्रिय कीड़ा प्रांगण ! चाँहों में सा घरा उठाये नील नयन अम्बर को, घ्यानावस्थित रखते मिर्जेन गिरि तन्‍्मय अन्तर को ! शोभा से दिगू विस्मित हृदय नमन करता ईइवर को, मन देता धिवकार नरक क्ृमि-से दरिद्र हत 'नर.को ! मुझे स्मरण झाती फिर ग्राम्या : प्रकृति धाम यह जीवित यहाँ अकेला मानव ही रे अभिशापित, जीवन-मृत ! भू विकास युग : सम्भव, नव जीवन मूल्यों से ' प्रेरित धरा-स्वर्ग के योग्य यहाँ लव मानवता हो विकसित !

सौन्दर्य स्पश

सौन्दर्य लोक का वासी मन गूँथा करता श्योभा वेणी शोभा आत्मा की सार सुधा, झोभा भू-स्वर्ग सलभ श्रेणी! जो धर्म दर्शन दे सकता कवि देता वह रस का 890 चैतन्य अमृत, प्राणों का मधु शब्दों के दोनों में 03 पहुँचाता शोभा का प्रकाथ वह पर्ण कुटी, घर आँगन 83६ उर का पावक वितरण करता रस अंजुलि भर जन के मन में ! निज अ्रमस्-स्वरों के सपनों से भरता जग्र-जीवन के कु ब्रण, दीपित करता भ्रवसाद तमस प्रेरणा किरण से छू नूतन! स्व्गिक सम्पद्‌ के खोल रुद्ध वह जन भू उर के वातायन "भावों के शोणित से करता जड़ता के शव को नव चेतन ! सौन्दर्य साधना कृच्छ महत्‌ जीवन के विप को बना अमृत, सह घृणा दंश, दे सहज प्रेम, पश्चु को करना होता संस्कृत !

संयुक्त

वासी लग सकते भला कभी

ये फूल पात, तृण तर इ्यामल, ये सूर्य चाँद तारे--

सरिता का कल कल गाता वहता जल ! जो स्फूर्त समीरण की गति में,

जो शान्ति मील नभ में निर्मेल-- वास्तविक जगत्‌ वह, शेप सकल

_ यान्त्रिक मृत तथ्यों का जंगल!

प्राणों का सागर लहूराता

विद्युत्स्पा्णो चल रजतोज्वल पीमझो रोग्रों के कूपों से,

संचित नव करो हृदय में बल!

“६२ | पंत प्रंथावसी

नव नवता नित्त जग जीवन की

करती मन प्राणों को मीहित, जड़ जग का मुख भी सृजन शक्ति

नव भावों से करती अंकित ! इस नाम रूप जग में रहना

उठ नाम रूप से ऊपर नित अन्तः स्थित रखता मानव को

आनन्द केन्द्र से संयोजित ! तृण तस्प्रों के जग के मुझको

सन्देश नित्य करते प्रेरित खग्-मृग मुझसे बातें करते,

* सबके आशय से उर परिचित !

संगीत एक ही व्याप्त मौन तृण तरू जीवों के श्रन्तर में

चस्तुएँ सभी पाती निःस्वर अभिव्यक्ति उप्ती अविदित स्वर में ! वासी' पड़ सकता जगत्‌ नहीं

सद्यः

सुख सृजन चेतना का बिस्बित, स्फूट सा लगता प्रतिकण अविरत शाइवत के प्रति भपित ! उर केन्ध-शक्ति से भावयुक्त बहु का भी करता श्रास्वादन, बहु भें खोये मानव मन को दुष्कर होता जीवन यापत्र !

आत्म मोह

विप पी, युग सागर का विष पी, जीवन के प्यासे मन, शस्य द्यामला सुधा वृष्टि से तुझे सींचने मझुकण ! अन्तनंभ की उच्च वायुओं की इवासा पी पावन विप प्रभाव से मूछित मन में भर फिर नव संजीवन !

सुरसा सा मुँह फाड़ व्यक्ति

जो

करते निज विज्ञापन

मसक रूप घर, मोह सिन्धु तर गोपदवत्‌ तू झनुक्षण !

आत्म मोह बढ़, दैत्य रूप जब घरता दारुण भीषण निज झवगुण भी ग्रुण लगते तव पर के गुण भी दृषण!

' शंसघ्वनि / ६३

केसर की रोमांचित खेती अपलक रखती लोचन, साँसों में बहता अनाम गन्धों से 8 समीरण ! पहलगाँव, ग्रुलमर्ग मोहते मुग्ध यात्रियों के मन, निदचय ही उन्मुक्त प्रकृति का यह प्रिय क्रीड़ा प्रांगण ! चाँहों में सा घरा उठाये नील नयन अम्वर को, ध्यानावस्थित रखते निर्जन गिरि तन्‍्मय अन्तर को ! शोभा से दिगू विस्मित हृदय नमन करता ईश्वर को, मन देता घिककार नरक कृमि-से दरिद्र हत “नर को ! मुझे स्मरण आती फिर ग्राम्या : प्रकृति धाम यह जीवित यहाँ अकेला मानव ही रे अभिश्ञापित, जीवन-मृत ! भू विकास युग : सम्भव, नव जीवन मूल्यों से भरित धरा-स्वर्ग के योग्य यहाँ नव मानवता हो विकसित !

सौन्दर्य स्पशे

सौन्दर्य लोक का बासी मन गूंथा करता शोभा बैणी शोभा भ्रात्मा की सार सुधा, शोभा भू-स्वर्ग सलभ श्रेणी ! जो धर्म दर्शन दे सकता कवि देता वह रस 0 चुतन्य अमृत, प्राणों का मधु छब्दों के दोनों में मी ! पहुँचाता शोभा का प्रकाश वह पर्ण कुटी, घर आँगन हे उर का परावक वितरण करता रस अंजुलि भर जन के मन में ! निज श्रमस-स्वरों के स्पौशों से भरता जग-जीवन के कंढु ता दीपित करता भ्रवसाद तमस प्रेरणा किरण से छू नूतन स्वगिक सम्पद्‌ के खोल रुद्ध वह जन भू उर के वातायन भावों के शोणित से करता जड़ता के शव को नव चेतन ! सौन्दर्य साधना कृच्छ महत्‌ जीवन के विप को बता रू, सह घृणा दंश्, दे सहज प्रेम, पु को करना होता संस्कृत

वासी लग सकते भला कभी

ये फूल पात, तृण तर दयामल, में सूर्य चाँद तारे--

सरिता का कल कल गाता बहुता जल ! जो स्फूति समीरण की गति में,

जो शान्ति नील नभ में निर्मेल-- वास्तविक जगत्‌ वह, छेप सकल

यान्त्रिक मृत तथ्यों का जंगल ! प्राणों का सागर लहराता

विद्युत्स्पर्शी चल रजतोज्वल पीपभोी रोप्रों के कूपों से,

संचित नव करो हृदय में बल!

“६२ | पंत प्रंघावली

नव नवता नित जग जीवन की करती मन प्राणों को मोहित, जड़ जग का मुख भी सृजन शक्ति नव भावों से करती अंकित ! इस नाम रूप जग में रहता उठ नाम रूप से ऊपर नित अन्त: स्थित रखता मानव को आनन्द केन्द्र से संयीजित ! तृण तस्मों के जग के मुझको सन्देश नित्य करते प्रेरित खग्र-मृग मुझसे बातें करते, सबके आशय से उर परिचित ! संगीत एक ही व्याप्त मौत तृण तरु जीवों के अन्तर में चस्तुएँ सभी पातीं निःस्वर अभिव्यक्ति उसी अ्रविदित स्वर में ! बासी पड़ सकता जगत्‌ नहीं मुख सृजन चेतना का बिम्बित, सद्य; सस्‍्फूट सा लगता प्रतिकण अविरत झाइवत के प्रति भ्रपित ! उर केन्द्र-शक्ति से भाव-युक्त बहु का भी करता आस्वादन, बहु में खोये मानव मन को दुष्कर होता जीवन यापन ! आत्म मोह विप पी, युग सागर का विष पी, जीवन के प्यासे मन, शस्य दयामला सुधा वृष्टि से तुके सींचनेी मरुकण ! अन्तरनेभ की उच्च वायुझों की इवासा पी पावन विप प्रभाव से मूछित मन में भर फिर नव संजीवन ! सुरसा सा मुंह फाड़ व्यक्ति जो करते निज विज्ञापन 'मसक रूप घर, मोह सिन्धु तर ग्रोपदवत्‌ तू भनुक्षण ! झात्म मोह बढ़, देत्य रूप जब घरता दारुण. भीषण निज अवगरुण भी गुण लगते तब पर के गुण भी दूपण!

शंसप्वति / ६३

गाल बजा नर अपने ही से

होता गये - पराजित, अपने को गभोरव देने में

खोता. गौरव अजित ! यश लिप्पा भरमाती,

कुण्ठाएँ फट पड़तीं बाहर, मुट्ठी जब तक बन्द तभी तक

नर के हित श्रेयस्कर ! झात्मदर्प से स्फीत

उसे लगते जग में सब वामन, वाह वाह करते मुख पर

हँसते भत ही मन सव जन ! खुल पड़ता बस्त्रावृत

खूसट हाड़ मांस का पंजर, रिक्त ग्रात्मशलाघा में लिपटा

व्यंग्मग चित्र अपना नर!

पीड़ित बौद्धिक पिण्ड. इलथ केवल, अहंभाव से जर्जर,

बाहर से भी भीतर दु्बंल ! दे ययार्थ की सतत दुहाई

रोता वह जग बंचक, झन्धकार का भौत॑ उपासक

बन प्रकाश का निन्‍दक !

नास्तिक बतला अपने को बनता भाघुनिक निरन्तर, दकियानूसी प्रास्तिक भीतर पूजा करता पत्थर ! जदिल जगत्‌, मानव स्वभाव उससे भी जटिल असंशय, सत्‌-समृद्ध, विद्या विनम्न बन-- जग जीवन प्रति सहृदय !

मेरी वीणा

मेरी वीणा भाव 4७* मृदु मंकार प्रवुद्ध नाद मैं बयां +छ७०८ भ्राति मुझे देश . - उमको ल॑,

६४ | पंत

ज्यों ग्रसाध्य रोगी जी उठता पाकर रस श्रोपधि संजीवन मरणोन्मुख सभ्यता माँगती मुझसे चित्पंखी नव दर्शन [ बहिर्श्रान्त जग को देता मैं अन्त: केन्द्र--स्वतः आलोकित, नयी दिशा देता चेतस को नये मूल्य से कर अभिषेकित ! भले सैकड़ों दादुर ध्वनियों से मुखरित हो य्रुग का भाँगन, भन्द्र मेघ गरजेन सुनकर ही भाव पलल्‍लवित होता जन वन ! किसकी प्रतिछवि---नहीं जानता, मेरा मन नव युग का दर्पण, जन भू मानवता को मिलता इसमें विम्वित भावी आनन ! वह कोरा परिहास मात्र भंगुर ग्रुटधर्मी नव लेखन का, बिना स्पशे पाये शाशवत का आँचल पकड़े मिठते क्षण का ! विश्व हास विघटन के युग में भ्रस्वीकृति ही उसको भाती, जग विकास का पथ, मिटना ही इसमें विघटन की क्षण थाती! मेरी बीणा जीवन रण का शंख वन गयी मेरे कर में-- मानव उर फिर रण क्षेत्र, गाता मन नव गीता के स्वर में !

सुपर्ण

जग जीवन का स्वप्न छूटता जाता मेरा श्रतिक्षण, झपने में स्थित अब मेरा मन बाह्य विश्व प्रति उन्‍्मने ! जमगत्‌ ज्वार ने मुझे उठाकर पटक दिया जिस तट पर वहाँ ग्रसीम अखण्ड शान्ति का मेरा मन अ्व सहचर ! जिसको मेरी दुर्बलता बतलाते बहिर्मुखी जन बह मेरी क्षमता का पर्वंत--मौन, नम्न, दृढ़, पावन ! पथ वबाघक वह नहीं उच्च सोपान जगत्‌ जीवन हित, मूल घरा में उसके गहरे शिखर रश्मि छबि चुम्बित ! मैं स्वतन्त्र चेता, थुग बेत्ता, सृजन चेतना प्रेरित, नंद निर्माण धरा पर चलता जीवन मन झान्दोलित ! यह यथार्थवादी युग हँसता मैं जिस पर मन ही मन-- झथु स्वेद श्रम का संघर्षण बतलाते दुर्दल जन ! दिड का ताड़ बना ये करते भहं दर्प विज्ञापित, हब का हो दायित्य भखिल उनके कन्धों पर स्थापित ! भव यथार्थ ग्लादर्ण उमय जीवनद्धप्ठा के रे कर, दोनों को संचालित करता वह उनसे रह ऊपर! जग जीवन का स्वप्न छूदता जाता मन से प्रतिक्षण, कवि ऋषि दृष्टि सुपर्ण झनश्नन--जगत्‌ भोग रस साधन !

नव चेतन प्ात्म तुष्ट मन करता सर्जेन ! नव चेतन हो गाने लगते घरती में दिसरे सार एण गन |

शंभश्वति | ६४

सुन पड़ती रस चाप तुम्हारी जब तुम तन्मय करतीं नर्तन, श्री शोभा से सहसा मण्डित हो उठता जन मू का प्रांगण ! मन के नयन श्रवण खुल पढ़ते दृश्य शब्द बन जाते निःस्वन, चस्तु जगत्‌ के मुख से उठता साधारणता का अ्वगुण्ठन ! क्षितिजों में चित्रित हो उठते रश्मि छूल वर्णों के गायन, अन्तरिक्ष के पार मौन तुम विद्युत्‌ इंगित करती मोपन | सत्य मुझे: जीवन पदार्थ में दिखलायी देता तब नूतन जब पद अर्थ खोलती तुम नव सूक्ष्म हृदय में भर संवेदन ! बहिजेंगत शव, स्पर्श तुम्हारा पा जी उठता बन नव चेतन, मृत्यु चिता लपटों में सुनता , नव जीवन स्फूलिंग का स्पन्दन ! आत्मकथा

रश्मितूलि से घृपछाँह स्मित इन्द्रघनुप वर्णों में! चित्रित भेरी ही झात्मा का वैभव जीवन सुन्दरता में सर्जित ! ध्यान भौन पर्वत शऑंगों पर मूर्तिमान_ मेरा _ दृढ़ चिन्तन सागर. स्तर के उद्देलन में _ . __ , मेरे श्रन्तर का संघर्षण! रजत -समीरण मेरी साँसों को - झाकूल सौरभ से. स्पन्दित, नदियों .की चंचल गति में / भेरे घ्राणों की कल ध्वनि छन्दित ! झन्तर्नादित शान्त नील में > मेरी झात्मा का नीरबपन, 5 की. जिसमें बनते मिठ्ते रहते विश्व वेदना के जलाद घन !, 5 :' है, ओझोसों के” वन में हँस उक्ते। ह* $ “मेरे 'अन्तः:सुख के ' सित क्षण,

६६ पंत फेंयावंली

विजन निशा-पट में स्व पड़ते तारीं-से मेरे दुख के ब्रण | “निखिल विश्व में लगता मुझको मेरी ही लघु सत्ता प्रसरित, दपेण भर यह बाहर का जग जिसमें में नखशिख प्रतिविम्बित ! मेरी संवेदना चन्द्र बन भू का तम करती झालोकित, आाकांक्षाएँ जुगनूं सी उड़ पन्‍थ खोजतीं नित्य अपरिचित !

तीर्थ स्‍्तात मैं रागद्रेष की ज्वाला में करता जीवन की, अग्नि परीक्षा देता नित झाक्रोश वह्नलि में तप जन मन की ! ग्रात्म कथा मेरी मेघों के . दया विद्रवित उर में अंकित, युग समुद्र मनन्‍्यन से ये घन ज़सड़े सनोगगन सें निश्चित ! मुझको रे प्रिय जन भू जीवन जन मानवता होगी विकप्तित, “आत्मकथा का उपसंहार सुखद श्राशाप्रद तुम्हें समर्पित !

'जीवन बोध

भ्यह जग जीवन का मन्दिर--- हम करने आये पूजन, आत्मा इसकी गहन नीव, स्मित कलश उच्च विकसित मन ! यह विकास कामी--इसमें होते. रहते परिवर्तन, मृत्यु द्वार कर पार रूप धरता श्रमर्त्य॑ फिर नूतन ! जीवन ही भव रंग मंच, नेपथ्य मृत्यु गोपन भर, “कम पात्र--रो-गाकर अभिनय करते निखिल चराचर ! है विविध मूमिकाओं में हो अवतीर्ण _ विश्व नारी नर सुख दुःखान्त सृष्टि ख्पक को देते... प्रगति मिरन्तर !

झंतप्यनि | ६७

कप

सृजन चेतता . के विकास का जग घिर साक्षी दर्पण, भावों, बोघों, लक्ष्यों का चलता रहता. संघर्षण ! इसमें डूबों, पात्र ड्बता जैसे निज अभिनय में--- दर्शक रहो तटस्थ साथ ही-- चुमे शूल हृदय में!!! सत्य जगत्‌ जीवत निदचय, शाइवत विकास का प्रांगण, ईश्वर प्रति आरास्था यवि-- जग जीवन को करी समर्पण!

हांख ध्वनि

मन के वन में श्राग लगाती यह गभीर शंख ध्वनि मेरी, युद्धोन्‍्मुख हत जगत के लिए इसे जन समर्के रण मेरी! कहाँ खो गया वस्तु जगत के जंगल में मानव-लगंता दुख,. बाहर के उजियाले तम -में कहाँ खोजता वह अपना सुख !

वस्तु जगत में अपनी. ही आभा की छाया देख प्रतिफलित' दौड़ रहा वह कस्तूरी मृग सा -*:- अपने ही से हो वंचित! मनुज सम्यता अनति दूर लेगी नव मोड़--न मुभको संशय, घृणा टेप की नहीं, विश्व में दया क्षमा ही की होती जय ! संघर्षण. के चक्रों को स्नेहाक्त स्नेह से करना निश्चय, झपनी ही भीपणता से अब स्वयं पराजित अणु-बल का भय ! खोलो उर के द्वार मनुज, विस्तार वहाँ भुवनों का अगणित, चरण घरेगी मनुज सम्यता नयी भूमि पर भ्रन्तर्दीपित ! जीवन का मुख सहज सेंवारो राग द्वेप रज से उठ ऊपर----

६८ | पंत ग्रंयावलो

मनुष्यत्व का

प्रतिनिधि हो वह,

शिव-सुन्दर से शिव-सुन्दरतर !

अश्रु स्वेद के संघर्षण को आत्म दर्प से दे नव गौरव “स्वर्ग व्यर्थ बताओ उसको -- अहम्मन्यता का जो रौरव !

प्यार करो घरती को निश्चय, किन्तु तृष्णा-कर्दम में सन, आदर दो जन भू जीवन को रह विशिष्टता में साधारण !

ऋए्ति युग

बहिआ्लरीॉन्त मानव मन को निश्चय ही अच्तःकेन्द्र चाहिए,

तभी सभ्यता उठ पायेगी संस्कृति के सित सोपानों पर !

श्रात्म सन्तुलल पायेगा विविध परिस्थितियों में जग की,

मनुष्यत्व की परिधि बहिजंग, केन्द्र प्रबुद्ध-हदय के भीतर !

सामाजिकता बृहद्‌ बिस्‍्ब पृथु-उदर जगत्‌-दर्पण में बिम्वित,

मनुज सत्य का,--आत्मा जिसकी सारमूत सित प्रतिनिधि निश्चित !

सरल नहीं प्रन्त:केन्द्रित होना जन साधारण के स्तर पर,

“विजयी होती भ्ात्ममोध पर वहिर्मुखी जन-प्रकृति निरन्तर ! आज घ्वंस हिंसा

समुद्र में

संघपंण के रक्त स्नान कर

जन मानवता नव समत्व में बेंधती, क्षुद्र विषमताएँ तर !-- झात्मतुष्ट भव मनः संगठन गत युग के मानव का बबेर, नयी एकता स्थापित करता युग, समत्व की सुदृढ़ भित्ति पर ! महत्‌ क्रान्ति युग : मनुंज जगत होता झ्ामूल चूल परिवर्तित, जीवन के स्तर पर पमू्त झात्मा होगी ग्रुण-मूर्त प्रतिष्ठित !

इंखप्दनि /

वस्तु जगत्‌ भी मानव आत्मा ही का ते प्रतिबिम्बित मुख दर्पण,

भाव वस्तु या जड़ चेतन , ईइवर के सृष्टि साध्य औ” साधन !

भारत भू

रूढ़ि रीतियों में पथराया जन भारत भू का जीवन रेती का सागर! ज्वार नहीं उठते प्राणों में शोभा के शशि मुख से श्रेरित,. शक्तिन उर में, जीण्ण पुरातन « पद्धति के तट करे निमज्जित,-- ऊंब डूब करता दुर्वल मन भीतर ही भीतर उद्देलित !. धर्म विधानों में जकड़ा जन भारत का भन पाप पुण्य भय संशय जजेर! विकृत काल के कंकालों के हैं पद चिह्नों से तट रेखांकित, रिक्त भतों, मृत विश्वासों की अन्ध दरारों में भू खण्डित,-- शिक्षित नहीं, प्रबुद् नहीं नर शास्त्र पुराणों के शुक पण्डित, सम्प्रदाय, प्रान्तों से कवलित एक राष्ट्र जीवन की श्राशा लगती दुष्कर !' वर्तेमान भारत -का जीवन “हीन भावना से उत्तीड़ित,. विपुल विदेशों के वैभव से बौद्धिक वर्ग स्तब्ध, झातंकित,---- अपनी भाषा, अपनी संस्कृति अपना सव कुछ यहाँ अवांछित-- वहीं सम्य, भू आत्मा से अनभिज्ञ, सम्य पश्चिम की कोरी अनुकृति, अनुचर! विघटित होता देश आज, शत खण्ड भाग्य-हत बालू का तट, दैन्य, विषमता, हिंसा बढ़ती रु हृदय के मानवीय पट, स्थापित-स्वार्थ ग्रसित .,जन नेता,--- सुनता यह मैं कैसी झाहट ?_-.. रत क्रान्ति क्या निकट गरजती ?-.. शान्ति ! बचाये सत्य-काम तप-भू को ईश्वर !'

७० | पंत प्रंथावली

राजू

राजू छोटा सा था जब मेरे घर आया, दस पन्द्रह दिन का हो सम्भव ! बड़े प्यार से पाला पोसा मैंने उसको,--सच यह, उसने छीन लिया था प्यार, बिना जाने ही, मुभसे !

सभी जानते हैं बिल्ली का वच्चा कितना ऋ्रीड़ाप्रिय होता है! उसने मोह लिया था सब का मन अपने विचित्र मौलिक खेलों से ! आँगन में चिड़िया की उड़ती परछाँई को पंजा मारा करता था वह, उसे पकड़ने !

गति का अदमृत प्रेमी था वह ! उसके झागे उंगली झ्ाप नचाएँ, वह कौतुक से पागल, भपट हाथ पर, उंगली पंजों में दबोचकर, उसे चबाता छोटे तीखे दाँत चुभा कर ! कभी उलटकर चिपट पाँव से जाता चुपके प्रपनी चपल प्रकृति से प्रेरित--

मुभको चलता देख अ्रजिर में !

एक वार छत पर सतबहनी को खाकर वह लेटा था, छिप खिड़की की ऊँची मुंडेर पर, घनी मालती लतिका के पत्तों से झावृत ! उसे नहीं देखता कभी जब बड़ी देर तक मैं पुकारता राजू, राजू, पुसी पुसी की बार वार रट लगा, (पड़ोसी हँसते मुझ पर) ! वह मुंडेर से बोला तृप्त उनींदे स्वर में---

छत पर से दुत, म्याउँ म्याउं कर, अभिनय करने लगा कूदने का आँगन पर !

ऐसे भ्रवसर पर, मैं उठा बेंत की कुर्सी उसे उतारा करता छत से ! हरि अनन्त हरि कथा भअनन्ता !--राजू के भी हैं असंख्य लीला प्रसंग--जो मुझे , स्मरण हैं! ऐसा कोई स्थान ने था वह जहाँन सभिलता-- अलमारी में सोया, भाजी की डलिया में, धोबी के कपड़ों की पेटी के अ्रन्दर छिप [--- सभी मुंडेरें शयन-तल्प थीं उसकी गोपन ! मैं कागज की गेंद फेंकता उसके झागे वह बिजली सा लपक, उछल द्रुत, उसे पकड़कर पिछली टाँगों के बल खड़ा खेलता उससे,-- अंग भंगि दिखला चंचल, सौं सौ बल खाकर !

जब कोई बिलला घुप्त आता उसके घर में तमक, पर्वताकार फुला लेता रोमिल तन,

शंखध्वनि | ७१

डील डोल की उसकी भारी गुर्राहट सुन :; नौ दो ग्यारह होता डरकर तुरत विपक्षी ! अगर गिलहरी चंचल लहरी जन्तु-जगत्‌ की, बिल्ली चटुल मंवर--जो कुछ मिल तो प्रपनी पूंछ पकड़कर, स्वयं नाच सकती पागल सी !

चूहे को वह जिस कौशल से मारा करता उससे उसकी छलवल भरी घटोर त्रक्ृति का बोध सहज हो जाता ! बड़ी कुशलता दिखला विधि ने विल्‍ली की रचना वी सब जीवों में ! उस पर अपनी सृष्टि-कला श्रवसित कर सारी ! कसी श्री सुकुमार लचीली देह उसे दी, कितनी सुन्दर चित्र लिखी सी मुद्राश्रों में सोने,की प्रिय[कला, स्वच्छ तन रखने की रुचि,-- दूघ मलाई आदि व्यंजनों का प्रेमी वह!

एक बार वह श्रध॑ रात्रि को खाने आया,

तीन बजे होंगे, भनन्‍्द्रह फरवरी रही तब,

जाड़े के दिन, मैंने खोल किवाड़, उसे

कमरे के अन्दर गोश्त खिलाया,

दूध पिलाया,--सोचा अरब वह कुर्सी पर

जाकर सोयेगा--बन्द कर दिये द्वार--किन्तु वह

वार बार गुर्रा कर, अपना रोप प्रकट कर

पंजे से खोलने लगा पट, म्याडँं स्‍्थारउं कर ! मौत नाचती होगी उसके सिर पर ! --.मैंने जाने दिया उसे | वह बड़ी स्वतन्त्र प्रकृति का ढीठ किन्तु स्नेही विलला था, श्रौ' पड़ोस में उसकी थी ससुराल बड़ी--वह बहु ब्याहा, चाहा >वाराथा-गुद्य रात्रि जीवन का प्रेमी फ्रेंच मैन सा!

वह फिर तब से कभी नही लौटा अपने घर !

कई दिनों तक उसकी रही प्रतीक्षा सबको !

इधर उधर खोजा भी--कहीं दिया दिखायी !

सारा घर सूना हो गया बिना राजू के!

बड़ा बुरा लगता अब ऐसे ओऔड़ा कुशल

सुधर जीवन साथी को खोकर ! श्रव भी सुभको

लेटा कभी दिखायी देता: वह उपवबन में

स्मृति की आँखों में विम्वित हो ! -मधघुरस्वप्न सा

जहाँ जहाँ वह सोता छिपा लता कुंजों में - वहाँ कहीं उसकी छाया अब भी मेंडराती, फूलों की ढेरी सुफेद (--जब कभी करुण घ्वनि स्पष्ट सुनायी देती आँगन से आती सी, हार खोल मैं उसे खोजता--कहाँ गूँजता

७२ | पंत प्रंथावली

यह भ्रदृश्य स्वर ! पर वह छः वर्षों का साथी प्यारा राजू चला सदा को गया स्वर्ग प्रव, मुझे छोड़कर प्रिय स्मृतियों के कंटक बन में ! प्रय कभी लौटेगा मूक सुघर स्नेही वह ! !

सकदट

ज्योति सूत्र सी कृध चेतना मनुज के भीतर,-- जिसे बिरोधों के पर्वत का बिकट सामना करना पड़ता, इस घिराटू जग में रहने को! सहने पड़ते उसे कर प्रापाता पझनेकों जो पग्म पग मुँह बाये देते उसे चुनौती !-- प्रत्यवार पो साना गूढ़ नियति प्रात्मा की! धीरण रसना ही विपत्ति में मात्र महोपषधि; जीवन की सब स्थितियों में विद्रोह सम्भव ! थाहर थी विपदाएँ होतीं कभी कुलंय, यदि प्रन्तःस्थित हो चेतस, स्थिर निर्मल हो मति ! संकट सभी निवारण हो सकते यत्नों से यदि तटस्थ रह, समझ सकें हम उनका कारण !

भीतर का संकट ही वास्तव में संकद है, विचलित हो यदि चित्त, श्र॒स्त उर, मति में हो भ्रम, डिग जाये यदि प्रास्था, प्रपने प्रति हो संशय, जीवन के प्रति रहे प्रेम उत्साह मन में,-- ऐसी स्थिति में ईश्वर ही रक्षा कर सकता,-+ वह रक्षा करता भी है, यदि उसे पुकारें!

सनोभाव

मैंने बोयें फूल, किन्तु उग झाये कांटे ! बीज ठीक थे, धरती भी अच्छी उबर थी, पर अनेक श्रज्ञात शक्तियाँ ऐसी होतीं जो निद्चेतन से जगकर दूपित कर देतीं चेतन के पाले पोसे मंगल विधान को!

मैं भ्रव क्या काँटे बोऊँ? तो क्या उनसे भी फूलों की फसलें उग पायेंगी ? नहीं, नहीं,--- मैं फूलों को ही बोऊँगा जग के मग में | --- फूलों से काँदे नहीं उगे ! काँटों के भी मूल रहे होंगे भू-रज में, जो फूलों से पहिले उग आये, फूलों सेंग सीचे जाकर ! 'फूलों में भी कांटे होते, इन्द्र जगत्‌ यह !

शंखध्वनि / ७३

पर, मैं फूलों को ही वोऊेंगा भ्रू-उर में, काँटों के बिरवों की जड़ें उखाड़ फेंककर फूलों के पाँवड़े बिछाऊँगा पलकों-से, मानव भावी का पथ निष्कण्टक हो जिससे,-- विचर सको तुम भू पर नव स्वप्नों के पग घर !

प्यार

सुझसे चिढ़ते सुहृद--लुटाता रहता हूँ. मैं भले बुरे पर प्यार ! मुझको बोध तनिक भी भले बुरे का, पाप पुष्य का ! मैं मन ही मन विचलित हो उठता उनकी फटकारें सुनकर !

सोचा करता, क्‍या कीचड़ में प्यार फेंककर दुरूपयोग या अपचय करता मैं अनजाने : दिव्य प्रेम का ? मुझको लगता मुक्त प्यार का अमृत स्पर्श पा, कीचड़ अपना गरन्दापन पहचान सकेगा, शौर खाद बनने का यत्न करेगा, निधि पा झतुल प्रेम की ! और प्रेम तो अकलुप है ही ! वह पंकज बन, सदुपयोग कर तुच्छ पंक का, नया मूल्य दे सकेगा उसे !

निश्चय, कभी अपव्यय होता नहीं प्रेम का, बह अव्यय है, सदा लुटाने से बढ़ता है!

सन्तुलन

बिखर गयी भू जीवन झोभा, छन्द बेंधता नव स्वर लय में, आस्था का प्रेरक प्रकाश बुक गया हृदय के भय संशय में ! अन्ध तृथा का भुजग़ रेंगता अन्तर में क्षण क्षण बल खाता, उसके फंण में .मणि,---प्रकाश उसका जाने क्‍यों मन को भाता ! नया वस्तु आनन्द आज ! अवतरित हो रहा इन्द्रिय पथ पर, जो वर्जित को स्वीकृत करता, बता विरूप विकृत को सुन्दर ! मूल्य किचित्‌ मूल्यवान्‌ श्रब, “मूल्य हीनता ही अमृल्य धन, मुक्ति इसी में-पाप पुष्य सापेक्ष--व्यर्थ सब नैतिक बन्धन!

७४ | पंत ग्रंथावली

नयी सभ्यता जन्म ले रही

झाज घरा के जन-प्रांगण में, निकल माँ६4 से पशु

निह्वें नव विचरता जग जीवन कानन में ! सामाजिकता से क्‍या करना ?

तुष्ट व्यक्ति स्वातत्य चाहिए, प्रगर थाहना ही हो तो

अवचेतन गहछ्धर झाप थाहिए! अंश सत्य सब में है--

मन के तम को होना जीवन-पावन,. आज एक बहु, भोग त्याग में

पग॒ पग पर चाहिए सनन्‍्तुलन !

व्यक्ति चेतना

स्वर्ग त्रक का निर्माता विज्ञान धरा पर--

भू आँगन को उसने भले सेंवारा सुन्दर

किल्तु मतठुज रह भया मनुज का व्यंग्य चित्र भर,

स्पर्धाग्रस्त, कुरूप, नग्न स्वार्थों का पंजर ! नैतिक रीढ़ विहीन रेंगता वह जीवन-मृत, बाह्य परिस्थितियों के क्रूर करों से कुण्ठित ! प्लास्टिक के रंगीव , खिलौने सा प्रिय दर्शन, हृदयहीन वह, झात्मिक गरिमा में भी निर्घन !

बहिर्श्ान्त, व्यक्तित्व विमुख, जन कृमि साधारण,

भोग पंक में डूबा, उर में राग द्वेष ब्रण!

श्रन्तर्जीवन शून्य, खोजता बाहर सुख क्षण,

बढ़ता ही जाता मृगजल जीवन संघषेण ! व्यक्ति चेतना धारा बिना जगत्‌ पथ निर्जन, भंगुर सैकतवत्‌ सामूहिक लोक संगठन !' आ्राज शक्ति शिविरों के भीषण घ्वंस उपकरण मानवता के आत्म पराजय के हत साधन !

सार्थकता

लहरों पर लिखता हूँ मैं जब अपने मन के गाने तारा पथ से उतर नदी में हँसती तुम अनजाने ! क्षण के करतल पुट में अघटित घटनाएँ बन्दी कर सृजन कर्म का गूढ़ रहस्य सुझाती तुम क्षण क्षण पर !

शंसध्यति / ७५

ज्जो कागज की नाव छोड़ता

मैं समुद्र में प्रतिदिन तुम उसको खेती हो

बिठा चराचर उसमें भ्रनगिन ! खर तृण कण से चुनता मैं

उन्मेष भरे युग गायन, पथ पर गुंजित स्वप्तों की

पद चापें सुनता गोपन !

सिन्धु ज्वार सामूहिक जीवन का उठता ;जन-भू पर-- खड़ा शिखर पर , मैं « गति लय में भरता नव चेतव स्वर ! पीला पतकर वन में भरता कसा लगता सुन्दर, हि. सृजन कला निज श्रा्दि रूप में निश्चय पूर्ण दिगम्बर सूना नीला गगन, पं ताकने में मिलता मन को सुख, भाव जप से मे कला का 5 शोभा में गुण्ठित [किलर हर गूंगों चहरों को मैं गीत सुनाता ध्वनि इंग्रित कर, मन की अपलक आँखों में ग्रक्षय शोभा चित्रित कर! ..

अहंकार का ममता मणि फण अहि करे उर दंशित, सार्थकता मानव जीवन्‌ की तुमको हो चिर अधपित !

“निर्घोष

सृजन झांख, ; नव स्वर ध्वनियों से गभित हो अब जन मु का मत, नये बोध के श्रंकुर फूटें जगें रुधर में नव संवेदन ! युग समुद्र मन्धन से निकला कालकूट जो भीषण मादन-- उसकी मसि में ड्वा लेखनी -: सृजन अमृत मैं करता वर्षण!

“७६ | पंत प्रंयावली

इवेत कृष्ण यो सुषधा गरल फो मिला बना नव रस संजीवन, मृत्यु मेघ को दुहनदुह में बरसाता जन-भू पर नव जीवन! ध्वंसास्त्रीं से भ्राज पराजित झसुर शक्तिबल संचय निश्चय, दया क्षमा ही मानवीय बल-- मनुण मनुज के प्रति हो सहृदय ! युद्ध युद्ध से नहीं अर्मेंगे, घृणा मानव जीवन दर्शन, हिंसा देगी शान्ति जग को-- प्रेम-स्पर्श ही भरता उर-ब्रण ! सत्‌ की करो समृद्धि--असत्‌ का सह निर्मम य्रुग-मृगु पद-लांछन,. सत्‌ संकल्प शक्ति सामूहिक युग पथ संकट करे निवारण !

पुरस्कार

पुरस्कार भगवान्‌ दिलाएँ नहीं किसी को! मित्र इत्र हो जाते इससे! और प्रशंसक कदु झालोचक बन, कृतित्व के साथ झापके लघु चरित्र को बना दूपणों का पहाड़ पृथु आत्म तुप्टि पाते हैं, तिल का ताड़ खड़ा कर !

पृष्ठ भूमि गढ़ नयी आपकी छिद्र | भरी दुर्बंलताओं की, राग द्वेप की! भले बाँट दें. श्राप उसे (वह बेंट भी गया, सभी जानेंगे) ! पर स्पर्धा आक्रोश कभी मिट सकता इससे !

मुझे चुनौती मिलती:वे भी चाहें तो सब पुरस्कार पदवियाँ स्वयं भी हथिया सकते-- किन्तु खुशामद करना उन्हें पसन्द नहीं है! *** पुरस्कार का दुरुपयोग भर खलता उनको-- कौन न्याय कर सकता, कौन बड़ा सर्जक है? पुरस्कार पा क्‍या लेखक महान्‌ हो जाता ?”

मैं उतका अनुमोदन करता-पुरसकार से लेखक कभी महान्‌ नहीं हो सकता निश्चित; वर कृतित्व ही - शाइवत कीति स्तम्भ ख्रष्टा का ! पुरस्कार से इनको भी भगवान्‌ बचाये इनको ,भी सुनता पड़े यह सब ओऔरीं से !

शंखघ्वनि / ७७५

सायाजाल

मेरे अपने बीच सोखली भूंठों का तुम जान तानती रही प्रतिक्षण, लुस्त हो रहा अब ' चहू झोभा वंग सम्मोहन, क्षीण तुम्हारे प्रति श्लाकर्षण ! क्षण भंगुर मुख, सम्भव, अनजाने ही तुम भी हो जाग्रोी अन्तर से झोभकल, उठ जाये सहसा मुख से साया का भीना अंचल ! व्यर्थ सभी हों. भूठे छलबल बिना सत्य के रहे झास्या का भी सम्बल ! चूर्ण बोध मैंने अपनी क्षुद्र चेतता का लघु आँगन भाड़-पोंछ कर दिया स्वच्छतर, गत स्पृत्तियों के दृह मिटाकर, जी शीर्ण को 8) जीवन दे. फिर नूतन! अब वह दिग्‌ द्ण सा ,विस्तृत, निखिल विश्व जिसमें. प्रतिबिम्बित ! आँगन नहीं, खेत बहू उर्दर, हु घास पात तृण छील वीव खर कंटक दुष्कर,-- नव शोभा के शस्य ) वहाँ मैंने ;रोपे- श्मित,---,, * स्वणिम लपदें फूट रहीं ०९ - -जजः -- जिनसे सौन्दयय प्ररोहित ! खेत नहीं, वह ,बीज भी स्वयं, पु -ऊब्चे प्राण अक्ुओं .में पुलकित --- - नव चैतन्य क्षेत्र कर विकतित--- 7 नव भावों छोघों की .. भंजरियों में अब वह मुकुलित/-- प्रेम, तुम्हारे प्रति चिर अपित, हे ।£ » $ लोक भावनों' रंजित, 240 3 *प्रन्ते: सुरभित !

७४ -| पंत प्रंथादलो

अतृप्ति

मलय समीरण के संदेश अधिक नहीं थी सब्यदि: रोमांचित भर देह हो स्पशे --- मंजरित उसकी साँसों को पीकर तन मन हो उठे पुलक-विह्नल, प्राणों का सुख दे सका उर को तन्‍्मय आस्था-सम्बल ! बोली दक्षिण पवन-+ नृत्य-रत रहता नित मेरा यौवन, अगणित साँसों में सुगत्ध वितरित करती हूँ मैं प्रतिक्षण ! क्षण सौन्दर्य गवाक्ष

खोलती भर मैं नयनों में झपलक,--- पूर्ण तृष्ति आत्मानुभूति दे सकती तुम्हें रस साधक ! पूर्ण समपंण कोरे तन को

प्यार नहीं करता मन, जब तक हो सम्पूर्ण हृदय समर्पण ! बवारी मांसलता के ऊपर पशु भी होता नहीं निछावर, पराणें के भेतर रस के स्तर खोजा करता वह रति कातर ! क्षण में शाश्वत नहीं समात्कन जब तक

खुल सके झन्त:पुर के पट गोपन [ ड़

+ शंथष्वनि | ७६

प्रेम वह्नि ही में लक प्रज्यलित प्रतिक्षण दग्ध काम का' ईंघन

होता : पावन ! भव सीमा निःसीम बनती जब तक मत्य घरा

बनती स्वर्ग “का प्रांगण!

अविच्छिन्न

क्यों हँसते रहते फूल सदा कोई रहस्य क्या उन्हें ज्ञात ? चुमी साथे आकाश, उसे कहती वह कैसी गूढ़ वात ? चंचल फिरता वातास, समा पाती हृदय में भाव गन्‍्ध, गाता सरिता जल बह कल कल पथ तिरता बिना तरी अनन्त ! जलता रहता पावक भ्रहरह लो लगी दीप्त उर में विशेष, पर्वत अन्त: केन्द्रित नीरब स्वर में देते गोपन सैंदेश ! मैं भी संयुक्त निखिल जग से, अज्ञात हर्ष से भानदोलित गाते मेरे शोणित के कण भूमा के स्पर्शों से प्रेरित ! कतंव्य जीना अपने ही में एक महान्‌ कर्म है, जीने का हो सदुपयोग यह भनुज धर्म है! - अपने ही में रहना एक प्रबुद्ध कला है, * जग के सेंग रहने में सब का सहज भला है! स्त्री का प्यार मिले जन्मों के [पुण्य चाहिए, भव जीवन को प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए! ज्ञानी बन कर मत नीरस उपदेश दीजिए, लोक-कर्म भव-सत्य, प्रथम सत्कर्म कीजिए !

मनोव्यथा

दुःखी रहता मैं मन ही मन! ऐसी भारत-भू में जन्मां जहाँ अतल दारिद्र सिन्धु में ७-५ डूबा जन का जीवन! हो जहाँ व्यर्थ रे आत्मबोध व्यर्थ ही ऊध्वे आ्रारोहण ! लहरों से उठ कर हि - भअ्रसंख्योककर मुझे बुलाते:: गर्जन भरते उदर, | न... पानी

रख ८० | पंत प्रंयावली ;

कदों. से टकराते, खिंसियति ! सूजक क्‍या करे? अऋान्ति ज्वार में उमड़ कुद्ध जन लाौँघ ख्ड जीवन _ तट मन की सीमा डुबा मे पते! पद मंद कामी वबौने नेता विश्व भासदी के अभिनेता | -- अरब भी नहीं लोक मन चेता ! --- यूल्यों के विप्लव में कवि ही संस्कृति बोहित कैसे खेता? विन्तातुर रहता मेरा मन ऐसे युग में बनन्‍्मा हूँ मैं-- जन भू पर छाया जब विधटन हास, . घ्यंम, भौतिक संभर्पण, राजनीति को प्यात्री में जब डूब रहे आदर्श चिस्नन! भोगवाद के पीछे प्रागल जब चरित्र से हीन सम्य जन ! सोचनसोव कहता मेरा मन,-- व्यर्थ सैन्य, गस्त्रास्त, बाहु बल, राष्ट्रों की कटु स्पर्धा निष्फल,--- मद्माक्रान्ति का ग्रग बढद्विस्न्तर, थरर्य चाहिए, दृष्टि, मतोदख £ झआस्दीखिय चेतना » चाहिए बीधघ्र. मेँ अ्राहिमिक संम्दण |

किम्पु,

प्रतिक्रिया

लो, स्वतन्द्र श्रव देश-- भरर्गी का क्षृद्र दमित बन आदर दमड़ रह श्रद प्रशिक्षण, करता कट श्राशीयन,

कर प्रस्याशीवन ! होने भाद्ददा ग्रस्त

| द्र्य श्र दायर प्रमंस्कृत द्वेलव

वमन कर रहा अब सेड़ाघ 3 निज अ्वचेतन की गोपन [-- बुद्धि हीनता का कर नग्न प्रदर्शन,

प्रतिभा शिखरों का कर

नित्त अवमूल्यन !

छिद्वान्वेषी मूपक है छिपे अहंताओ्रों के श्रन्ध विलों में बन्द किलों में--

संग्रह किये तुच्छ उच्छिष्ट जगत्‌ जीवन का, कुण्ठित मत का . अपनेपन का! वे कुढ़ गाली बकते जिसे नहीं लिख पाते-- घृणा उगल जो लिखते उससे नहीं अघाते ! वेदों के, तुलसी युग के दादुर वदुन्‍ध्वनि कर अब ने मधुर रव भर मन के कानों में गाते !-- अहंकार की घन वर्पा में पेट फुला गज दम्भी मेंढ़क दर्प मुखर कर्कंश स्वर में टर्राते ! क्षुद्र नदी नाले ठेढ़ी मेढ़ी गति में बह युग के कूड़े कचरे से 'भर-भर इतराते कला बोध, युग मूल्य निखिल दुर्गन्ध से भरी यौन भावना की घाटी में गिर खो जाते! मेरी आस्था 4:७६ % 2 अपने पर हो उठती दुढ़तर, और श्रात्म-विश्वास प्रबलतर, लद्ष्यअ्रष्ट इन धनुषंरों के खा कुण्ठित शर! निश्चय, प्रतिभा का विद्युत्‌ फण मेरे भीतर होगा _ मणिफल, जिसके स्पर्श मात्र. से दंशित विचलित हो उठते , प्रतिस्पर्धी खा ब्रण!

४३ | पंत प्रंपावलो

भात्म विजित दइत जिह्लामों से कटुता का विप करते चर्षण!

वियतनाम

शूरवीरता के अ्रप्रितम निदर्शन निदचय, पौरुष तेज प्रतीक, धन्य तुम वियतनाम जन ! मिज स्वतन्त्रता की वेदी पर हँस-हँसकर तुम करते सब झाबालवृद्ध निर्भीक समर्पण! ्र्यायी श्राक्रामक से ले लोहा प्रतिक्षण अडिग वज्यथ संकल्प शक्ति से प्रेरित होकर तुमने, जन स्वातन्त्य चेतना के संरक्षक, रौंद दिया सरम्राज्यवाद का रण मद दुस्तर ! ठहर ने सकता अत्याचारी सत्य युद्ध में जन-भू का इतिहास थुगों से इसका दर्पण, सत्य जयी होता, अजेय जन शक्ति स्रोत जो जन मन प्राणों में भरता वह जीवन बूतत !

भ्रम्वि - शिखा-्सी तेजस्विनी स्त्रियाँ वैरी का मान भंग करतीं--विद्युत्‌ श्रसि सी कढ़ बाहर, सार्थक स्त्रीत्व हुआ उनसे, जन-मू पथ पावन, खण्डी फिर झसुरों की वलि लेती भर खप्पर ! प्राणों से भी प्रिय स्वतन्त्रता वियतनाम कौ-- हो-ची-मिन्ह प्रेरणा भर गये शोणित कण में-- मृत्युंजय सन्देश समर में बन उर-सम्बल प्रति हृत्स्पन्दन के सेंग गाता जन गण मन सें !

भू इतिहास नये य्रुग में करता प्रवेश अब ओो अजेय नर सिंह, तुम्हीं उसके निर्माता, अ्रन्ध शक्ति को आँख मिल गयी तुम्हें वरण कर, रक्त पूत भव मृत्यु क्षेत्र, कृतकाम विधाता !

जीवन के साधारण सत्यों को अतिक्रम कर महाध्वंस के क्षण में जन-मन हो, अतिचेतन, महानाश के चरण तोड़, नव सृजन कर रहा, वितरित जग में अमृत, कण्ठ में कर विष धारण !

लेनिन के प्रति

एक शत्ती के बाद झाज भी लगता मन को महापुरुष अवतरित हुए तुम लोक घर पर, जन-मण की दारिदय दुःख दासता निशा की कर निरंकुश युगबयुणग की वेड़ियाँ तोड़ने !

शंखध्वनि / ८रे

रुद्ध प्रगति, स्तम्मित थे युग इतिहास के चरण अस्तर युग की रूढ़ि रीतियों में पथराबेर-- झान्दोलित कर लोक चेतना सागर तुमने मज्जित कीं गत सीमाएँ जन-मुक्ति ज्वार में

दिगृव्यापी भू-कम्प सदृश तुम विचरे भू पर

छिन्न-भिन्न कर जीर्ण भ्राततायी जन-वन्धन---

नया मोड़ दे यन्त्रन्सम्यता को जन युग की! शर्तियों से पद दलित ल्लुधित, झोषित असंख्य जत थर्ग सभ्यता के खंडहर से जगकर सहसा जीवन-मुक्त लगने बढ़ने पा नया दिशा-पथ नव आाशाप्कांक्षाओं के स्वप्नों से प्रेरित !

रक्तोज्बल मानव गरिमा के नये सूर्यन्से

उदित हुए तुम विश्व क्षितिज पर महिमा मण्डित,

जन-मू के ओनेन्‍्कोने का अन्धकार हर

दिक्‌ प्रसन्न जीवन-प्रभात ला जन प्रांगण में ! घन्य महामानव, भू पर चरितार्थ कर गये वैज्ञानिक युग को तुम--निखिल शक्ति का संचय, सन्‍्त्रों की सम्पद्‌ वितरित कर जन-मंगल हित !

नवोन्मेप उर में, नयनों में सृजन-स्वप्न नव,

अगणित कर-पद सामूहिक श्रम-बल उन्मेपित

बढ़ते जन संस्कृति का नव प्रासाद संजोने ! मं

रहा मैं अनतिदूर, भावी आँगन में

घरा-स्वर्ग कल्पना शने: साकार हो रहो- भू मानवता निकट झा रही भ्रधिक तुम्हारे!

लोक क्रान्ति के दूत, जानता सूक्ष्म दृष्टि से

तुम गांधी एक ही सत्य के शुध्र संस्करण,--

देह प्राण मन के मानव को उपकृत करने

भाये तुम जन-मूं इंतार्य अब बहि: संगठित ! की मनुज हृदय को उन्नत करने झाये गांधी श्रात्मा का दे सौम्य स्पर्श अ्न्तर्मुख मन को-- तुमसे लेकर महत्‌ साध्य, गांधी से साधन निखिल विश्व-जीवन संयोजित हो जन-मभू पर अहिज्तेर वैभव प्रतिनिधि बन: (झ्राज विपक्षी * संन्‍्य शक्ति शिविरों में खण्डित !) मनुष्यत्व का हृदय सत्य-स्पन्दित हो, निर्मेम यान्त्रिकता के लोह अस्थिपंजर में - जकड़ा श्रथे-काम से ! भानवीय भौरव हो प्राप्त जगत्‌ जीवन .को !

महाघष्वंस की भ्ाशंका से मुक्त घरा जन...

विश्व शान्ति के सित सहस्नदल पर दिग . विस्तृत

लोक साम्य सेंग विश्व ऐक्य को करें प्रतिष्ठित--

मनुज प्रेम के आलिंगन में बाँध घरा को!

तुम्हें नमन करता शत, लेनिन, भारत का कवि---

झाविर्भाव तुम्हारा था अनिवार्य जगत 'हिंत !

४४. पंत प्रंथावेली

शशि की तरी

स्मृति-गीत

[प्रथम प्रकाशन-बर्ष : १६७१]

फालसई सन्ध्या नभ में स्मृतियों की शशि तरी स्नेह सम्पदा भरी-- स्वप्न पालों से मण्डित, तुम्हें, प्रनुपमे, भ्रपित !

परिचय

ाशि की तरी' के गीत अनुपमा को समपित हैं। अ्रनुपमा एक तीन-चार साल की भोली लड़की थी, जिसे मैंने स्वराज्य भवन, इलाहाबाद के बाल भवन (0प्रोगयश्ा पपक्षा०70 759700०) में देखा था। उसे बाल भवन की संरक्षिकाओं ने अत्यन्त लाड़-प्यार से पाला-पोसाश्था | बीच- बीच में उसके कई चित्र भी लिये गये थे, जिनमें एक चित्र श्रीमती इन्दिरा गांधी के साथ भी है। तव में और अब में उसके झालोक मण्डित व्यक्तित्व भें जो मार्दद, जी भाव सौन्दर्य तथा आन्तरिक निखार श्रा गया था वह अवर्णनीय था। जिसने उसे नहीं देखा वह शायद ही उन चित्रों को देखकर उसका अनुमान कर सके अजुपणा में जप्ले ऐसे कोल-से विशिष्ट एवं उच्च संस्कार थे कि उसे देखते ही मेरा हृदय उसके प्रति गहरे वात्सल्य भाव से भर गया, भौर 'दिन-पर-दिन उसके प्रति मेरे मन का आकर्षण बढ़ता ही गया | यह सब कुछ ही दिनों के भीतर पूर्णरूप से घटित हो गया। उससे पहली बार मिलने पर मैंने 'शंखघ्वनि' में उसे सम्बोधन कर जो कविता लिखी है (पंत ग्रंथावली, खण्ड ६, : पृष्ठ २८) उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं--- बाल भवन में तुम्हें देखकर आज अनुपमे, आ्रात्म पराजित झनुभव करता मैं निज मन में तुम्हें गोद लेने को आतुर तब से मेरा हृदय तड़पता--तुम निरीह सुकुमार बालिका*"* तुमसे सुन्दर कन्या मुझको नहीं चाहिए। तुम सुन्दर बन सको हृदय से--पा अनुकूल परिस्थिति, रुचिकर शिक्षा-दीक्षा*** मन का ही सौन्दर्य चाहता हूँ मैं तुमसे ! मैंने भ्रपती झोर से उसे 'स्तुति' नाम दिया था 'शंखघ्वनि' में ही (पंत ग्रंथावली, खण्ड ६, पृष्ठ २५) 'स्तुति” शीपंक- रचना भी उसी पर लिखी गयी है। झनुपमा बचपन से ही कुछ अस्वस्थ थी। साधारणतया तो उसका स्वास्थ्य वहुत अच्छा था, पर जंसा मुझे बताया गया था, उसके चुटने की हड्डी कुछ बढ़ी हुई थी और बार-बार घुटने की टोपी से रगड़ खाने के कारण उसमें प्राय: सूजन हो जाया करती थी बाल भवन इलाहाबाद के मेडिकल कालेज से सम्बद्ध है। जब मैंने रोग के सम्बन्ध

शन्चि की तरी / ८६

प्रेम, तुम्हीं हो स्नेह, .. .. तुम्हीं वात्सल्य भाव हो, तुम्हीं फूल शर, तुम्हीं मर्म के गुह्म घाव हो ! सूक्ष्म दृष्टि रख » अणुवीक्षणमय तुम्हीं धाहते * मनुज का हृदय-- भ्रतल गहनताझं में डूब अनामय,-- लघु भणु की प्रच्छन्‍्त महत्ता का दे परिचय !

शशि की तरो / ६६

में वहाँ के डायटरों की राय जाननी चाही तो उन्होंने मुझे प्राध्वासन दिया कि धुदने की शल्य-फ्रिया हो जाने के बाद उसे किर किसी तरह का कष्ट नहीं रहेगा भौर वह पूर्णतः स्वस्थ हो जायेगी चूँकि तीन-चार साल की उम्र से पहले प्रापरेशन करना ठीक मे होता इसलिए वे लोग प्राज तक रुके हुए थे।

मैंने उनसे उसको इस संकट से उबारने की प्रार्थना की, जिससे मैं उसकी शिक्षा-दीक्षा का प्रवन्ध कर सकूँ दुर्भाग्यवज्ञ, घुटने का सफल आपरेशन होने के बाद से, एनिस्थीज़िया के प्रभाव से मं उबर सकने के कारण, फिर उसकी स्मृति कभी नहीं लौट सकी। तौन-घार दिन के भीतर ही उसकी दशा और भी बिगड़ती गयी। चौथे दिन रात्रि के बारह बजे मु भरस्पताल से फ़ोन द्वारा सूचना मिली कि वह स्वगें की कली अपनी देह-लीला समाप्त कर चली गयी है। डाकटरों ने मुझे बताया था कि हज़ार-दो-हजार में एकप्राथ वार कभी ऐसी स्थिति भरा जाती है कि एनिस्थीजिया रोगी के मस्तिष्क में चला जाता है भौर फिर उसकी चैतना नहीं लौटती खैर, डावटरों ने प्रत्यन्त तत्परता तथा सहृदयता के साथ उसकी देख-रेश्व की, जिसके लिए मैं उनका छृतज्न हैं।......#9

अनुपमा के इस प्रकार प्रकस्मात्‌ श्रप्रत्याशित रूप से चले जाने के कारण मेरे हृदय को जो भ्राघात लगा, उसे शब्दों द्वारा व्यक्त करना भरसम्भव है। अनुपमा ने मेरे हृदय में सदेव के लिए अपना स्थाव बना लिया है। उसने भद्थ्य होकर मेरे स्वप्नों के संसार का ही रूपान्तर कर दिया है। उसी की स्नेह मधुर स्मृति में भेरे मन ने ये गीत गुनगुनाये हैं। १८ / बी० ७, के० जी० मार्ग सुमित्रानंदन पंत इलाहाबाद-२ २६ श्रप्नैल ७१

६० | पंत ग्रंथावली

प्रेम,

+े

तुम्हीं थाहते

तुम्हीं हो स्नेह, , तुम्हीं वात्सल्य भाव हो, तुम्हीं फूल झर, तुम्हीं मर्म के गुह्म घाव हो ! सूक्ष्म दृष्टि रख » भ्रणवीक्षणमय

मनुज का हृदय-- अतल ग्रहनताओं में डूब भ्नामय,-- लघु झणु की प्रच्छन्न महत्ता का दे परिचय !

शक्ति को तरी / ६६

अझकलुप शोभा का मुख

अपलक देख मनोहर ८: मातृ प्रकृति की आँखों से

झानन्द्र.. भश्षु.. भर दुलक पड़ा पृथ्वी पर

निएछल प्रेम रूप घर!

भू के तापों से बह

बादल की दुकड़ी वन नभ के उर में समा गया

धर धूपछाह. तन! चन्द्र-किरण ने उसके भीतर

इन्धरघनुप घ्मित मन के स्वप्नों का प्रिय नीड़

बसाया दीपित (*'* ,

ऐसी थी वह भाव संग्रिनी सुता अनुपभा-- अंग-जग में मिलती कहीं अव उसकी उपमा! नभ की नीरवरता से हंस हु वह बाते करती, मन. के सूनेपन में है 2 * मधुर बेदना - भरती! शोभा की _ सौरभ से कल्पित था उसका मन, अन्त्नेभ में , छाती छवि को छाया निःस्वन ! -

उसे श्राज भधु स्मृति के

मीतों में कर शुखरित उर की गुह्मय व्यथा “सहलाता हूँ ,मैं किचित !

| पंत ग्रेघावलो

दो

तीन

कौन सूक्ष्म स्वग्रेक सुग्रन्ध-सी

पेंठ गयी प्राणों के भीतर-- पकड़ नहीं पाते वह झोभा

मेरे गीतों के गूंगे स्वर!

क्षणमंगुर थीं रज-पंखुड़ियाँ

गंगाजल में वहीं आज भर, लहरें ग्रन्तिम लोरो गातीं

उन्हें सुला बाँहों में निःस्वर !

अक्षय सौरभ बसी हृदय में

स्मृति से आकुल अन्तर स्पन्दित, स्वर्ग चेतना मधुर स्नेह के

स्पर्शो से प्राणों में छन्दित !

नव वसन्‍्त सुमनांजलि देंगे

तुमको सद्य: शोभा सुरभित, नव-नव सुकुलों के रंगों में

कोमल अंगों को कर मूतित !

तुम्हें देखकर चन्द्रकला की

मौन मधुरिमा आरँक सका मत-- सुन्दरता मिलती-जुलती हो

बहू जड़, तुम थी जीवन चेतन !

मुझको झब शिश्षु-अंगुलि से तुम

निःस्वर इंगित करती प्रतिक्षण--- 'भूतों की चिर निर्मेलता में

यहीं कहीं रहती में गोपन [/

चन्द्कला में मिलती मुभको सुघर दूध के दाँतों की स्मिति,

तब श्रसि-स्सी ही कुटिल मुझे बन जाती, वत्से, भ्रस्थिशेष स्मृति !

फिर भी भाता मुझे: * दूज का चाँद देखना मात गयन में,

शेंशव झ्ोभा का नव प्रंकुर सहज फूट-सा पड़ता मन में !

शशि की त्री / ध्३

चार

कहीं दर से प्राती को रे अस्फुट परगध्वनि---रहता विस्मित, शैशव चापों से सुना आगन हो उठता मुसरित ! विहय बोलते, मन में सुनता है मुख तुम्हारे के ही स्वर, सभी मधुर ध्वनियाँ लगती स्मृति मुखर प्रतिध्वनियाँ भर ! इब्दहीन सूनापन भी ज्यों साँस रोक हट निःसंशय तुमको सुनने को ही व्यप्र प्रतीक्षा करता तन्मय ! सुते, शब्द ही नहीं-- रूप रस गन्ध स्पर्श भी मोहित- स्मृति की तूली से तुमको ही दे उर में करते प्रंकित ! पाँच एक मूक झवसाद भर गया मन रा 9 शेप श्रव सान्त्वना शुष्क दर्शन में ! गहन व्यथा से रंगे साँक के बादल मौन बेदना रंजित फूलों के दल! मधु समीर भी इवास-गन्ध से चंचल साँसें भर-भर तुम्हें खोजतीं विह्नल ! मरु-सा ही निःस्पृह लगता जंग जीवन, मन में सभ का भरा रिक्त सूनापन ! रवि शशि उन्मन-से करते भीराजन, स्मृतियों के खेंडहर-से लगते उड्डगण ! नृत्य सखी लहरों के उर उद्देलित, कोकिल चातक के स्वर करुणा प्रेरित ! सुते, तुम्हारे चिर विछोह का यह दुख-- डर से उसे लगाने में मिलता सुख ! ग्रह वियोग का धूम मात्र श्रवगुण्ठन, उर में तुमको पाता जीवित प्रतिक्षण ! असू में न्हायात्सा झोसों का थन गा लगता मेरे ही जीवन का दर्पण! एक सूक्ष्म अवसाद भर गया “सन में, ,मिलती भव सान्त्वना नहीं , दर्शन में !

€४ | पंत प्रंघावलो

रंग-विरंगी कलियाँ है भावों के शत स्तर कर वितरित शैशव का संसार

विधुर उर में करतीं उद्घाटित ! अ्र्धखिले भंगों का जग आँखों में होता अंकित,

सौकुमायं, सौन्दर्य, हृदय की अकलुपता से मण्डित ! सौससो स्मृतियाँ. जग मधुपों-सी भरती आाकुल गृंजन,

क्रीड़ा कोमल कल किलकारी,

हास श्रश्नु चंचल क्षण! पतमकर की 5ण्डी साँसों के

वार--उनीदे कोंपल, स्मिते, छिपाये प्रविकच बय की

शोभा सम्पद्‌. उज्ज्वल !

सात

निरमेल जल गिरि स्रोत विजन अंचल में वहुते कलकल, स्मृति में बजते, स्वप्न सुते, अस्फुट पंग ध्वनि के पायल ! हँसमुख फेनिल. धार * रे दूध के दाँतों की समिति निउछल, ' लहर, लह्र-मुख पर बखेरती मन्नोल्‍लास से चंचल ! तुम-सी ही ग्रतिग्रिय वह उठती-गिरती बह ऋजु कुंचित, दोनों श्रकलुष सरल चपल-- समता करती आकर्षित ! तुम जो कहती, उससे मोहक होता छुतला कलरव, उन अ्रवोध अदभुत बातों को हे नहीं भमुलाना सम्भव! पुलिन-तृणावलि-सी अलकों से मुख रहता था झावृत, नृत्य गीत प्रिय ऊमिल-फन स्मृति ,मन को करती दंक्षित !

शशि की तरी / ६५

आँसू की गीली स्मृति घारा बन तुम बहती मन में-- भाव हिलोरों में सुख-दुख की करता अवगाहन' मैं !

जआाठ

मृदु मुकुलों में देह तुम्हारी

मलयानिल में साँसें सुरभित,-- मन की मोहित आँखों में तुम

नव बसन्‍्त में होती विकसित ! मधुप गूंज सन्देश तुम्हारा

देते रहते मुभको ग्रोपन/-- 'विकल होकें मैं बिछोह से हि

तुम मुभमें ही रहती प्रतिक्षण ! चन्द्रकिरण से उतर तुम्हारी हे

स्मिति-लेखा उर करती पुलकित जीवन-क्षण. तारों-से. रहते

तुम्हें देखने को अ्रपल्क मित ! मैं भावों की घूप-छाँह में

तुम्हें सतत करता परिधानित सुर कल्पना दुहिते, प्रियस्मति उर-तन्त्री को रखती भंकृत !

नौ

तुम मेरी सीन्‍्दर्य-बोघ की

सूक्ष्म सुरभि हो पावन, श्रोतप्रोत जिससे श्रव मेरे

द्वृदय प्राण जीवन मन ! ऊपा श्रातः उठकर किसका

सहज करेगी स्वागत-- तुम्हें खोजने को गिरियों के

मस्तक कब से उन्नत! स्वर्शिक सुषमा मूर्त हो सकी हर तुममें बन प्रिय _ झैश्षव बैंसा स्वच्छ अपाप विद्ध

चैतन्य कहाँ श्रव सम्भव ! देह प्राण मन श्रात्मा से थी के

तुम चिर अकलुप निएछल, निर्मेलता तुमको पा भू पर

वनी झौर थी निर्मल!

&६ | पंत ग्रंयावलो

दस

अनू, चेतता में सुगन्ध-्सी

तुम बस गयी अजाने,

मर्म-व्यया में सने फूटते

अभ्रवः उर से प्रिय गाने ! मैं एकाकी ही था, तुम अरब वनी हृदय की सहचर, बाहर नहीं रही तुम, वत्से, समा गयी उर भीतर !

बदल गया जाने कंसे जग,

खोया-सा रहता मन,

लिपटा रहता द्रवित चेतना से

झाँसू का स्मृति-्घन ! भाव गीत लिखने में लगता तुमसे करता बातें, स्वप्न संगिनी, श्राँखों में झब कठतीं स्मृति की रातें !

ग्यारह

व्याप्त हो गयी वत्से, तुम सारे अग-जग में,

मुझको जड़ भी लगते भ्रब नव चेतन,-- फूल-पात, तरु, शशि, तारागण-- दृष्टि जहाँ भी जाती

लगता तुमको ही छूता मन !

मृत्यु कहाँ श्रव ? तुमको पाकर स्मृति में लिपटा मरण स्वयं बन गया भावमय जीवन---

तुममें ही रहता हूँ श्रब भावसुते,. तन्‍्मय तुममें. ही मेरा प्रति हत्स्पन्दन ! फूलों के मुख में देखता तुम्हारा प्रिय मुख, शून्य नील में तुम्हीं दीखती अपलक लोचन,-- लहरों पर चलतीनसी लगती चंचल पय घर-+- अंगुली थामे रहता गन्घ समीरण !

शशि की सरी / ६७: हा

छोटे करतल ताली. देते पल्‍लव दल में, छोटे... पदतल चिह्न छोड़ते सरसी जल में-- सभी भ्रकृति व्यापार तुम्हारी ही रेखाकृति _ अंकित करते सरले, मेरे अन्तस्तल में !

बारह

आँसू का सणि-समुकुट पहन स्मृति घरती रूप तुम्हारा, म्लान साँस का मभ मेरा उर, तुम उसकी प्रिय तारा !

तारा दूदा कहाँ अचानक

मिलता नहीं किनारा,

अग्निशिखा-सी खिंची हृदय में

कृश सस्‍्मृति-रेख सहारा ! प्रिय बिछोह के दुख-सा घिरता कोमल द्वामा का तम, सूंमुखी मूंदती नयन भुक, क्लान्त समीर गया थम !

एकाकी उर, एकाकी नभ,

निर्मम एकाकीपन,

व्याप्त हो गया बिन्दु सिन्धु में,

रिक्त निखिल अब जीवन! यह दिनान्त का दृद्य हृदय-वेदना मौन प्रतिविम्बित, अन्धकार का भय न॑ तुम्हें, तुम स्मृति में श्रक्षय जीवित !

तेरह

चुनते : बसन्‍्त के फूल वसन - रेशमी रंग भर-मर सुन्दर, चिड़िया पंखों में छिपा तुम्हें लोसी गातों, मृदु कलरव कर ! तितलियाँ सुम्हारे बाल भाव उड़नउड़ बन में करतीं वितरित, प्रवमान चपलता को लेकर « फिरता पुलकित, स्मृति से सुरभित!

€द | पंत ग्रंयावली

प्रिय चन्द्रकिरण, स्मित तारामण,

अधसछिले मुकुल, जुगनू, हिमकण--- जानता नहीं, इनमें तुममें

कैसी समानता है योपन !

जो कुछ भी हेँंसमुख, स्नेह प्राण,

जो कुछ जग में पावन, निर्मल, बह मुझे तुम्हीं से सम्बन्धित

लगता, उर को करता क्ीतल !

छा गयी निखिल अग-जग में तुम

बन कोमल भावों की दर्पण, तुमकी खोकर मैं कण-कण में

चाहता तुम्हें पाना प्रतिक्षण !

चौदह

मैं ही नहीं विकल रहता हूँ केवल, तृण तरू पल्‍लव गिरिवन तुम्हें पाकर जग में जाने कैसे लगते निष्प्रभ, उन्‍्मन ! भूतों से थी कहीं अधिक तुममें तत्त्वों की पावनता विर तिल, निखिल विश्व में व्याप्त तुम्हारी प्रिय आकृति अब, भ्रकृति तुम्हारी प्रतिक्ृृति में ही आज ग्रमी ढल !

जितनी छोदी थी उतनी ही बड़ी रिक्तता श्राज छा गयी मेरे भीतर, बाहर के अग-जरश में-- सुभको दुहिते, दुरवगाह्म गहरे अभाव का अनुभव होता शव जग में पयनपग में.) स्वर्ग मरत्य भी इस झभाव को भर सर्केंगे

दरह्नि की तरी / €&६

समझ रहा इसको अवृक मेरा मन ! एक श्रनिवेचनीय शूल्य में समा गया हो भावों से उद्देलित मेरा जीवन !

इस सूनेपन में भी

अहरह जाग्रत्‌ रहता मधुर तुम्हारी स्मृति का

आाकुल स्पत्दन,-- जिससे लगता

जीवित हूँ मैं भाव-रूपमयि, हि तुमको अपने अन्तर में कर धारण !!

पन्द्रह

तारों का पहने किरीठ तुम लगती सुन्दर

स्निग्ध चाँदनी से कल्पित सृदु गोर कलेवर !

तुम पविन्न थी कितनी अनुभव करता श्रब मन, दैशव॒द्वव्यों की श्री शोभा की सी माखन!

सूक्ष्म सुरभि की देह, स्थूल पाँखरी गयीं भर, आ्ाकृति रेखाएं किरणों की कनक मनोहर ! खोजा करता तुम्हें नील दृग स्मित अम्बर में. चटुल लहर में, अनिल स्पश्म में, कोकिल स्वर में !

जो कुछ भी अकलुप निसमं में निर्मल, निएछल, ,

स्पर्श तुम्हारा मिलता उसमें

सद्य: कोमल [

बुमको पाकर

विश्व बसाया था जो नूतन

विखर गया वह स्वप्न---

शेप बेदना, भ्रश्ुकण !

१०० | पंत प्रंधाघलो

या, और हुआ क्या अरत्याडित.._ मा “बिक ही छर में जीवित अठरह सजल वाष्प स्‍्ह पुम् उर के रु झ्प दिया शर्चि-कर क्ष 42 छाबाएँ.. तिरतः भावों बा समृति-.विपाद कब के पणों का स्नेह-नीड़, अदा एकाकी _ उसने रा मतोहर, जर को स्वष्नों गेह कि ऊैलरव के भर! का कण डेस-पुलकित रा हे महक नयी प्रेरणा पा जप हर श्मेँ ममेर ! 2 जडकर सहता भर कक अवा्ी और 5 हे वन फूल ही ऊुम्हला गयी |; निय. से जा, पी बजा हक अब पहचाने ! दीप, ग्रेट था 720 स्वयं उर का था हि रा 'परंका करता उप्जकत ! घिकू उनको, जो छोड़ गये हि नि्जेन ३. होगी मानवीय, कब भोवे हर सु

भप्ि

उनन्‍नीस

जो कुछ भी अव तक अमृत था

मूर्त हो उठा तुम्हें देखकर, उर के सबसे सूक्ष्म भाव को

रूप मिला था तुममें सुन्दर !

रंग-गन्ध य्चे अधखिले स्वर्ग मुकुल में होने कुसुमित, कोमलतम तन घरने को कोमलता कब से थी उत्कण्ठित ! रजत अनिल फिरती थी वन-वन उर साँसों में होने स्पन्दित, सृजन उपकरण, सौष्ठव में बँध तुममें, सहज हुए थे उपकृत !

शशि की किरणें स्वप्न-दोल में मम तुम्हें भुलाने रहतीं शआरातुर, लहर कल ऋीड़ा-रत रहतीं बनमे लय-चंचल पद नूपुर ! शेशव की कर विधाता निज सा करता अनुभव, उसमें भी अवतरित कर तुम्हें मिला सृजन को था नव गौरव ! रवि-शशि झब भी उमगते जग का झन्धकार करने झलोकित, सुते, स्नेह ही की लौ से

पर, मानव का उर होता दीपित | बीस

सिमट गया सारा जग तुममें पहले लगता था विस्तृत, “समा गयी जब से तुम उर में और कुछ करता आ्लाकषित [ मूक व्यथा का बादल अहरह भरता चुपके उर के भीतर स्मृति की छाया-सा छाया जो, भूल पाता तुमको प्रन्तर ! इन्त्रधनुप ने लूठ लिया हो सुधं, तुम्हारे 'उर का बैभव, सद्यःस्फूट मधघुऋतु रंगों को देख, यही भ्होता श्रव अनुभव !

१०४ | पंत प्रंधावली

हर

कु, मेरा भन्न पूजा करते अपुफफ-से उर में असख्य कोमल संवेदन | ऐम्हें देखने जाता वाल-भवन के प्रतिक्षण, अब तुम कस और भमिचोनी खेला करती मुझसे गोपन देह-बोध से बरे,

इक्‍्कीस

बाईस

लोग व्यर्थ कहते आनन्द लक्ष्य जीवन का, लद्ष्य प्रेम--जो भ्तिथि पझलौकिक मानव मन का! शोक अग्नि सन्तप्त हृदय उसका पिहासन,. भ्रश्ु जड़ित मषि मुकुद--, परम सुख पझ्ात्म-समर्पण ! जीवन मूल्य बदल जाते प्रा प्रेम्-स्पर्श सित, त्याग भोग, दुख सुख वन जाता उससे

प्रेरित ! ब्रण भाभूषण, निर्जेज सहचर, विन्दु वारिनिधि, सृजन प्रेरणा, रस संवेदन प्रेम, सृष्टि-विधि ! सुते, तुम्हारा स्नेह

व्यया का रस पावक वन नये रूप से ढाल रहा अब मेरा जीवन ! नये रूप घरता भरूप तुममें हो केच्ित श्री शोभा का विश्व तुम्हारी छवि 'से वेष्डित ! पवित्नता की सूक्ष्म सुरभि से .- आप्लाबित अन्त मुघ, चेतना, सुते, खेलती तुमसे प्रतिक्षण !

तैईस

जी करता, वितरित हो जाऊँ जग में, तुम्हें खोजवा जीवन में पग्र-पग में ! कंसे हो बने हि जग ऐसा सुन्दर बिना तुम्हें निज पुलकित बाँहों में भर ! मुझे तुम्हारी ही चेतना विकेन्द्रित एल पात, तृण तर में लगती बिम्बित ! भाव जगत्‌ लगता किरणों से विरचित सूकम तुम्हारी श्री शोभा से रंजित!

१०६ | घंत ग्रंयावली

अकाश उन्मन ! काश करे गले रस दे से सशिमुस्ि, बेड रेखांकि भोबीक धुरिमा

'पच्चो

मैधों की छाया-न्सोी चलतीं मन की भू पर,

आँस-मिचौनी सेता करतीं स्मृतियाँ. निःस्‍्वर !

एक करण. भ्रवसाद घुल गया सा भन्‍्तर में-- सूक्ष्म भाव-प्राइृतियाँ

तिरती हों भम्वर में !

मन के भीतर पैठ गया हो एक और मन,

जो प्रिय भ्रस्फुट हावों भावों का स्मृति दर्पण !

वचन श्रधकहे, समिति रेखाएँ, बत मुकुलित,

भाव शरवूफें-- भ्र्थ अब करते व्यंजित !

अता जब निज ध्यान-- तुम्हें पाता उर में स्थित,

मुझमें श्रद तुम जीवित--- यह कल्पना किंचित्‌ !

णुक नया आयाम हृदय में सा उद्घाटित--

सौन विपण्ण मसधुरिमा से जीवन-मन॒ श्रावृत !

“छब्बीस

छोटी-छोटी _ वस्तु

हृदय को करतों भ्रव झ्ाकपित, सीप, खगों के पर,

रंगीन उपल मन करते मोहित ! वाल-खिलौनों का जग

करता गूढ़ भाव अभिव्यंजित, सम्भव, यह जग हास अश्वु का

क्रीड़ा स्थल भर कल्पित ! सुते, तुम्हाशा ही जीवन

अब जीता हो मेरा मन लगता जग भनवूक पहेली--

सुख पर विस्मय गुण्ठन !

*१०७ | पंत ग्रंथाचली

वह भअन्तस की गनन्‍्ध

छू गयी जाने कैसे मन को,

स्वप्नों से गूंथा करता मैं है

उस शोभा के क्षण को! कप विटप नीड़ से पंख अलग, खग शिक्यु ज्यों हो नभ में लय स्नेह बोड़ ' तुम छोड़ हुई असमय तत्त्वीं में तस्मय !

स्टति में डूबा अन्तर का

ऋन्‍दन, वन जाता गायन,

इलक्षण भाव-स्पश्ञों से मंकृत

मन हो उठता उन्मन ! स्‍्म में सम्भव था कलुप कर्देम में स्व किरण का. पोषण तुम झाय्रोगी, जब पागोगी भू को नीरज, पावन:

डन्‍्तीस

तुम्हीं मधुर थी, या मोहक था

मधुर स्नेह सम्मोहन,

या दोनों का दोनों के प्रति

था अपूर्व आकर्षण ! नहीं जानता, कैसे तुमने खींच लिया मेरा मन-- मुझे समभते हृदय हीन सब निठुर बुद्धिहिम . पाहन!

ग्रवण, शोभा ग्राही

मेरे कवि उर का दर्पण

तुम्हीं जगा पायी संस,

चह मधुर सूक्ष्म संवेदन ! जिससे बाँध दिया मन को वात्सल्य सूत्र में अविदित, शेश्व के प्रति कभी ऐसा हृदय हुआ था प्रेरित !

तुम्हें पाकर लगता

अब मैं अपनेपन से बंचित,

वही सभी परिवेश्--

नहीं श्रव कुछ भी दैसा निश्चित !

तुम रही अश्रव, छोड़ हृदय में गयी स्नेह ब्रण झक्षत- गहन. मर्म अनुभव में

अब वह विधुर भावना परिणत | ११० | पंत प्रंथावली

वह झ्रन्तस की गनन्‍्ध

छू गयी जाने कंसे मन को,

स्वप्नों से गूंथा करता मैं

उस शोभा के द्वाण को ! हु विटप नीड़ पंख सा खग शिद्ठु ज्यों हो नभ में स्नेह ब्रोड़ तुम छोड़ हुई झसमय तत्त्वों में त्मय !

स्शृति में डूबा भ्रन्तर का

फ्रन्‍्दन, वन जाता गायन,

इलद्षण भाव-स्पश्ों से भंझृत

मन हो उठता उन्मन ! स्‍्म में सम्भव था बलुप कर्दम में स्वर्य किरण का पोषण तुम झाग्रोगी, जब पाओगी भू को नीरुज, पावन!

उन्‍्तीस

तुम्हीं मघुर थी, या मोहक था

मधुर स्मेह्‌ सम्मोहन,

या दोनों का दोनों के प्रति

था झपूर्व. झ्राकर्पण ! नहीं जानता, कैसे तुमने खींच लिया मेरा मनं-- मुझे समभते हृदय हीन सब निदुर बुद्धिहिम पाहन!

आब प्रवण, शोभा ग्राही

मेरे कवि उर का दर्पण

तुम्हीं जगा पायी उसमें

चह्‌ मधुर सूक्ष्म संवेदन [ जिससे बाँध दिया मन को वात्सल्य सूत्र में झअविदित, शैशव के प्रति कभी ऐसा हृदय हुआ था प्रेरित [ पाकर लगता

वही सभी परिवेश--- नहीं भ्रव कुछ भी वैसा निश्चित !

तुम रही शभ्रव, छोड़ हृदय में गयी स्नेह ब्रण अक्षत- गहन. .मर्म अनुभव में

अब वह विधुर भावना परिणत ! “११० | पंत प्रंयावली

तीस ठुम वसन्‍्त झाने से पहिले

सली गयी--- मातृ प्रकृति को लगता बह ज्यों छली गयी !

मुकुल मौन मुख लटकाये-से

खिलने में सकुचाते,

कुसुम गन्ध उच्छूवास छोड़

चने में भ्रप्ममय कुम्हलाते ! मघुबन के फूलों के पलंग ने लग्ते देसे. भासल, मन की व्यथा उंढेला करती ध्यर्य विजन में कोयल !

मधु में स्वाद ने मिलता हो,

अ्रलि भरते उन्मस गुंजन

नहीं सुहाता उन्हें

भरनन्‍्दीं का रस मादक गौवन ! बह पवित्रता कहाँ ! भले कलियाँ हों तुम-सी कोमल, ' शोभा का उसरीौप्यय इसपें अह मन से भी ही निर्मल !

लते, बाह्य समता में भूला

लज्जित - सा श्रव _ मधुबन---

सिज समस्त चैभव श्री

स्वगिक स्मृति को करता भ्रपेण ! प्तक्र मधु की सन्धि, मिचोनी खेला करता जीवन, मधु की थी सुपमा पतभझर का सूनापन सथता मन !

तुम वसनन्त आने से पहिले

चली. गयी--

चिनगी-सी छिटकीं स्सृति की

कोंपले नयी !

डुकतीस - ईश्वर ने शिशु के मुख में द्रीने. को... विम्बित सुभग कलात्मक सुष्टि रची सुर्तर - मुनि - भावन !

शज्ि की तरी / ३११

शैश्व के पद चिह्लों से

जन भू रज भंकित- जान सका प्रब--

जग बयों इतना सगता पावन :

भव मुकुलों में हुई

चरण चापें चल कुसुमित, हरित तृणों मे

माता पृथ्वी का उर पुलकित !

मधुर सुरभि में हुईं दूधिया साँस परिणत कल क्रीड़ा ने रंग भरे कलियों में तद्बत्‌ ! समिति रेखाएँ. बनीं कुटिल शशि-कला मनोहर, ताराझ्रों में शैशव विस्मय गया सहज. भर!

गहन नील उर में रहस्प शिशु उर का गोपन

मिला हिलोरों में हावों-भावों का नर्तेव !

तरुदल-मर्मर में मुखरित अस्फूट तुतले. स्वर करतल किसलय, बाँहें बनीं लताएँ सुन्दर ! सलज शील ऊपा में मधुर हुमत्ना अवगुण्ठित, , साफ मौन रहती आँचल में शिशु पा तन्द्रित ! सारे जग को ढाल बाल श्राकृति में निश्चित विधि ने उपकृत किया जगत्‌ जीवन का शाँगन ! निखिल सृष्टि की साथेकता ही होती खण्डित

जो होशव का विश्व ने होता इतना पावन

११२ पंत पग्रंयावली

बत्तीस

दो भागों में सा बट जाता

अरब मेरा मन, तनये, तुमसे मन ही मन करता सम्भाषण !

अस्फुट स्वर में तुम जाने बया कहती तिःस्वर, फूल पंब्ड़ियाँ - सी बरसा करतीं उर भीतर ! शब्द मे सुन पड़ते उर भाव सममता गोपन, मधुर स्नेह में बाँधती रहती प्रतिक्षण ! नथतों में पनिमेष भूल उठती प्रिय झाइृति उर को सौरभ में लपेट-सी लेती मघु स्मृति !

विहग_ कूजते, गाती निर्नेन वन में कोयल स्रोत फूट पड़ते ऋीड़ा-फेनिल कर कलकल ! सांसों केन्से जा से शा उर होता पुलकित, तुम्हें भाव-साकार देख रहता विस्मित ! स्तिमित दृष्टि से मुझे देखती-सी तुम क्षण-भर, तुमको पा, आश्वस्त सहज हो उठता अन्तर ! क्षण में मन की आँखों से छवि होती श्ोभल, भाव मूढ़न्‍सा निष्ठुर मन मुझसे करता छल |

तेंतीस

फूलों को छूवा जब स्पर्श तुम्हें करता मन, स्मृति सजीव बन सहसा घर लेती कोमल तन!

शन्नि को तरी | ११३

दूध घुली साँसों से मलयानिल हो गुम्फित--

गन्ध मुकुल प्रविकच वय-्सी करते रेखांकित !

नव वसन्त क्या पाता तुम हो उठती मूतित, अस्फुट प्ंगों की कोमलता करती मोहित ! नयी चेतना से समीर उर लगता दोलित, सद्यः स्फुट शोभा मार्देव से सा उन्मेषित !

शैशव के जग में ही मन प्रव करता विचरण शिशु सुन्दरता से विरहित जग होता. निर्धन ! तुमको खोकर तुम्हें प्रधिक 0 पा गया तुम सुदूर जा, निकट भा न्‍ मा निश्चय ! चुम जीती रहती तो साथंक लगता जीवन, जन्म-मृत्यु की प्रांख-मिचौनी अब उर प्रांगण ! अंग कल्पना को तुम भ्रव॒ भावों भें जीवित, कभी जगत्‌ में वस्तु मिल सकी इच्छित !

अब तुम लगती निखिल बिदव में मौन उपस्थित, सुट्ठी भर अ्रंगों में पहिले जो थी सीमित ! चौंतीस

झोसों का वन देख हृदय मन स्तम्भित,

नीरव व्यया कथा वह

* उसमें अंकित

११४ | पंत ग्रंथावली

आँसू क्‍या हो सकते निर्मल ?

सस्‍्नेहपात्न तुम थी निश्चय ही निरइछल !

हार मोतियों के प्रमल्य हो. सकते दृदय ताप वे किन्तु कहीं घो सकते? अ्श्नु कणों के मन सा तुहिनों का बन शीतल करता उर सहला निःस्वर ब्रण ! क्या दोनों में साम्य कहीं अति गोपन ? या. यह सम्भव सहृदयता के कारण !

अन्तर में जगते निगूढ़ सम्वेदन,

तारों ने बरसाये हों आँसू कण !

“अर्ध रात्रि को चली गयी तुम असमय, विश्व प्रकृति तब रोयी होगी निश्चय ! डाल पात पर त्तभी काँपते थर थर सजल स्वर्ग मोती, आँखें आती भर! तभी मूक झ्ोसों का प्रणु॒ द्रबित बच करुणा विगलित छूता स्नेह विधुर मन !

'पेंतीस नवल कोपनों. में उपवन दिहू मुकुलित, मृदुल अंगुलियाँ

करती मुभको इंगित ! इझि को तरी / ११५

रोम रोम में सी तुम जय के छाकर भाँस मिचोती सेला करती निःस्वर ! चिड़ियाँ उड़कर निकल निकट से जातीं-- स्मृति मृदु पंखों में उर को लखिपटाती ! चली गयीं तुम मुमको छोड़ पब्रचानक, रहे ताकते मुंह

सर्वेज्ञ चिकित्सक ! जन्म-मृत्यु, सुसन-दुख का जग न्रीड़ास्थल,. यहाँ. निदुर॒ परिवर्तन चटते प्रतिपल ! पर संसार भसार नहीं-- यह्‌ निश्चित, जहाँ बिछोह

हृदय कर सकता मन्थित ! जिसकी रज में भरे प्रेम क्के अंकुर चह्‌ जग कैसे हो सकता क्षण भंग्रुर ! माया भी ने जगत्‌- जीवन निःसंशय, प्रेम सृजत की शाक्ति जहाँ. चिर श्रक्षय ! देह नहीं थी तुम, चेतना चिरंतन, फिर आझझोगी सेजो प्राण मन नूतन ! अभी ,प्रेम संचरण न॒ जग में स्थापित,. तभी जगत्‌ जीवन लगता झअभिशापित ! यह भू होगी कभी स्वर्ग में परिणत,. सुधे, जहाँ तुमसे आते अम्यागत !-

११६ | पंत ग्रंथावली

त्तीस

छाया _वीथी में सा फिरता. शअभ्रब मन, धघूपरछाँह ओढ़े सुख-दुख की चेतन ! भर पड़ता जब तरु का पात अचानक या पुकारता बन में विरही चातक---

स्मृति का सा तब खुल पड़ता वातायन, गूढ़ बवेदता के प्रतीक

बनते क्षण ! भ्रब॒ प्रकाश से भाती

छाया निःस्वर, अपने भीतर छिपने को

मन कातर [

भ्रात्मा की प्रतिनिधि सी थी चह्‌ काया, भुला पाता तुमकौ-- कैसी माया ! भले चेतना श्रक्षय क्षण भंगुर तन, भूत ख्प ही श्री क्षीमा का दर्पण!

भारोही रज-रहूप चेतना वाहन, रज का तन ग्रात्मा पर क्र श्रारोहण--

दिशा काल को करता पार मिस्तर, “क्रम विकास की गति दे जीवन स्तर पर !

इसीलिए भूलता ने तुमको पन्तर,

झायो थी तुम फूल-देह से सुन्दर!

शन्चि की तरो / ११७

पूर्ण रूप प्रतिनिधि भ्रल्प का. बनकर

जग में हो ग्रवतरित-- चाहता ईश्वर !

प्रेम-तूलि से तुमको कर छवि प्रंकित विधि ने प्रथम प्रतीक किया था निर्मित! तभी सतत तुम घूप छाँह का घर तन रज तन की श्ाश्वतता करती घोषण !

सेंतीस

भैघों के पंखों पर तिरती सन्ध्या छाया श्यामत स्वप्नों से गुम्फित कोमल तम पल] घिरता उर में प्रतिपल आँखें भर कुछ रहा खोज सा सन्ध्या तारा अपलक,. श्रान्तर समीरण, स्तब्घ विहय रब, उदासीन-सा.. जुब्धक !

शशि लेखा को लिये गोद

वात्सल्य मुग्घ सा अ्रम्बर, तुमको अंक लगाने को ,

आातुर हो उठता श्रन्तर ! हृदय चाहता उठा सकूं

सन्ध्या विषाद का गरुण्ठन, नीरव स्वर मेंसे तारे

करते मुझको सम्बोधन !

यह विषपाद गहराई सम्भव प्रेम-सिन्घचु की विस्तृवन्- स्नेह तुम्हारा _ प्राणों को करता था ऊध्वें प्रदीषित तुम निश्ञान्त में नव प्रभात की सित प्रतीक थी मुकुलित,, वाल उपा से मिलती थी अझकलुप झोमा सद्यः स्मित !

११८ [ पंत ग्रंथावली ._

फितने देंगे की फितने मुगुमों ने सुम््प फी घारण सुपर दूध फी गाँसों में बढ़ बने मधुर उर तुमफो गजने विधि में सृजन कला का कर मंश्ोपन, निसित् सृष्टि सामग्री बग, तत्वों फा किया परीक्षण ! इंशव का या स्वर्ण, कम तुम्दारी हृदय सुरभि षी विर्मल जिससे श्ील स्वभाव तुम्हारा रटा. सहज ही. निष्ल ! सब ऋतुप्रों की सुपमा _ करती चांद, गे. पूति दपुम्हारी, मुझे: केबल धथ्यारी थी तुम, 3 विधि की परम दुसारी!

'उन्तालीस

पतकर के पीले पत्तों से लिप-पुत गया धरा का प्रागन, युम्हलाये से प्ंगों का जग, मन में लगते स्मृति के दंशन ! नग्न टहनियों की कछृश शोभा आकपित करती लोचन मन, सद्य बग्तता ही झौशव की मुक्त वयस की प्रिय भाभूषण ! नीवू के भुकुलों की सौरभ नासा रुम्घों में प्रवेश कर एक मधुरतर सुृक्ष्म गन्ध से भर-सा देती आकुल भन्तर ! विश्व घूल में सना खेलता, शिशुओं का क्रीड़ा सहचर बन, अपने , भावों के खेंडहर-सा लगता मुझे रिक्त पतभर घन ! लटके सुने विहय नीड़,-- निर्जेज बब-सा मेरा उर झाँगन, कहाँ उड़ गयी विहय बालिका जिसके प्रिय स्वर हरते थे मन !

2२० | पंत प्रंथावली

मधुर स्नेह स्वप्नों की कोंपल सोयीं तर वन में हत चेतन,

नव वसन्‍्त श्राकुल उर में स्मृतियाँ उकसायेगा नूतन !

चालीस

क्षण भर को थी अतिथि फूल, मंगुर जग में पथिक स्वर्ग की विलभी हि भू जीवन के भग में! मुक्त चेतना बन्दी रुज के तृण पंजर में, चन्द्रकला अब तिरती मेघों के अम्बर में!

सूक्ष्म सुरभिन्‍्सी तुम अझ्रनाम छाई श्रन्तर में फूल पाँखरी बिखर गयी चुपके क्षण भर में! ज्योत्त्यमा अब _ बुनती दि किरणों से वह काया, रजत बाष्प नभ में भर हलकी सुरघनु छाया !

सुहिन बिन्दु स्वणिम मरनद सौरभ में सत कर कतक वर्ण कोमल खच निर्मित करते सुन्दर लहरों से पद नर्तन, कोयल से ले प्रिय स्वर मुकुलीं से मुल् छवि, ऊपा से गरिमा निःलवर-- कितने. नये प्रयोग प्रकृति अब करती प्रतिक्षण एक साथ सब गुण कर पाती नहीं संकलन ! सूक्ष्म विभव ले आयी थी तुम चत्से, भू पर 'झनुपम लगती थी घरती पर स्वर्ग घरोहर !

झज्षि की छरी / १२१

ईश्वर के प्रिय, कहते, रहते अधिक ने जीवित, तुम प्रसीम स्व॒र-लहरी रा रजकण में अंडृत + मुझे स्वप्व में भव भी हर मिल जाती तुम झुछ क्षण स्वप्न सत्य से मु | सत्य लगते ने प्रकारण £

इकतालीस

बन फुलों की गन्धों के पण्डप में गोपन लगता भ्रव सतुम रहती सुते, हि सहज स्मित झानन + पंसों से तितलियाँ के डुलातीं तुम्हें मृद्ु [ फूल कुटी को पेर मधुप भरते. प्रिय गुंजन ! तुम श्री शोभा की प्रतीक झायी थी भू पर मधुर उपस्थिति से मुकको जंग लगता सुन्दर ! किस स्वशिक ग्राभा से जाने निमित था तन, सण्डित रखते तुम्हें अनाम सुरभि के-से घन ! कलियों की कोमलता से तुम थी कोमलतम तन निमित्त भर, स्वर्ग चेतना | - थी तुम निरुपम ! गिरा उस प्रिय सुपपा का कर सकती. वर्णन, पावनता की तुम थी , चम्पक वर्णी चन्दन! तुमको छू आनन्द स्रोत भरता उर भीतर, पुलकित होता मन शोभा में श्रवमाहन कर !

१२२ | पंत ग्रंयावलो

छाया में गुम्फित प्रकाश की काया गीमल

स्वगिक द्वव्यों से थी विरचित पल्‍लव - मांसल !

सृष्टि कला के सभी उपकरण भी झब मिल कर गढ़ पायेंगे नहीं रूप वह छ्लील मनोहर !

बयालीस

फाल्गुन की हलकी सी बदली छायी नभ पर,. बूँदाबादी से तृण तरु घुल लगते सुन्दर ! सौंधा - सा उच्छवास घरा के उर से कढ़कर किसी भधुर स्मृति अब झाकुल करता अन्तर !

तुम श्रव नहीं रही--सुन, भर्म व्ययथा से कातर बौराये-से ग्राम्न मुकुल भर पड़ते निःस्वर ! विटप हाथ सा मलते, पीले पड़ वन तरू दल अ्रणत, मृत्यु के लिए पाँवड़े बनते कोमल ! साँसेंेंगाी भरता समीर उर में उद्देलित वन फूलों की गन मार्ग में विखरा मुकुलित ! मेघन्प्श्रुओं से पथ में

- पग्र-प अभिनन्दित तुम पावन गंगा लहरों को होती अपित !

सेना पत्र का जग,

स्तव्ध दिशाएँ घूसर, शिशिर-मृत्यु-यथ

तिरता स्वयं निसर्ग निरन्तर ?

शज्षि फो तरी | १२३

उड़-उड़ पीले पात--सोचते

जग क्षण-मंग्रुर, भमृत स्मेह के, सुते, उग्र रहे उर मे अंकुर ! भूत प्रकृति जढन- नहीं हमारे लिए निदर्शन, अमर प्रीति के बीज ममुज को करने रोपण ! मृत्यु नील कर पार चेतना करती विचरण सुे,. जहाँ तुम भाव लोक में घसी चिरन्तत ! सेंतालीस

प्रकृति रही महचरी-- जानता है मेरा मन,

एकाकी ही बीता जीवनं-- शैशव, यौवन !

तुम भी व्याप्त प्रकृति भें प्रव

बत्से, इसीलिए वह लगती भाव-मंगि यह कौन ?-. नहीं जो मिलती तुमसे, प्रतनु॒ ब्रतति-से अ्रवयव प्रिय मुख-गन्ध कुसुम से ! स्तिमित नील-से नयन, चन्द्रलेखा-ली स्मित छवि,

बलिहारी ! मुझे शोर भी प्यारी

किसलय

करतल,

भृदु स्वर सुन कोकिल बनती कवि !

१२४ | पंत ग्रंयावली

तरल तुहिनन्सा हास, हिलोरोंसी गति चंचल,

पगथ्वनि सुन, भू उर में चबजती निःस्वर पायल !

अन्तर का विस्मय ज्यों

तारा-नभ रहस्यमय, तुम्हें देह, भोभा हो उठी : तुम्हीं में तनन्‍्मय !

जो श्री सुषमा द्रव्य

हुए थ्रे तुममें केन्द्रित प्रकृति अवयवों सें वें रब

झब फिर से वितरित !

सुधर. सुष्दु व्यक्तित्व समा पाया प्रक्ृति में, तुम थी सृष्टि विशिष्ट निखिल विधिना की कृति में !

स्वर्ग मुकुल श्री सलज धरा की रज में रोपित, अक्षय उर सोरभ में जग को करती मज्जित !

सूक्ष्म भाव-पंखड़ियाँ यदि हो पाती विकत्तित, प्रेम उतर आता भू पर आनन्द गन्ध॒ स्पित !

भाकुल उर में स्मृति-मरन्द की छोः धरोहर तुम भर गयीं--हृदय में निर्जज छाया पतभर !

चौबालोस

वज्ञ॒ हृदय होंगे वे जन्म तुम्हें दे कायर छोड़ गये जो भू के निर्जेज कंटक पथ पर! श्वेत वस्त्र में लिपटा-- छाती पर रख पव्पर, एक दूध की भूखी बोतल सिरहाने घर ! वाल भवन में जाने तुम मं कब कैसे. आईं चार-पौँच दिन की अघमरी कली कुम्हलाई ! तुम्हें मारने के प्रथल भी किए कदाचित्‌ जान गर्भ में तुम्हें पाप को बोक भनिच्छित !

शबश्षि की तरो / १२५

क्वारी मा ने झोषधि भी खायी हों. घातक,

अण पात कर जग से गुह्य छिपाने पातक !

इसीलिए तुम रण '. जन्‍म से रही 2, तुम्हें सताया घुठने तुम्हें सता कं

हड्डी र्‌!

काँठे की भाड़ी में हँसता

फूल मनोहर, हँसतती तुम नित रही

देह रज से उठ ऊपर ! दोप तुम्हारा क्या था?

तुम थी अन्तःपावन--- तुमको छूकर पाप

पुण्य बन जाता तत्क्षण !

मनुज सम्यता ही में इस पातक के. निर्देय गहरे भूल सदा से रहे, मुभको संशब * प्रेम अभी हो सका भू जीवन में स्थापित-- उसके लिए मनुज को | होना होगा संस्कृत *

ऋरमविकास में मानव मन

जब होगा _ विकसित घरा-हृदय चेतना-स्पर्श से

नव रस दीपित-- कलुप पूंक से हीन

तभी होगा जग-जीवन शुभ्र प्रेम की सन्तति होंगे

भावी भूजजन !

सुतते, मुझे तुम स्वर पुष्पन्सी गा थी अकलुप »

ह्व्द्य तुम्हाशा था * सित संस्कारों से निर्मित !

7१२६ | पंत प्रंधादलो -

'तुम्हें देखते हृदय हो उठा सहसा मोहित, करुणा उर घ्लावन ने भेद किये सब मज्जित ! स्वर्ग सुरभि सी स्मृति जग पुलकित कर देती मन, नीरव क्षण में तुम ग्रोपव करती सम्भाषण !

'पेंतालीस

तुम्हें देखकर प्रथम बार शैशव जग के प्रति

मेरा ध्यान गया दुग-पावन !

शैशव जो

घुटनों बल चलता नहीं धरा पर हत भागा होता भू-प्रांगण !

किसे देखने आती ऊपषा ?

नव प्रभात

किसका तब करता अभिवादन ? फल भला खिल्नते विस्मित अ्रनभिष नयन ? खग ही मृदुँ कलरव॒ भर क्या हित गाते गायन ? सुन शिक्षुओं के बोल कहीं दुहराती कोयल ?

स्रोत फूटते उन्हें देख चलते डगमग. पयण्म ?

दन्त कथाएँ कहाँ जन्म लेतीं रहस्यमय ?--

होता या परियों का ही मोहक सुन्दर जग ?

काल बीघ से मुक्त, अ्रकारण ही प्रसन्‍न मन

कौन जगत को करते रहते क्रीड़ा मुखरित ?

निरुद्देश ही दोड़, सहज श्रन्तःसुख प्रेरित

भू रज को रखते कोमल पद-अंकित ?

जज्चि फी तरो / १२७

फूल, चाँद, तितली, खग, जुगनू लहर, सभी व्या

नहीं खिलौने शैशव मन के सुन्दर ?--

सद्य:स्फूट सौन्दर्य प्रतीकों को विलोक कर

साथंक लगता निखिल सृष्टि झाडम्वर !

तुम-सी पावनता की निएइछल प्रतिमा को छू स्वर्ग स्‍नात ही उठता भेरा अन्तर, तुम्हें अंक में भर वत्से, साकार सिद्धि-सा सफल साधना लगती भू-जीवत की दुष्कर !

छियालीस

तुम्हीं नहीं जब रही चाँद, जीवन में क्या झ्राकर्पण १-- पत्र वन-सा सूता डूबा रहता अपने में मन ! मुझे विपण्ण देख तुम सहसा मलय पवन बन सुरभित साँसों में चुपके प्रवेश कर उर को करती पुलकित !

पिकी कण्ठ से कहती मुझूसे-- तुम क्‍यों रहते उन्मन, मर्म मधुर स्मृति में रहती मैं क्या जीवित प्रतिक्षण ? नव मुकुलों में रहता जाग्रत्‌ मेरा शंशव शाश्वत, मधु के कलि कुसुर्मो में करते . तुम मेरा ही स्वागत ! मैं शोभा की स्मित शशि लेखा - तिरती -भाव-गयन में, अनस्तित्व मत समझो मुझको, - देखो जग जीवन में!

१२८ | पंत प्रंथावली

गढ़ इलक्षण स्वर में देती तुम + . मुझको 5 सहज- प्रवोधन, खुल पड़ता मन की आँखों में. - भाव क्षितिज तब नूतन ! मिलता तृण तरु पल्‍लव दल में * रूप तुम्हारा अभिनव, स्रीतों की कल कल में सुनता . बाल तुम्हाश कलरव | . निखिल सृजन सौन्दर्य तुम्हारी ही शोभा का उत्सव,-- यह ईश्वर की सृष्टि! -हृदय को होता नीरव अनुभव !

सेत्तपलीस

शिशु-विस्मय-से अपलक चितवन

फूल सभी तो . होते सुन्दर,

पर उनमें कोई प्रसूत

झाँखों को लगता प्रियतर !

तुम विशिष्ट थी सुमन,

श्रधिक “रखती. भ्राकपषंण,

शोभा पंखड़ियों कल्पित था कोमल तन

भावों की सौरभ में डूबा स्वेप्नों. का मन-- सहज सलंज्ज स्वभाव स्वयं में था सम्मोहन )

साथ तुम्हारे शोभा चलती बन वचिर सहचर, कनक-गौर श्रामा वखेर पंग-पय पर निःस्‍्वर ! शुत्र चेतना किरणों से मण्डिव स्मित झावत हंदय स्पर्श फरता संस्कारों फा सुथरापन ! उर तन्त्री में भंकृतन्सा था स्थवगिक.. ._. गामत शात्मन्वोध के विस्मय से विस्फारित... लोचन !

इाशि की तरी / १२६

क्षण-भर लगता,ज्योत्स्ना ही 7

साकार रूप धर;

सुधर पारदर्शी तन मन.ले : ;

उतरी “भू पर!

इसीलिए हो सकी लीन तुम --

तत्वों

अड़तालीस डा

चिर पावनता में :तन्‍्मय !

मुक्त*' झनामय की सात्विक ““ *««

हवा 7 डर कं

नहीं जानता सुते, तुम्हारा

क्यों मन ही मन करता पूजन, ..

भावों की सुमनाओ्जलि तुमको हक क्रता उर निर्जन में प्रपंण ! शुश्र.- चेतना की प्रतिमोन्सी '. / आभा , रेखाओों _ से ..अंकित, . स्नेह स्फटिक मणि 'झांसत पर तुम निःस्वर अन्तर्मन में झोभित मुझे निखिल! दायित्व मुक्त कर तुम, निष्काम : हृदय में तस्मय,

बुछ भी तो कर सका नहीं मैं

तुम्हें बनाने जय' में सुखमय ! तुम्हीं कर सकी भाव सत्य में,

मेरे अन्तर्मम को * स्थापित, सूक्ष्म सत्य से रहित: स्थूल जग

निश्चय ही; होता भ्रभिशापित ! व्यक्त नहीं कर सकती वाणी, -'

कितना मन 'से हूँ" मैं उपकृत,

तुमको पाकर प्रथम बार * उर

सहज हो स्का ,भन्त/केस्द्ित [:

रज का, पिजर- छोड़, हुई तुम “पगाशुभे, भ्नम्त ज्योति में अब लय, तुम कितनी अकलुष ,असंग थी

/ #सहृदय पा सका स्वर्गिक परिचय ! तप: +%- सिद्ध - «चेतना

-- धासाधना करने आयी भू पर क्षण-भर स्वयं मुक्त हो, स्पशे- मुझे

! -<दे गयी स्नेह का स्वणिम भास्वर !

१३०, /पंत,प्रंधायज़ी -

“उनचास

गंगा तद, पर जाने को जी «८ करता क्या जाने क्यों, अविदित तुम लव सरसीरह-सी खिलकर मृदु लहरों से होमी दोलित !

रज तन पाँखुरी, हृदय स्वणिम मरनन्‍द का होगा सुरभित

अपलक देख रही होगी तूम उठा सलंज मुख शोभा-सस्मित !

मधुर भाव उर के, मधुकर बन मेंडरते होंगे भर गुंजन,

पावनता शिशु-राजहंस वन सेंग-सेंग फिरती होगी प्रतिक्षण !

साँसों की पी सुरभि, समीरण फिरता हीगा वन में पुलंकित-- शील स्वभाव तुम्हारा ये ,सब, ४! क्या कर पाये होंगे व्यंजित ! जल में पाँव” डुवा क्रीड़ारत हो £ या तुम बैठी होगी तद पर विस्मित -होगी जल, में दुहरे ४... पुलिनों को प्रतिबिम्बित पाकर !

जल खग बालू यी चाँदों में - धघर्चा करते - होंगे सम्भव

*.- उर:से तुम्हें लगा थयों गंगा माँ का गौरय करती अनुभव !

यूक्षों की छाया जप में गपष , थपकी देशी होगी कोमल, |! लहरें भुत्ता धुला 'पलने में लोरी भाती होंगी कलकल |

मृत्यु द्वार कर पार जये, तुम निश्िविल जगत ऊीवन में जीवित,

अकृति द्रव्य नव संस्कारों परिवातित-तुमकोी पा झउपहृत )

हारी की परी | पैर

पचास

वैज्ञानिक युग में रहस्य हों. : 7, समझे जाते! मिथ्यारोपण-- मृत्यु लोक से लौटा लाता '+

“तुमको खोज मंन्त्रं तप साधन !

चली गयी चुपचाप चेतना ,. . ;/2प्ह, यन्त्र 'को छोड़ यथावत्‌ कहाँ चेतना केन्द्र ? मनुज.को अभी नहीं हो पाया -अवगत [ सूक्ष्म किरण-सा सूत्र--पकड़ पाता यदि "> जड़ को , करना; . चेतन, नया बोध मस्तिष्क झिरा में, हृदय गुहा में भरता स्पन्दन

देहू पद फलन्सी जब भरती -. करता हृदय निधन का स्वागत,

यह निश्चय निर्मतता यम की . भ्रविकच बय में हो प्रम्यागत !

घूपछाँदह के स्वप्न लोक को हि तुम भव करती होगी उपदृत, अपनी :ही झकलुप क्षोमा

: नया स्व रचती होगी नित !

कितने सूक्ष्म _ रहस्यों के मूत्रों से गुंहा सृष्टि यह ग्रुम्फित प्रोस-विन्दुला विधि के चंचल करतल पर जीवन स्‍घ्वलम्बित ]

यहू संयोग कि रन प्रदीप में पग्रमर चेतना की सौ दीपित, या यह सृजण कठा का कौशल झूप-पर्पष साथ संयोजित ! हू के दोने में थी शाश्वत, दोमा वी हुम स्वगिक पायके, इमेह शिशा पिर हृदय दीप की, पृत्पु धार भी उस अभिभाषषः |

१३३ | दंह पंपादारो

'इक्यावन

अश्चु हर पहला प्रिष स्मृति को स्नेहाझजलि उर करता प्रपंण, भूत्यु पार भी अंक्षण जीवित सुते, तुम्हारा चिर श्ाकर्षण ! विशुझों के जग में बागकी र्मँ पाता है हो सम्बंधित, मये रूप में मेरा अन्तर सृध्टि कला से प्रब सम्बन्धित !

मुकुलों की मांसल छोभा को बाँहों में चुफे लेता भर, अझविकच् प्रंगों की कोमलता स्पश हृदय को करती निःस्वर रेंग-रेंग फी पंसड़ियाँ बरसा तुम्हें स्मरण प्रव॑ करता मंघुवन, नयूक्ष्म तुम्हारे भाव जगत्‌ का गन्ध विभव जग में कर वितरण !

नव नवता में तुम्हें देखकर उर झनजाने होता ह॒पित, श्री शोभा की अमर चेतता प्राणों को छू करती पुलकित ! फालसई शझ्राभा से मण्डित उदय हृदय में होता स्मित मुख तुम्हीं केन्द्र उन सब विपयों की जिनसे भी मन को मिलता सुख !

'भीतों के स्मृति पंख खोलकर उड़ असीम एकाकीपन में “हम गयनों के पार गगन कर तुम्हें खोजता दिशि में, क्षण में ! जग के प्रति मुकको विरक्त कर तुम अनुरक्त कर गयी मन को, जग जीवन में पारऊँ तुमको तुम में पाऊं जग जीवन को ! स्पृहा अ्रश्नु की, भाव स्वप्न को करता अकधित कथा समापन, दुहिते, स्नेह अजेय, साँक का हृदय पदु॒म मुंद करता वन्दन

दशश्ि की तरी / १३३

समाधिता

[प्रथम प्रकाणन-न्व्प : १६७३]

सुमिते, तुम शैद्यव समाधि में रहती निएछल न्योछावर तुम पर दादू के समाधिस्थ पल !

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समाधिता की कविताएँ मेरी इधर की नयी रचनाएँ हैं इनका अं श्रपने ही में जीवन की एक नवीन भूमिका है, भ्रतः इनके लिए भूमि की आवश्यकता नहीं जान पड़ती के आशा है पाठकों को जीवन के प्रति यह समग्र दृष्टि रुचिकर होगी बे, १८/वबी-७, के० जी० मार्ग, सुमित्रानंदन पंत इलाहाबाद-२

एफ तुमने केयघस दाहइ दिये, गुछ घाब्द भर दिये! भाव, चेतना, योप, प्रेरणा मेरे रहे प्रसंशय, द्रुवा शब्द तट हृदय ज्यार में दे किया विश्व रो परिणय ! देग्य स्वप्न जो पाया उसपा कर विश्लेषण, प्रतियों से कर मुक्त रात्य कया फिया संगठन ! स्प निसारा सुदम भाव जग यंग मर मन्यन, पॉफ ऊप्य फा बोझ किये समदिक प्रमु दर्शन ! ईएयर को दे मानवीय तन मन प्राणों पए जीवन घरती पर ही राहुज सेजोया भ्रमर स्वर्ग का भाँगन !

दो

व्यथ ज्ञान फी सोज प्रम सम नीड़ हृदय जो भीतर, तो तुप ईश्वर ही में रहते... - पुममें रहता ईश्वर ! जोसुकर्म रत..रहते नित. , - वे करते प्रमु का, पूजन, प्रमु ही का मन्दिर रेचते - , रि निमित कर जन-भू प्रांगण ! रेक्त शिरापं . में - बहता संगीत ' निरन्तर _गोपन, प्रभिव्यक्ति ईब्बर को देता ! वह उर में नित नूतन !

. समाधिता / १३६

बाँधो जय जीवन से प्राणों का रस छन्द महंत्तर, अहंकार को दे सामूहिक प्र्थ,

मुक्ति लोकोत्तर ! भेद नहीं जग में ईइवर में प्रधा हो जो विकसित-- भू पथपरईश्वर ही प्रतिक्षण विचरण करता निश्चित !

तीन

वि - लोक-प्रार्ण मन हे - -. कर्म मुखर मधुकर बन हे & करता गुंजन,

प्रणयाकुल उर , भाव मुम्घ कोकिलबन, ... /- : हु) भरता कूजन !/ .. ..:- जीवन 'श्री-शोभा नित झभितव,. * - («_, - बना चन्द्र मुख-दर्षण, सूरज, भ्रात्मा के प्रंकाश ही का

४22८० हक ७28 लघुतम पावक कण ! तारापथ में ज्योति-भंकुरित... प्रिय स्मृतियों का स्पन्दन, रिक्त पूर्ण" हो उठता श्राता ध्यान तुम्हारा, जिस क्षण!

चार ब्

नि्जन में प्रार्थना कर रहे - बैठ वृक्ष के नीचे

सांस. _खींच __ कर रे 2" + ध्यान मग्त' मन 7 ओंखे :भीचे! सत्कर्मों से करो प्राथना पावन हो .जन-भूतल,

देह रोम प्रार्थना * करे. ' जग्र में हो जीवन-मंगल!. _ के - 9

तन्मय अन्तर ही प्रमु दर्षण, हु] भूतल है मन्दिर "प्रांगण, पु जीवन गे ईद्वर वियुवत - यह मध्य युगों का दर्शन !

म्ड

१४० | पंत प्रंथावलो

पाँच

दृष्द्िम द्वारों ही से ईश्वर जग में फरता पिधरण, सूदग भाव-सोस्दय स्पर्श पा मोहिन हो उछठ्ता मन! इलध्य रत छायामा गुम्फिर चिट मन्धी इछिय दल, कटा रोजते. सपगे ? स्वर्ग रे बड़ी रदोगप भूतना! पाप्रो, निमित.. परे भाव यँभव से नय भू जीवन, उतरे इच्धिययथ से ईश्वर जन-गृट जग हो परायन !

छः

पत्ते भार उड़ते भू रज पर सोट पोट फर, मैं पसें फी-्सी प्राहुट सुनता भागने पर ! -- गुछ ऐसा तन्‍्मय रहता मन ! गयल प्रभति करता भविराम दिशा पथ पर चल, ल्षितिज-मरोसों से त्वच कोमल माँक रहीं नव कोंपत-- बोध के नयन !

सात्त ;

नव खिलती कलियों से जो सौन्दर्य राँकता-- वही तत्वत: बाइवत ! क्षण संगुर माध्यम मुरका है “पीले पत्तों में परिणत ! मंगुर ही भें रचपच कर शाश्वत का रहना सम्भव,--- . गो शाइवत को पृथक्‌ खोजते का रीता ' उनका «- झनुभव !

उसमाधिता /. १४१

जन को मध्यम्रुगीन दृष्टि से « , उठना निश्चय ऊपर, + रात्य दृष्टि 0 जीवन मंगलमयि, « पर . इह-पर गुगपत्‌ निर्भर: पट

आठ इक

मैं ईइवर को झ्राज मनुज के झौर पास ले भागा,

विगत प्रनागत के पाटों में पिसता जो भरमाया !

कल जब वह जन के ओतर से हँस-हँस कर बोलेगा

स्वर्ग नरक का क्रूर 'भार तब मनुज नहीं ढोयेगा ! ईइ्वरीय पावक .मैं मानव-कर में घरने आया, धरती ही ईइवर का श्रांगन शेष बुद्धि की माया ] भू की चौड़ी छाती पर मैं लोट पोट करता हूँ ईश्वर से चिर अविस्छिन्त मैं नया चरण परता हैं

नौ 5 कक

परदा-सा उठ जाता आँखों के सम्मुंल, से 'तिख्वर,,

इसी धरा पर नयी, घरा तब, दिखने.लगती. सुद्दर

भू-जीवन, से बिलग, खोज में खो थोये चिन्तन के

, झुगन्युग से हम भटक रहे'माया खँडहर में मन के ! शो, हम के सीधे संयुक्त - करें। मन की जीवन से, घरा कर्म में निरत, बिलगावें शाश्वत को क्षण से !

मन , अपने में दुख का वैन, भू-रचना सुख का साधन,

जग के विस्तृत दर्पण में बिम्बित झ्रात्मा का सौवन !

कहाँ खो गया भार काल का कर्मठ तन्मय क्षण में,

बिना हमारे जाने ही हम विजयी जीवन रण में !

8

दस

ईइवरत्व.. का _ गौरव इलौठाता हूँ. ठुमको-- साधारण -- मानव- बनता : - - लगता - * ऑयस्कर * साधारण मानव क्या ग्रुरं ,' 5 -- “दायित्व ने यह कन्धों.पर

३१४२ | पंत प्रंयादली

छोटे से झागन पर चलता जब लघु प्मर घर आत्म पूर्णता का अनुभव तब करता , अन्तर ! सिमट विश्व जाता सब धुप घुले आँगन में, मन में परिचित जगत समा जाता तब क्षण में! भू जीवन में मनुप्यत्व का सम्पीषण, लुप्त होजा आँगन भी कर अन्तर्मू्ख्र मन ! सीमा में नि:सीम, महत्‌ लघु ही में मूतित समझ पाया था विधि कला सृष्टि ' में सजित !

लगता था तब दो श्रनन्त हैं वाहर भीतर, तुमसे ही संयुक्त रहा श्रायन्त दुष्कर ! चुम ही केवल,-- सीमा झ्ौर श्रसीम बुद्धि भ्रम, क्षण क्षण जिनको करता मन झव तुम में पअ्रतिक्रम !

ग्यारह ००72 फूट रही तन्मय उर तन्त्री से

_योवन मकार, रोम-रोन के तार हक

प्रेममयि, तुमको रहे पुकार ! पा बरस रही प्रति श्वास स्पर्श से श्री... सुषमा मुझुमार जिससे मैं निज सृजन जगत का करता रखे धदुंगार!

ग्रॉगव.. ही प्रयप्ट प्रेबनल - द्दव के हार,

.किलद इचना कर्मी का. हे परहताता प्रिय की हे

बारह

सूक्म स्वर्ग... की. गरस्व , समायी जो उरे भीतर सूँघ पाते यदि उसको नर--. अन्तर की प्राणेन्द्रिय उनकी प्रभी , ने .विक्ित, पंकज नहीं, पंक ही से जीवन मन परिचित !

एक स्वर्ग मंकार हृदयन्वीणा में '.. सोयी, श्रवण नहीं यदि कर पाते जन, बाहर के . कोलाहल में उनकी मति * खोयी उर प्रनाहत के प्रति चेतन !

एक प्रमर सीन्‍्दर्य .) व्याप्त ।ः अझग - जग विस्तृत देख नहीं पाते ,मदि.लोचन , मन की आ्राँखें . भभी नहीं पायी. निद्धित, 5 बाह्य रूप का उन पर गरुण्ठत ! शाइवत ... प्रक्षय सत्य सृष्टि. पट में जो गुम्फित स्पर्श नहीं कर पाता यदि मन

इन्द्रिय द्वारों से बह बिखर गया वि शत खण्डित:-- घ्यानावस्थित नहीं हो सका कभी "5 एक क्षण !

, चिरं , झखण्ड ;रस - घारा में - आनन्द प्रवाहित, प्राण नहीं यदि कर पाते श्रवगाहन, त्तो असाध्य इच्छा के, 5 पाटों+-- से वे : मर्दित, - हो उसके- केन्द्रित समग्र में प7 हें, इए 5 आने, “प्रभु दर्पण !

१४४ | पंत प्रंधावली

तेरह

देव जन्म लेता जब भू पर उसे घेर लेते मिलकर विद्वेपवी दानव, भात्मसात्‌ कर शअसुरों को नव अभिव्यक्ति पाता नव युग का मानव ! सदसत्‌ का संघर्ष उसे गति-क्षमता देता दोनों को कर युग पट में संयोजित,--- सदसत्‌ से पर विश्व मंच. पर नव होता अवतरित

रूप धर विकसित ! प्रति विकास के साथ

विगत का हास उपेक्षित बनता नव जीवन पथ का

अवरोधक, 'ह्वाम्त तमस के प्रतिनिधि होते काल पराजित, युग संघर्षण बनता जन उद्बोधक ! भोदह्‌ धन्य तुम्हें आनन्द

जाग निष्क्रिय समाधि से तुम सुख-दुख की बाँहों मे वेंघ सृष्टि प्रगति हित दोलित ! जीवन को साथंकता दे संवेदना नयी तुम भू रचना कर्मों में नित विकसित दधित ! रहते भी कैसे तुम निःस्वर अन्तर्मन के सूने-से मुक्ताकाशों से सीमित ! बाहर जीवन क्षेत्र भग्न वीणा-सा बिखरा,-- साधो नूतन स्वर रस स्पर्शों से कर मंकृत !

समाधपिता / श्थश

पन्द्रह

आ्रात्म नग्न भ्रव जीवन !-- खोल दिये. सब वंन्धन विश्व सम्यता संस्कृति ने था जिन्हें केंराया.. धारण ! -+मात्र रहे ये बाह्य उपकरण ! खोले .दिये ज्योतिर्मणि भूषण पहनांये जो रहे शास्त्र, पढ़ँदर्श ! --बोध नहीं शुक वाचने, प्रवचन ! अन्तर की प्रनुभूति सत्य-- यदि कहूँ, ऊपेक्षा से फेरेंगे मुख शुकक पंण्डितें,--- पूर्ण दृष्टि मिलती उससे ही! जिससे जग में रहता नहीं हि कुछ भी रहता मु कर सात तथ्यों भले ल॑ 04 अब पंजर निर्मित, महत्‌ करुणा से वह हा ! आकर शाइवत झालिंगित !

सोलह

तुम्हें सॉपता हूँ देवत्व तुम्हारा गुरुवर, मनुष्य्व ही का कामी . *: मेरा नर जीवन! मानव. प्रतिमा में तुम को, जीवन-मू्ते हो सेंकी, श्रद्धात्त मन करता जन-जन में झभिवादन * शून्य स्थाणु क्षमता, निर्गुण चेतना श्रगोचर मनुज रूप घरकर ही * होती पूर्ण " पल्‍लवित, इन्द्रियों द्वारों ही से : सहज ग्रहण करता में सूक्ष्म भाव सौन्दर्य तुम्हारा ॥।' रहस अपरिमित !

“१४६ दंत ग्रेघावलो

आत्मबोध के छत्ते में संचय करता मन सत्य तुम्हारा,-अलि-सा अविरत भर रस गुंजन ! तुम बन सको 8 देह मन प्राण तुम्हें मैं साँस-साँस पर करता रहता पूर्ण समर्पण !

सत्रह

जिस पावक से सृजन प्रेम का करता ईइवर उसे पी गया हूँ मैं छककर ! नये सूर्य बनने के क्रम में खिनगारियाँ निरन्तर ? आओ झानन्द, सुजन के सुख-दुख का प्रेमी मेर/ मन,--- तुम्हें सौंपता रहता सर्जन के सुख-दुख के रस क्षण [| लोद घूलि में भू जीवन की अनुभव होता पावन, * मैं जड़ता को प्रात्मसात्‌ कर बवता समधिक चेतन ! बदल गयी झात्मा की भाषा, अग-जग का मूल्यांकन, रही वह जीवन परिभाषा, भू झव श्रद्धा प्रांगण !

अठारह हि

जीवन परावक भ्राज तुम्हारे करतल पर मैं धरता,-+ सावधान, जलना मत, तुमको विश्व यज्ञ हित बरता ! अब वह युग गया मनुज ईश्वर हों सीधे सम्मुख,-- नम्न हृदय, ऊँचा सिर रखना, भरमभा दे महत सुद्ध !

समाधिता / १४७

सच्चिद्‌ विद्युद धारा में मैं बहा रहा जन-मन को, सावधान, संयम से रहना, खोना मृत प्रिय क्षण को ! इह पर सेंगे प्रादंश यथा मिले भावी युग पथ पए, सावधान, बनकेर समग्र ; ढलना तुम, पुरुषोत्तम तर *

उनन्‍नोस

डरो तुम, तिरमेय मन विचरो हि जगती . के भाँगनव में नहीं. जानते? ईश्वर ' के के) प्रतिनिधि हो ठुम जीवन में ! दौड़ाओ उदबुद्ध दृष्टि पर उन्मुक्त दिशा के पथ पर, लक्ष्य भूलो, बैठे हो तुम क्षिप्र काल के रथ पर! बजे रे घरा, भले जड़, सूर्य खण्ड यह / कर हा मानवीय बन सके, प्राणसे सीं ब्रीय बन री हो... चेतन [ गुरु दायित्व मनुज कन्धों पर उसे निबाहो हंँसकर,-- स्त्री नर ही क्‍या, पशु पक्षी तृण तरु इतार्थ हों भर पर ! अणु युग यह ! मुट्ठी-भर रज से लत चिद गति जब ले नृ रचना करो नये जग की मिल सार्थक हो. भूयौवत +

बीस

काल मुझको मात्र घड़ी पल, काल परे मन जाग्रतु, अन्तर का जागरण सत्य ही मन का भारत! , वह विश्व का प्रंग, , अंग उसका ही विश्व असंशय,/८ भारत-भू पर ! बोध प्राप्त कर | बनें लोग. मृत्युंजय *

१४८ | पंत प्रंधादली

श्रह, मुझे उत्तको नग्न दि र, जी निर्माण तह मन देगम्व 3 अवसर ५० पडहर ! से बहियुंस मा अब आत्मा का सु कल उसका होगी ५४ देपंण भात्मारिक्त, हे बहिविभव रे गा में सौम्य तेज भारत मन का, विम्बित- अषु-मृत हो नव जीवित इक्कीस | मूठ नयी हि. करते गम री भर “जनों सै हमे पृणित ! सम्भः शक झा डुष्कर, त्तत्य रेधिर के पोषित सैष-क्षण पर! स्वप्नों के ने मुनहले चुनहः के स्मित आकाझन कुसुम वन में हा खींच भत को ता अतिक्षण . निर्मित करना होता गा कक आंगन | ' रब शवन मुख ! जन-मू श्रॉगन रचना ही पा सुर! 'बाईस | सहज सत्य सह इन्द्रिय पावेगों का फ्ष आप पअह्क हे रा "अर! "कर हे

समाधितत 2 १७६

शिव जगन्‍्जीवत लक्ष्य र्ति

बोघ वल्गा से , प्रो मातृ प्रकृति के क्रम विकास- पथ परे रंथ धावित: इन्द्रिय उपद्रन सूक्ष्म भाव- सम्पद्‌ में कुसुमित,

अन्तर-तभ-सुरघनु-श्री- . सुपमा से शप्रालिगित !. . - नि

ऐसा नहीं कि मप्रत्य पर अं

इन्द्रिय - जीवन उसे सँजोना.. रस-समग्र आत्मा के मन

छील-छीलकर प्वाज-चेतना आत्म रिक्त. बन, सम्भव हो निर्वाण-- > ईईवर का श्राराधन ! _ जीवन ईइवर को जो घरना चाहों भू पर सो . समत्व , साधो, न, उठो .इन्द्रिय-मत ऊपर |

तेईस मेरे सम्मुख झ्राता 'हँसता '

जन समूह का ईइवर, व्यक्ति चेतना दीप शिखा यदि «*

सामूहिक चिद भास्कर! हे

सामूहिक संकल्प ? बनाता'

ना “जग में अपना पथ,

+

.. वह 2४ | कप - बूहदूं यान चाहिए है कि ' .._ कितना क्‍या ढो सकता रथ!

मनः संगठन पीछे रहता बहिः संगठन श्नागे, भले शील सुन्दर पण्डित हो, पर कायर, यदि भागे! बहिः: संगठन केवल रे ऊँचे स्तरं पर ही सम्भक तभी लोक श्रेयस्कर,-- नीचे स्तर पर जीवन परिभव *

६५० / पंत प्रंथावली

चौबीस

तुम्हें _ सौंपफर झुझको . _ विधिना ने बतलाया कितने कोमल सूक्ष्म

तन्तुओं से असु-ग्रुम्फित

मानव जीवन !-- शिशु कान ; प्रंकुर गुण्ठित चित्‌ ! तुम्हें सौंप कं निज सूजन-कला को भी रहस्य समझाया !

तुम प्रमु की बहुमूल्य धरोहर ईश्वर मुख की दर्पण, भनजाने ही तुम्हें पालता उर का मुख्य समपण ! तुम कितनी असहाय, भ्रबल कितना कढोर जग-- अविकच कली--कुटिल काँटों का

कुण्ठित भू-मंग ! रहस मौत स्वगिक सम्मोहन: गढ़, अ्परिचित--- (रक्षक सबल तुम्हारा ! ) उर करता आकर्षित | सतत घातू जननी की बाँहों में दोलित

मृदु हँसती स्व कुसुम तुम ; मातृ प्रकृति सम्पोषित ? सृजन कला की विस्मय हो तुम, ] संशय

मुझे निज अबोधता से संरक्षित तुम्हें .' नहीं भय ! प्रीति अ्रंक में पलते निश्चय निखिल चराचर-- प्रेम सृष्टि का ईइ्वर, जग जीवन का सहचर !* पच्चीस ्‌ झोस बूंद, तुम कितने हो श्री-निर्मंल, सहज सेजोये हो फूलों के करतल ! चेद ऋचा तुम" मुझको जीवन-पावन उज्ज्वल, स्वच्छ रहे तुम-सा मेरा मन! १. सुमिता के प्रति

समाघिता / १६४१

विहगो, होते सृष्टि के गायक हे लगा, देता, मैं जग में तत्षण, कवि पंखी तुम, स्वर संगीत विधायक, कूजित तुमसे मील गयन, मू दिशि-क्षण! मुझे फूल भी भाते---रंग मुखर स्वर, : - गोपन कुछ कहते वे मन में निःस्वर, सुम दोनों हो जग में कितने सुन्दर एकाकी मनके प्रिय साथी सहचर !.- - छब्बीस

_ मैं , काट रहा हूँ भ्रन्धकार युग-्युग के मेन का.! स्थापित -केरने. विश्व तन्त्र

नतन जीवन का! शुद्ध बोध की , घार घाव करती उर-दुस्तर,

सूंदम लेखनी की भसि से

उज्ज्वल कोमल स्प्शों से छू अन्तर! - , बहता -संवेदना -रुघिर का हि भीतर निर्मर,, ' /.] भेद भाव का कदु किल्विषे जो धोता सत्वर! कल्मप॑ को _' कल्मप उसे घृणा करने से * मिठ्ता झ्ंक नहीं निगूढ़ लांछन का, -. उठा * भनुज॒ को, कट डर व्यापक भाव-भूमि देकर ही मूल्य सिखा सकते हम मानवपत का सत्ताईस ; पब

' गरुद्द करो, हाँ युद्ध, दे सतत विगत ज्वर होकर, 3 » तिमंम भू परिवेश, &, “7 ३+: ८“ युद्ध चाहिए निर्तरः भन्यायी नर , बझसुर, नम्र, न्‍्यायी सच्चा मर, सड़ो सत्य के हि जिस पर जन मंगल निर्मर ! है हर मर्यादा |! तर (2-५ चेतना की. निः्सेशय, मर्यादा से हीते _ हि कभी हो सकता सहूदय £ -

३५३ | चंत्त प्रयोवली

मर्यादा कौ «असि मैं देता तुम्हें श्रकुष्ठित, काटो मेत्र का अन्धकार, जीवन हो ज्योतित !

अट्ठाईस ऊध्वंसुखी मनु ही सनन्‍्मानव, मुझे संशय, अधोमुखी इन्द्रिय-रत पशुवत्‌,-- नर तन केवल परिचय ! ऋषि मुनियों, द्रष्टा देवों का सार भाग गति कामी मानव, अभिव्यक्ति उसमें ही ईइवर की हो सकती सम्भव ! लगता पहिले अधोगमुखी इन्द्रिय. ही सर्वोपरि सुख साधन, परम सौम्य सुंख का अनुभव तब होता, जब मन ऊर््व भूमि पर करता विचरण ! किन्तु ऊर्ध्वे ही में खो जाता रिक्त शुन्य में निष्किय लयथ होना भर, ' ऊध्वे प्राण वंशी से पकड़ो जग जीवन को वह्‌ मृत. मीन नहीं, उसमें उठने की क्षमता ऊपर ! ईश्वर का पर्याय सन्तुलब,-- भगवदवंशी मानव, भोगों शाइवत. जन-भू योवन !

उनंतीस फूट पड़ा जो पावनता का + हृदय के भीतर » झब झजस्र वह निर्कर !

भू जन चाहें, हि उसमें कर सकते झवगाहन ! -ईश्वर ध्येय. मनुज का,--- यदि ब्रह्म करता विकास जीवन का तो बह ब्रह्म नहीं, अम-मर,--कहता मन!

सम्राधिता / १५३

व्यय बिना जीवन के ईश्वर, “व्यर्थ बिना ईइवर के जीवन,--

कभी बन सकेगा जीवन ही '“ईढबर का भू-प्रतिनिधि पावन !

अटक के संकुल वन में कै हर के निमृत गगन में थामे अब मन हरी डाल जीवन की,“ यहीं बनानो मन को सीड़ नये ईइवर का, जीवन तृण हे चुन-चुन्‌ प्रतिक्षण !

तीस

ज्यों-ज्यों श्राता पास तुम्हारे नयी भूमि पर चलता, विस्तृत लगतीं , दिशा, /; - | क्षितिज पर सूरज नया मचलता ! प्राणों के खय कलरव करते है होता जान स्बेरा, मिठता भ्रास्था के भ्रभाव का - मन का छद॒म अ्रंघेरा !

उतरो स्वणिम रस निर्भेर-सी से नित करने जग को, नूतन चेतन पद चिह्नोंसे सूचित करने मग को ! छाया भय संशय विपाद जग में विघटन का पतमर, झाझ्नो, 'लोटो भू रज पर कुसुमाकर ! बन नव जीवन कुसुमाकर *

इकतीस

गायक बनने को बन्धु, चाहिए राग ताल स्वर लय साधने, कवि बनने को भावाद हृदय में ५3 सुन्दरता का रस दुंशन ,* मानव बनने को सेवानरत अन्तर में सहृदय संवेदन, नित प्रात्मत्याग ही के बल पर हो सकता जन-मन पर शासन !

१४५४ / पंत प्रंयावलो

सुगृही बनने को अ्रपरिहार्य

सत्कम॑ निरत जीवन चिन्तन, इस सियाराममम जग ही में

साधक को याने प्रभु दर्शन !

यह सच है, पर सबसे दुष्कर

जग्न में बनना साधारण जन, उद्यत, जाग्रतू, कमंठ, विनम्र

भू शिल्पी--करता उसे नमन !

बत्तोस जब मैं धरती पर पर धरता सहज चूम लेती वह पदतल, मुझे शुदगुदाती, स्नेहाकुंल मत हो उठता चंचल पकड़े मुझको भू का गुर प्राकपेंण, उ्से चाहिए प्रवुद्ध मानव मस,-- नया सैजोना ज्से हरित. निज आँगन दयामल दूबड़ मुक्त पृष्ठसा खुला लोरें नये जीवन का, लोटें इस पर, 2

भार उतारें मन का! नव सूर्योदय हुप्रा प्रसन्‍य दिशाएँ, अन्धकार की मिरीं निण्ढ निशाएँ !

नंद जीवन के 'स्वप्मों से

भंनिल मन पुलकित, भंनिल सलिल के संग कर अंग हिल्लोजित !

नयी दिद्याप्रों को छूने | मैं. स्वत: सकर्तआा |! मातू करोड मेँ भने डे कभी |

कर ॥0[॥7 जगफर धुत बस्तर

तेंतीस

झन्धवार से मरते... जूभो भू मन के दुर्जय, वह अंबोध पहिला प्रतिनिधि - अन्तर -प्रकाश का --

अहंकार ही आांत्मों का प्राहूप प्रथम रे. * मानव जीवन कण्टक पथ जिसके विकास का ! सूक्ष्म मनोमय दर्शेन---- ;. सत्‌ के बोघ के लिए श्र असत्‌ उपस्थित रहे, कला येंह सृष्टि सृजन की,-- ऐक्य बोध के लिए विविधता , ही पथ दर्शक, यह गनुभूति रही निगृढ़ युग के चारण की! दर्शन बन जाती जब कविता तब वह कविता रह जाती क्या शंकित कुछ जन ! काव्य क्षितिज_ पर ज्योति परवव॑-सी भाव-दीप्त वह आझलोकित करती रस प्रेमी प्राज्ञों का मन!

चोंतीस मा खोल दिये मैंने मिलमिल ड्न्द्रिय बातायन, खुली. वायु में साँस आज लेता मन! युग-युय के वर्जन निषेध से मुँदे हुए थे कर्म वचन मन-+ इच्छाओं. का. जीवन: ! द्वार मुक्त कर अपनेपन के पाता श्रव- मैं पूजन के नव , साधन ! मेरे बिना भला क्‍या सम्भव ईश्वर का अस्तित्व करे उर पह्रनुमव ? -

३५६ / पंत प्रंधावली

मैं ईश्वर पर

ईइवर मुझ न्योछावर होते रहते प्रव झनुभव बन नव !

पर

मुझसे. निकट

कोई ईश्वर के, ईश्वर से

मिकट के कोई भेरे,--

संशय ?

प्रतिक्षण हम आमने-सामने बंठे रहते-- तन-मन रहते तनन्‍्मय !

पेंतोस

मैं नव किरणें भू जीवन में बो जाऊंगा, नये सूयं-शशि उर्े क्षितिज में, ज्योति पंख गाने ग्राऊँगा ! भ्याकुल वन कोयल के स्वर में ५३८0९ जन-जन भ्रन्तर में, मैं भावी | से सुरभित नव बसन्त जय में लाऊँंगा !

नव जीवन कांक्षी

रस विह्वल ग्नित मेरे जीवन के पल,

में भपने को देकर जग को जग में

भ्रपने को पाऊँंगा !

ज्वार उठा जीवन सागर में

चेया शब्द बनकर प्मम्बर में-. पंख खोल

प्रिय देश काल में निखिल विश्व-भर में छाद्ञजेंगा !

ज्योति सस्‍्नात गायन गाऊंगा !

समाधिता / १५७

छत्तीस

मुझे चाहिए फूल परीन्सी सुन्दर नारी, अपनी ही उर-सौरभ में लिपदी सुकुमारी देह गन्ध ही में वह बसी नहीं हो मांसल, उसे कभी छू लूं तो प्राण हों रति-विह्धल ! मन के मुख पर मधुर शील का हो स्मित गुण्ठन, - चेतना

रमा श्री शोभा में हो जीवन ! गृह में तन, सामाजिकता में री उसका मन, अधिक प्रीति से करुणा हो-- ' | जग के प्रति चेतन * पद तल स्पे्शों से उसके भूतलत हो पुलकित-- मन के स्पशञें मरणोन्मुख्ध जय नव जीवित ! सेंतीस

पंच तत्त्व में जल समीर मुझको प्यारे,

कितने चंचल, कितने कोमल,

सबसे ;.. «ज्यारे

कितने श्रान्ति _ वलान्तिहर दोनों कितने. सहृदय ये कोई हैं देव/ इसमें मुझको, संशम भाव मसुग्ध जब इन पर करने लगता चिन्तन, लगता. तथब पाग्रल हो जायेगा मेरा मन! सोचो, किस वंशी घ्वमि-सा रेशमी तरंगित अंचल सलयानिल का--- किन सूत्रों से गुम्फित !

१५८ | पंत प्रंचावलो

लगता, मृदुल मृणाल तन्तु से जायेगा सौरभ का तन, क्या रेशम से मुंध « पायेगा ? सम्भव, इतनी सुृक्ष्म चेतना हो मानस की प्रण भावा हो या युवती उर के रस की! सम कांत नीहार चना हो मसुण समीरण पिघला कर-पुठ में समीर को ढ्ले सलिल कण ! त्तरत सलिल, यदि नहीं डूबने को होता भय मैं उसमें ही रहता कोमलता में तनन्‍्मय ! उसका शीतल स्पर्श ओझोढ़कर लेटा... रहता, किसी नदी सरवर उर की लहरों में. बहता! किन गीले तारों से किसने गूंधा जल को फूलों के कूलों में बयों बाँधा चंचल की ! अनिल सलिल को झलिगन जब करता उच्छल हँसता मैं तात्विक शोभा में लय फैनोज्वल ! रेभस वेग :ज्वारों का आँधी गाता, उर के भीतर आँधी पर चढ़ करता पार दुरन्त दिगन्तर ! अड़तोस

गंगा की-सी घारा बहती लगती निखिल घरा पर, जाने किसका प्रीति स्पर्श रस पुलकित करता ग्रन्तर ! विछे काल के क्षण बालू कण जीवत तट पर विस्तृत, आओ, खेलें बना घर्सो औड़ा स्थल जग निश्चित !

समाधिता | १४६

गति, भ्विरल गति ही जग जीवन, उसे ' रोकना दुष्कर, मन की नाव भले ही डोले घ्येयय सरित का सामर! श्राशा की सित पाल चढ़ाप्रो, उच्छल प्राण समीरण, नव-नव इच्छा की हिल्लोंलें देती मिल आलिंगन ! जीवन क्या केवल संघर्षण !- - आधे सत्य ग्रुग वेशन, पूर्ण सत्य--प्रानन्द स्वयं ही ।॒ डाँड .चलाता प्रर्तिक्षण :

उनतालीस

पास तुम्हारे होता हूँ जब मन से ओमभल हो जाता जग, लौट जगत्‌ पर श्राता जब मैं नयी घरा पर घरता मन पग ! कितना सत्य जगत्‌ लगता तब तुम प्रकाश हो जिसके निरचय, बिना सृष्टि के तुम्हें समझना हू आध्यात्मिक अज्ञान भ्रसंशय ! स्पश्ण तुम्हारा अपरिहाय॑, प्रिय, खोले मर्म जगत्‌ का जीवन,-- जगत्‌ सत्य हैं, जगत्‌ सत्य, है श्री शोभा मुख का शादवत दर्पण! पंकज वह, उसको होना झब ज्योति स्पर्श पा तुमसे विकसित,* नित्य सत्य जीवन-यथार्थ ही जिसके उर में ईइवर विम्बित !

चालीस

श्री सुषमा के सन्देश मूक, प्रिय फूल, सहज हरते तुम मत, सौन्दर्य प्रतीक, भघर सस्मित, किस विस्मय से भपलकलोचन * मैं भूल स्वयं को जाता हूँ जब तुम्हें देखता अन्तःस्मित, शोभा बलेरते तुम जग में, मग सें, मूह-आँगन, वन में नित!

१६० | पंत प्रंथावलो

सुन्दरता ही है. सत्य परम, सुन्दरता ही शिव भी निरचय, शिव सत्य नहीं यदि सुन्दर हों तो मुझे भायें निःसंबय ! आओ, भर दें जग के दिगन्त नव युग-शोभा में हो कुसुमित, मैं कवि है, तुम स्वॉगिक कविता, नव रूप-दिगन्त करें सजित ! पीड़ित अभाव से जन जीवन झभौ' कामक्षुधा से भू यौवन, कुण्ठित उर में बर्सा प्रहषे हम भरें भाव-मघुमय गुंजन !

इकतालीस राग द्वेष से दग्ध श्राज युग मानव का मन निखिल विश्व में घोर विषमताओं का जीवन ! जनगण से भी जग के बौद्धिक मन के निधन, स्पर्धाऋन्ता के पाढों में मदित प्रतिक्षण ! जलते छः रहते मेरे

विद्वे अआलोचक छोटे मुंह जो बड़ी बात कहते नित अनथक ! भारत में रहना जिसको जीते. पहिले सन्‌-- नव निमित करना उसको जगती का प्रांगण ! घिकू सबसे दयनीय देश अस्त्रों से सज्जित, नहीं जानते वे भीतर से

होना विकसित | बाहर के ही पश्ु प्रयत्त उनके खर साधन,

नयी सम्यता को होवा भीतर . से चेतन [

समांधिता / १६१

बाहर से ही हाँक रहे वे : भू जीवन को,

युग यथार्थ यह-- झाज बदलना अन्तर्मन को !

बाहर से भी सहज सजोये

भू निज अग्ने£ जीवन प्रास्था में आने को, नव परिवतंत !

ऊपर से भी अब दबाव

अनुभव भोगेंगे

खयालीस

करता मन, त्यी

_ जन चेतना का नव यौवन !

बिछ जाता मन हेँंस दूबड़नसा, तुम धरो धरा पर नये चरण, लोटे वसन्‍्त नव जन-भू पर जागे दिगन्त-तम ज्योति नयन * पग-पग पर सुलगरे नयी क्रान्ति, फैले नव जीवन की ज्वाला, जन वरण करें तुमको, पहना

न्‍ |] नव आाशा&कांक्षा की माला *

चेतना सुरा नव पी प्रमत्त

जन आत्म त्याग को हों तत्पर,

भू पाप ताप अभिशाप मिटें

सुख सौध बने